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बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

एक अनजानी वजह

कुछ दिन पहले कुछ बदल गया

आहिस्ता से ...

बेहद आहिस्ता से

कई दिनों तक इसकी ख़बर भी नहीं हुई

लगा ही नहीं कि कुछ बदला है

सब ठीक ही लगता रहा


आख़िरकार जब जो जैसा रहता था

वैसा नहीं रहा

कुछ, जो रोज़ ही होता रहता था

अब नहीं हो रहा

एक अर्से से


मुझे पता है कि अगर कोई चीज़

बहुत धीरे-धीरे बदले तो समझ नहीं आती

पता ही नहीं चलता

लगता रहता है होगा कुछ,

ठीक हो जायेगा


ज़िन्दगी में सब इतने मसरूफ़ हैं

अपनी अपनी उलझनों के साथ

क्या पता किसकी उलझन कितनी मुश्किल है


बातें दो तरह से असर करती हैं

एक; एकाएक कोई बहुत बड़ी बात

या कोई ज़रा सी बात जो धीरे धीरे बहुत दिनों में बदले

ख़ैर, अगर कुछ इतने दिन चला है

तो इसकी जायज़ वजह तो होगी ही

और किसी की वजह पर शक नहीं  किया जाता

किसी की वजह पर शक करने का हक़ किसी को नहीं है

पर सभी अपने तूफानों में उलझे हैं

किसी को नहीं पता कि

कौन कैसे तूफानों से गुज़र रहा है 


... अपने तूफानों को मैं ख़ुद समझ लूँगा



रविवार, 1 सितंबर 2019

दर्द सुकून का

पहले हर दर्द से डर लगता था 
अब लगता है ग़लत लगता था
 
अब तो दास्तान-ए-दर्द के दीवान पढ़े जाते हैं 
तब बड़ी मुश्किल से एक पन्ना पलटता था 

बहुत कुछ मिला उससे, मेरी ख़ुशनसीबी 
ग़र वो ख़ुद मिलता तो मेरा नसीब खुलता था 

सारी दुनिया में पर्त दर पर्त मैंने ढूँढा उसे
किसी पर्त में तो मिल जायेगा ऐसा लगता था 

एहमियत ख़त्म हो गयी हर सुकून, हर दर्द की
पहले हर नफ़े नुक़सान का हिसाब रखता था 

मिट गयीं सरहदें सुकून और दर्द की 'दोस्त' 
पहले सुकून में भला, दर्द में बुरा लगता था

शनिवार, 16 मार्च 2019

पता नहीं क्यों

दूर वो जो पर्दा दिखाई देता है
उस के पीछे कोई बैठा लगता है
कभी कभी वो परदे पर एक अक्स छोड़ देता है
पर कभी दिखाई नहीं देता
मैंने तो उसे कभी देखा नहीं
नहीं, असल में किसी ने भी नहीं
कौन होगा वो
और वो वहां क्यों छुपा बैठा है
क्या उसे दुनिया की ज़रुरत नहीं है
या शायद वो दुनिया से छुप रहा है

आज मैंने दूर से देखा
कुछ दूरी पर लोगों का एक झुण्ड था
वो सब उस परदे की ओर देख रहे थे
ज़ोर ज़ोर से बातें कर रहे थे
हाथ हिला-हिला कर इशारे कर रहे थे
ऐसा लगा कि वो आज तो इस पर्दे का
पर्दा फाश करके ही रहेंगे
मैं उनके नज़दीक गया
उन सबकी मिली-जुली आवाज़ों से कुछ समझ न आया
फिर मैंने एक के कंधे पर हाथ रखा
कोई फायदा नहीं हुआ
दूसरे का हाथ पकड़ के उसे टोका
तो वो दूसरा हाथ हिलाने लगा
फिर मैंने उसे अपनी ओर खींचा
उसने बेहद अजीब नज़रों से मुझे देखा
"क्या चाहिए", वो बोला
मैंने कहा, "ऐसा भी क्या हो गया
इस परदे का किस्सा तो पुराना है"
"अजी जनाब आपको पता नहीं,
उस परदे के पीछे एक नहीं दो लोग हैं"
ज़हन में एक बिजली सी चमकी
दो लोग!
कैसे? किसने देखा ?
सबने देखा
पहले एक का सर ऊपर आया
फिर छुप गया
फिर दूसरे का
और वो भी नीचे बैठ गया
दो लोग!
कोई बोला "मुझे पता है दूसरा सर किसी औरत का है,
दोनों एक साथ ऊपर नहीं आते"
जैसे वो साथ दिखाई नहीं देना चाहते
किसी को नहीं, कभी नहीं



सोमवार, 11 मार्च 2019

शायद... तुम्हें पता हो

हुई मुद्दत
कि वक़्त थम गया
और छोड़ गया तुम्हारा अक्स
मेरे चेहरे के सामने
मेरी बंद आँखों में...

इस अक्स के पीछे का चेहरा
हँसता मुस्कराता बातें करता
सीधे मेरी आँखों में देखता...
अब दिखाई नहीं देता
वो आवाज़ अब सुनाई नहीं देती

हाँ पर...
अब भी कभी कभी
मेरी हथेली पर पसीने की
एक हलकी सी पर्त का एहसास होता है
'दोस्त' वो पसीना आज भी

दो हाथों का मालूम होता है

शायद...
तुम्हें पता हो






बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

ग़ज़ल और हार

सोचता हूँ चंद शेर कहूँ
चंद... से मक़सद है कि
कम से कम इतने तो हो जाएं
कि एक ग़ज़ल की माला अपने गले में पड़ जाये
चलो ग़ज़लों की रवानगी न हो सके, न सही
एक नज़्म की नज़ाक़त ही हाथ लग जाये

चलिए पहले मुद्दा तो ढूंढ लें
जनाब शायद आप मतले की बात कर रहे हैं
मुआफ करें क़िबला... आपने सही फ़रमाया
मतला, मतला --

ख़ैर तो एक बार फिर
काम आएगी ज़िन्दगी,
ज़िन्दगी जो मक़्ते तक पहुँच गयी है
या पंहुचा ही चाहती है 
कितना कुछ है इसके दामन में
इश्क़, जुदाई, मिलन, खुशियां
हसरतें, लालच, चोटें, सुबकियां
कुछ सख़्त हिदायतें, चंद ट्रॉफियां
और भी बहुत कुछ...
अब कोशिश शुरू की जाये
तो जनाब मुलाहज़ा हो जाए --

वो कल मिले और आज बिछड़ गए
वो कल मिले और आज बिछड़ गए

पर मैंने मुक़र्रर तो सुना ही नहीं
जी शायद सुनाई नहीं दिया होगा
यहाँ शोर भी बहुत है
है ना
ख़ैर ग़ौर फरमाएं

वो कल मिले और आज बिछड़ गए
इतनी जल्दी जनाब के तेवर बदल गए

शुक्रिया शुक्रिया... आदाब

वो कल मिले और आज बिछड़ गए

इतनी जल्दी जनाब के तेवर बदल गए
अरमानों पर मेरे बादल घिर आये
मुझसे क्या ग़लत हुआ कोई बतलाये
ये बिला वजह था, यही कह जाये
जो अब तक न हुआ वो हो जाये
कोई नयी नवेली ही घट जाये
पुराना सब कुछ दफ़्न हो जाये
अच्छे वक़्त का बीज जम जाये
और बुरे दिनों पर मिट्टी पड़ जाये --

जी अब ज़रा सोचने के लिए वक़्फ़ा --
म्यां ज़रा वो पानी का प्याला इधर सरकाना
शायद इसीको पानी मांगना कहते होंगे

ग़र कुछ देर और ये सिलसिले चल जाते
तो 'दोस्त' इनमें कुछ और शेर जुड़ जाते
हमने ग़ज़लों के पैगम्बर का क्या बिगाड़ा था
हार नहीं मांगी, ग़ज़ल का हार माँगा था।

अगर आपको पसंद न आई तो क़ुसूर आपका नहीं है








मंगलवार, 25 जुलाई 2017

कुछ भी

फिर, फिर क्या हुआ
फिर? फिर क्या होना था
क्या होना था? अरे मगर हुआ क्या
तू भी यार, अरे वही जो होना था,
मतलब?
मतलब कुछ खास नहीं
हे भगवान!
क्यों इतनी भक्ति में डूब गया?
अबे भक्ति छोड
तू अपने इस व्यक्तवय का अर्थ ज़रा समझायेगा मुझे
व्यक्तवय ? अरे दो शब्द व्यक्तवय हो जाते हैं क्या?
अबे उल्लू के पट्ठे मैंने पूछा था कि उस दिन क्या हुआ था
ये लो। अब ये कौन से दिन की बात है?
एक मिनट, 
एक मिनट, रुक ज़रा
ले रुक गया
तेरे घर में थोड़ी दारू है?
'दारू'? अबे पगला गया है? दोपहर के तीन बजे हैं। दारू!
इजाज़त हो तो आपकी तारीफ़ में कुछ कहना है
इरशाद, ज़रूर कहिये
ग़ौर फरमाएं, तेरे जैसे बन्दे से सर खपाना हो
तेरे जैसे बन्दे से ग़र सर खपाना हो
तो 'दोस्त' सुबह चार बजे भी पीनी पड़ सकती है... मुक़र्रर ? नहीं ?
अरे यार तू तो वाकई बड़ा परेशान लग रहा है आज
नहीं नहीं परेशानी कैसी, मैं तो बस ऐसे ही
आज कोई और मुद्दा नहीं है तेरे पास?
अच्छा सुन
चल सुना
तूने किसी जासूसी दफ्तर में नौकरी कर ली है क्या
क्यों, तुझे कैसे पता चला
तू किसी बात का सीधा जवाब ही नहीं दे रहा

कट, बस। बढ़िया हुआ। अगले हफ़्ते दोनों टाइम पर आ जाना ।





बुधवार, 5 जुलाई 2017

ट्रेन कहानियां

ट्रेन बस छूटने ही वाली थी। रेलवे के कई कर्मचारी अपने-अपने काम में जुटे थे। एक जत्था डिब्बों के नीचे कुछ ठोक बजा के देख रहा था, तो दूसरा ऊपर चढ़ कर नज़र मार रहा था। कुछ लोग प्लेटफार्म पर भी अलग-अलग किस्म का काम कर रहे थे। मसलन, लोगों के टिकट चेक किये जा रहे थे । कुली अपने सर पर भारी सामान ढ़ो रहे थे। ट्रेन के अंदर भी रेल के कई लोग थे। कुछ सफाई देख रहे थे, कुछ यात्रियों को उनकी जगह दिखा रहे थे। बुज़ुर्गों का सामान सही जगह रख रहे थे। यात्रियों के भोजन और चाय पानी की सूची बन रही थी । जी आप शाकाहारी हैं? कटलेट और इडली है। नॉनवेज में ऑमलेट है…
इन सबके अलावा ट्रेन के आसपास, ट्रेन के अंदर और ट्रेन से दूर, बहुत दूर - और भी बहुत कुछ होता है। एक तो वो स्टेशन जहाँ से ट्रेन छूट रही है, दूसरा ट्रेन के अंदर और तीसरा वो स्टेशन जहाँ ट्रेन जा रही है। इन तीनों स्थानों में क्या-क्या घट रहा है, इसकी जानकारी सिर्फ एक ही इंसान को है, वो है इसका लेखक - जो कि मैं हूँ।

एक

हर ट्रेन एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक यात्रियों को ले कर जाती है। ट्रेनें चलती ही यात्रियों को एक से दूसरे स्थान ले जाने के लिए हैं। जिन्हें भी जहाँ जाना होता है वो उस स्थान का टिकट खरीदते हैं और टिकट में दिए नंबर वाली सीट पर बैठ जाते हैं। स्टेशन पर दो तरह की भीड़ होती है। एक तो वो जिन्होंने कहीं जाना होता है और दूसरे वो जो उन लोगों को छोड़ने आये हैं। जो लोग जा रहे हैं वो के ट्रेन के अंदर चले जाते हैं। बाकी बाहर रहते हैं। ऐसे मौके ज़रा भावुक हो जाते हैं। गार्ड की सीटी और फहराती हुई हरी झंडी से परेशानी और बढ़ जाती है। लोगों की ऑंखें भीग जाती हैं। कई तो खुल के रो लेते हैं। सफ़ेद रुमाल चेहरों का गीलापन सोखते नज़र आते हैं। जो यात्री हैं उनकी मानसिक स्थिति कुछ भिन्न होती है। वो इतने उदास नहीं दिखते। शायद अपनी यात्रा के रोमांचक कारणों से। शायद वो किसी खास व्यावसायिक काम से जा रहे हों। या फिर अपने किसी प्रिय से मिलने। या शायद छुट्टी के लिए ही सही... आख़िर ट्रेन चल पड़ती है। प्लेटफार्म वाले लोग धीरे धीरे पीछे जाने लगते हैं। क़द में छोटे होते जाते हैं। काफी देर तक कुछ सफ़ेद रुमाल दिखाई देते हैं। हिलते हुए हाथ दिखाई देते हैं। फिर सब ओझल... होने लगता है, प्लेटफार्म , फिर स्टेशन, फिर शहर...
ट्रेन और उन सबके बीच का अंतर बढ़ता ही जाता है। धीरे-धीरे लोग हर क्षण बढ़ते हुए अन्तर के बारे में सोचना छोड़ देते हैं।

दो

चलिए अब जो लोग ट्रेन के अंदर बैठे हैं, उन पर नज़र डालते हैं। इन सब लोगों के बीच का अंतर बिलकुल नहीं बदलेगा। ये सब अपनी अपनी कुर्सी पर हैं इस वजह से किन्ही भी दो सीटों के बीच की दूरी बदली नहीं जा सकती। असल में इन सबके पास कोई चारा भी नहीं है, दूर या पास आने-जाने का। इनके पास एक ही विकल्प है, बस बैठे रहो। किसी के पास ये शक्ति नहीं है कि वो किसी को या खुद को हटा सके। अगर ये चाहें तो दुसरे यात्रियों को देखें, और चाहें तो उनसे दोस्ती भी कर लें। असल में कई लोग यही करते हैं। शुरुआत एक मुस्कान देने से हो सकती है, फिर कुछ खाना-पीना, नाम-पता और कभी-कभी जोक्स भी। एक डिब्बे में बंधक जैसे बैठने से कई लोग ऊबने लगते हैं। अगर एक अपने पिछवाड़े को नीचे खिसकाते हुए मुंह फाड़ेगा तो उसके सामने वाला भी, फिर कोई और, और फिर... ट्रेन की लगातार खटखट खटखट से बोरियत का एक जाल सा बिछ जाता है . चेहरे के सारे भाव मिट जाते हैं। आँखें अलसाने लगती हैं। इसके कुछ देर बाद उनके लिए ट्रेन, उसकी खटखट, बाहर के दृश्य, सबके अस्तित्व समाप्त हो जाते हैं।

तीन

दूर कहीं एक ख़ाली प्लेटफार्म पर मंदिर के घंटे जैसी आवाज़ सुनाई दी है। टनटन टनटन टनटन। काले कोट वाला एक आदमी अपने कमरे से बाहर निकला, चारों तरफ नज़र घुमा कर फिर वापस चला गया। छोटी सी एक कैंटीन में खोमचे वाले अंगोछे से मक्खियां हटाने लगे हैं। इन आदमियों को पूरा आराम मिल गया और मक्खियों को भर पेट भोजन। चाय को चौथी बार गरम करने के लिए चढ़ा दिया गया। कुछ नीली वर्दी वाले पटरियों पर उतर आए हैं और हथौड़े से रेल के किसी लोहे के हिस्से को ठोक रहे हैं। स्टेशन मास्टर को बाहर वाले सिग्नल से कड़कड़ करता संदेश आया है। “ट्रेन पास हो रही है साहब”। इसका मतलब पांच मिनट में आ जाएगी। अरे भाई सुपर फ़ास्ट होती तो दो मिनट में निकल भी जाती। पर ये तो रुकने के लिए सिलो (स्लो) हो जाएगी ना। स्टेशन के बाहर कुछ कारें, टैक्सी, ऑटो और साइकिल रिक्शा वगैरा से लोग उतर रहे हैं। ये लोग उन लोगों को लेने आये हैं जो ट्रेन से उतरेंगे। कई लोग तो पहले से ही प्लेटफार्म पर इंतज़ार कर रहे हैं। इनमे से एक, अक्सर प्लेटफार्म किनारे से झुक कर देखता रहा है। अब तो सिग्नल हो गया है। ट्रेन भी दिखाई दे रही है। "आ गयी आ गयी...  कुली, चलो भाई चलो "। जैसे जैसे ट्रेन की दूरी कम हो रही थी, प्लेटफार्म पर लोगों की धड़कनें बढ़ रही थीं। एक युवती मेंहदी वाले हाथों में पूजा की थाली लिए है। उसमें रखा दिया किसीके झुर्रियों वाले हाथों ने जला दिया। वहां कुछ खादी के सफ़ेद कुर्ते भी हैं। उनके हाथों में फूलों के कई मोटे मोटे हार हैं। ट्रेन को देख कर बुज़ुर्ग पति पत्नी आगे बढ़ते हैं। खादी के धक्के से आदमी चौंक जाता है। ट्रेन एक लम्बी तीखी सी आवाज़ करते हुए धीरे धीरे रुक जाती है। फूलों के हार अब एक खादी की मोटी गर्दन में हैं। मिलिट्री की टोपी के आगे पूजा की थाली घूमती है। एक लड़की गले में स्टेथेस्कोप लिए बूढ़े माँ बाप के चरण स्पर्श करती है। गार्ड की सीटी सुनाई देती है। हरी झंडी लहराती है। यहाँ के सभी कलाकार अब प्लेटफार्म खाली कर रहे हैं।

ट्रेन एक बार फिर चल पड़ी है, अगली कहानी लिखने।



रविवार, 2 जुलाई 2017

क्या करें क्या ना करें

अब वक़्त आ पहुंचा है वहां, जहाँ
इसे बहुत वक़्त पहले पहुँच जाना चाहिए था 
वक़्त की मीठी बातों में उलझे रहे हम 
हमें इसका इंतज़ार नहीं करना चाहिए था
अगर कुछ करना था तो उठते
और उठ कर, कर देते 
किसीकी हामी या आँख के इशारे को नहीं देखना चाहिए था 
चलो अब तो जो हुआ सो हुआ,
कर चुके जो भी करना,
या ना करना चाहिए था 
बड़े खुश थे हम हज़ारों दिन जेब में लिए 
जोश में खर्च कर दिए आधे,
जो क़तई नहीं करना चाहिए था 
कोई तो बताये कि हमने क्या सही, क्या ग़लत किया 
क्या हम वो सब ही करते रहे जो हमें ना करना चाहिए था?
किस तरफ चलते
किस बात की कोशिश करते 'दोस्त' 
मंज़िल ख़ुद वहां डेरा डाले बैठी थी
जहाँ पहले हमें होना चाहिए था



मंगलवार, 27 जून 2017

चाय वाली मुहब्बत

अरे सुनो मुझसे मुहब्बत करोगी ?
सुनो तो सही 
एक मिनट, एक मिनट, बस एक मिनट
मोहब्बत की ही तो बात कर रहा हूँ 
शादी की नहीं 
मोहब्बत में किसी का कुछ नहीं जाता 
शादी में तो तुम्हें पता ही होगा।
ज़िन्दगी दांव पे लगानी पड़ती है 
वो ज़िन्दगी भर का खेल जो है 
प्यार का क्या है 
मुझे कोई पसंद आयी 
किसी को मैं पसंद आया 
"नमस्ते जी क्या आप मेरे साथ एक कप चाय पिएंगी"
"ठीक है पर पहले एक गिलास पानी" 

देखा आपने
बस इतनी सो बात है 
इसमें क्या डरना 
चाय के दौरान कुछ बातें होंगी ही 
शायद फोन नंबरों की अदला बदली हो जाये 
फिर शायद फोन हो भी जाये 

एक कप चाय, एक कॉफी, एक वडा पाव 
कुछ खाली, कुछ थोड़ी भरी लोकल ट्रेन
दोनों के बीच एक बिसलरी की बोतल 
बदला बदला सा पानी का स्वाद 
एक जाना अनजाना स्टेशन 
शहर कम गाँव ज़्यादा 
फिर कुछ दूर पर वो मशहूर ढाबा
खाना बढ़िया था 
बिल भी बुरा नहीं था 
"अरे वेटर वो ऊपर होटल भी है क्या"
"जी साब आप जैसे कई जोड़े आते हैं ना
वो रुक जाते हैं; दो चार घंटे  
कभी कभी सारी रात भी 
उनके लिए है "

निगाहें मिलीं उनमे से एक जोड़ी झुकीं 
एक रुकी रहीं 
एक दबी हलकी सी आवाज़,
अगले हफ्ते आएंगे, आज नहीं 

मैंने कहा था न मुहब्बत कोई टेढ़ी खीर नहीं है 
बल्कि काफी आसान है 

'दोस्त' मुझे तो पीनी है चाय 
आपको नहीं चाहिए तो कोई दिक़्क़त नहीं
हैव ए गुड डे

सोमवार, 26 जून 2017

कहानी, 'की' और 'का' की

का: आओ यहाँ बैठें।
की: यहाँ?
का: क्यों? ये जगह ठीक ना हो तो कहीं और चलते हैं।
की: नहीं नहीं मैं तो यूँ ही कह रही थी।
का: नहीं तुम शायद सही हो, चलो ज़रा उस तरफ देखते हैं।
की: हाँ वहां से झील का नज़ारा ठीक से दिखाई देगा।
का: हाँ चलो।
की: बारिश में कितनी सुन्दर लग रही है न झील ?
का: ठीक कह रही हो।
की: सब कुछ धुल गया है। साफ़ सुथरे पेड़। चमकदार हरे पत्ते।
का: ये, ये जगह ठीक है क्या ?
की: ये? ये जगह तो ठीक है पर देखो गीली तो नहीं है?
का: हाँ, है तो गीली। कपडे ख़राब हो जायेंगे।
की: नहीं बाबा। वो हुआ तो घर में मुश्किल हो जाएगी।
का: अब बारिश के मौसम में सूखी घास तो मिलेगी नहीं।
की: तब तो मैं थक जाउंगी।
का: वो पेड़ है न, वो बड़ा और घना वाला। चलो उसके पीछे चलते हैं।
की: वहां जगह होगी क्या ?
का: जगह का तो पता नहीं पर वो जगह थोड़ी छुपी सी है। है न?
की: छुपी ? तो उससे क्या होगा ?
का: कुछ खास नहीं। वहां हमें कोई देख नहीं सकेगा।
की: अरे, तो वहां क्यों जाएँ ?
का: तुम्हें मेरे साथ अकेले क्यों आना था ?
की: मुझे ये झील देखनी थी और बाइक पर तो दो ही बैठ सकते हैं न।
का: क्या !
की: रुको मैं कुछ फोटो ले लूँ फिर वापस चलेंगे
का: तुम अपना काम कर लो मैं बाइक के पास हूँ।
की: ठीक है मैं दस मिनट में आयी
कैमरे की क्लिक, क्लिक, क्लिक...।
फिर क्लिक, एक और क्लिक...

बाइक की किक
और कहानी ख़त्म 



बुधवार, 10 मई 2017

क़ीमत

क़ीमत 
हर इंसान लगाता है क़ीमत 
हर एक चीज़ की
हर इंसान की 
इसकी, उसकी, घर की, गाड़ी की 
ज़मीन जायदाद की 
यहाँ तक दोस्तों की, मां बाप की
भाई बहनों की 
घर बार की, देश दुनिया की 
दूसरों के विचारों की 
उनकी समझ की, समझदारी की 

... अपनी भी
माफ़ करें 
शायद यहाँ कुछ अटपटा हो गया
उल्टा पल्टा हो गया 
जो पहले आना था वो बाद में आया
क़ीमत खुद की 
यानि एक ऐसी बेशक़ीमती चीज़ की
जिसका ख़ुद की नज़र में 
कोई मोल नहीं हो सकता
ख़ुद पर कोई दाम नहीं लिखा जा सकता 
कोई लिखता भी नहीं 
अगर किसीने लिखा भी, 
तो वो ग़लत होगा  
अपनी नज़र में ज़्यादातर लोग 
कुछ ज़्यादा ही क़ीमती होते हैं 
या यूँ कहिये बेशक़ीमती होते हैं
हालांकि उनके बारे में दूसरों का ख़याल 
कुछ दूसरा ही होता है
ठीक वैसे ही जैसे इनका औरों के बारे में... 
चलिए ये सब अंदर की बात है 
उसके हर किसीके के मन की बात है 
घर घर की बात है 
फिर भी इस दुनिया में 
ज़्यादातर लोग अपनी क़ीमत को 
अपने दिल ही में छुपाये 
अपने साथ लेकर चले जाते हैं 
दुनिया को पता ही नहीं चल पाता 
कि खुद की नज़र में वो 
कितने मंहगे या सस्ते थे

शनिवार, 6 मई 2017

ये दिल ये पागल दिल मेरा

ये दिल मेरा 
सीने में मेरे 
ज़रा इस तरफ 
हाँ यहीं बीच में 
थोड़ा सा इधर 
हाँ बांयें, थोड़ा और 
बस यहीं 
ये दिल मेरा
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया 
टूट फूट गया
पहले तो ये ला दो 
वो दिला दो 
ये वाला नहीं वो वाला चाहिए 
लाल नहीं पीला 
हरा नहीं नीला 
न ही कभी चैन से बैठा 
न मुझे ही आराम करने दिया  
पर अब 
अब कुछ कहता ही नहीं 
कहीं रूठ तो नहीं गया
हे भगवान  
टूटा फूटा और अब रूठा
ये दिल है या किसीकी दिलरुबा 
जब देखो नखरे 
अरे दिल मेरा है 
और मुझी से नाराज़ रहता है 
सीने में जगह हथिया ली है
और सारा कारोबार समेट लिया 
अब मैं अपने दिमाग़ को लेकर कहाँ जाऊं 
इसकी तो कोई क़द्र ही नहीं करता 
कोई नहीं पूछता 
सब कहते हैं दिल का अच्छा है
वरना बेवकूफ है
हद्द हो गयी जनाब
न सोचा न समझा
और सर पे बेवकूफ का ताज रख दिया 
आपकी इसी बात ने तो दिल तोड़ दिया 
जी यही ... 
दोस्त, ये दिल मेरा 
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया है 
टूट फूट गया है ...  





मंगलवार, 2 मई 2017

कहीं ये वो तो नहीं

इतना अँधेरा !
क्यों हैं इतना अँधेरा ?
और कोई दिखाई क्यूँ नहीं देता 
क्या इस दुनिया में सिर्फ मैं ही बचा हूँ 
और बाकी दुनिया? वो कहाँ है 
दुनिया वाले कहाँ हैं 
वो सब लोग... 
लाखों करोड़ों
क्या कोई बम फट गया 
या कोई भयानक आग लग गयी 
पर... इस अँधेरे में आग भी नज़र नहीं आ रही 
धुआं... वो भी नहीं 
ये... ये क्या जगह है 
कौन सा शहर है 
ये सड़क है या कोई वीराना 
किसी का कोई घर 
इंसान की कोई आवाज़
कोई हरकत किसी पेड़ की 
हवा का कोई झोंका 
उफ़... क्या मैं इस दुनिया में अकेला ही हूँ 

एका-एक घुप्प अँधेरे में 
अँधेरे का ही एक टुकड़ा हिला 
... ज़रा सा
और उस अंधेरे से निकल कर 
मेरी ही डगर की तरफ आने लगा 
...ओह तो मेरे जैसा एक और भी है 
मैंने सोचा चलो कोई तो मिला 
पर मन में डर भी था 
पता नहीं कौन...
दोस्त या कोई और 
पर अँधेरे के उस टुकड़े ने दुश्मन जैसी कोई हरकत नहीं की 
वो बेहद आहिस्ता से कुछ नज़दीक आया 
फिर रुक गया 
फिर चला फिर रुक गया 
फिर चला...
इस रुकने चलने में हमारी दूरी काफी कम हो गयी 
मुझे लगा ये दोस्त हो या ना हो 
दुश्मन तो बिल्कुल नहीं है 
धीरे धीरे वो साया मेरे बिल्कुल पीछे आ गया 
मैं ज़रा डरा, हिचकिचाया
तो वो भी वहीं रुक ही गया 

फिर... कुछ बेहद अविस्वशनीय हो गया 
मेरे कंधे पर एक हाथ आया 
मैं सन्न रह गया 
पीछे मुड़ न सका 
दो तरह के डर मन में लबालब भरे हुए थे 
दोनों ही हालातों में दिल को संभालना असम्भव होगा
... ये कोई अनजाना दुश्मन न हो  
या वो दोस्त सारी उम्र जिसका इंतज़ार किया



बुधवार, 19 अप्रैल 2017

आसान मुश्किलें

मुश्किलेँ ?
मुश्किलें हैं तो क्या हुआ
नामुमकिन तो नहीं हैं
जब से मैंने इनको तव्वजोह देना बंद कर दिया
ये मेरे आगे पीछे घूमने लगीं
मैंने फिर भी हवा न दी
अरे भाई जब इंसान का काम आसानी से चल जाता है
तो मुश्किलों की क्या ज़रुरत है
तो जनाब मेरे इन नए तेवरों से
मुश्किलों की शक्ल उड़ी उड़ी लगने लगी है
घबरा सी गयी लगती हैं
ख़ैर बहुत परेशान कर लिया इन्होनें मुझे
इन्हें अपने पर कुछ ज़्यादा ही घमंड हो गया था
और घमंड तो एक दिन टूटना ही था
ये हमेशा ही टूटता है
सही वक़्त आ जाये तो किसी भी मुश्किल का घमंड
आसानी से टूट जाता है


गुरुवार, 26 जनवरी 2017

जुर्रत और ख़ता

धीर धीरे जुर्रतों को मेरी
मिल गया दर्जा एक ख़ता का
आहिस्ता आहिस्ता ही सही 
इस मक़ाम तक पहुँच ही गयी ज़िन्दगी
ग़नीमत है

तुम्हें याद तो होगा 
मैंने पहले ही कह दिया था 
मेरी पहली ज़ुर्रत पर ही टोक देना 
बात को वहीँ रोक देना 
तो शिकायत होगी

मैं समझ जाऊंगा
सुलझ जाऊँगा, बदल लूंगा रास्ता
तुम सही तरफ हो लेना
मैं बायें हाथ मुड़ जाऊंगा 

ख़ैर 'दोस्त' अब तो बीती बीत चुकी 
मेहरबानी उनके बर्दाश्त की
जो बर्दाश्त कीं जुर्रतें मेरी
फिर गले लगाया खता को भी
... अब और क्या इनायत होगी


शनिवार, 21 जनवरी 2017

वक़्त बराबरी का

शायद वक़्त आ गया है 
बग़ावत का 
उनसे बराबरी का 
बराबरी के जवाब का 
वैसे ही सख़्त जवाब का 
कभी कभी सोचता हूँ 
क्यों न मैं भी उन जैसा बन जाऊं
मानता हूँ मेरे लिए आसान नहीं होगा 
दूसरों जैसा बनना
उन जैसी गन्दी नाली में उतर कर 
उनसे लड़ना 
उनकी ज़बान में 
उनके पैतरों से 
उन्हें जवाब देना 
असल में मैं वैसा, उन जैसा नहीं हूँ 
पर क्या करूं कब तक जाने दूँ 
उनको सबको 
भर चुका है मेरा प्याला 
दुनिया की कड़वी बातों से 
ऊंचे सुर की आवाज़ों से ...  
अब बुरा न मानें
पर वक़्त निकल गया 
मुरव्वतों का 
मीठी ज़बान का 
कही अनकही करने का 
देखी अनदेखी करने का 
सुनी अनसुनी करने का 
अब तो जनाब यूँ है कि 
उधर से अगर एक ग़लत लफ्ज़ का इस्तेमाल हो गया 
या ऊंचा सुर पकड़ लिया
तो दोस्त समझदारी इसीमें होगी 
कि बराबरी के जवाब के लिए तैयार रहियेगा

सोमवार, 2 नवंबर 2015

बेवफ़ा ख़याल

आप देख रहे हैं इसे 
ये है एक ख़्याल
जो मेरे घर आया, मुझसे मिला
और कहा मुझे तुम पसंद आये
क्या मैं तुम्हारे साथ रह सकता हूँ
तुम्हारी क़लम की रोशनाई से ढ़ल सकता हूँ
हड़बड़ी में हिचकिचाते हुए
गड़बड़ी में क़लम उठाते हुए
मैंने कहा क्यों नहीं
तुम मुझे इतनी इज़्ज़त दे रहे हो
तो आओ, रहो मेरे पास
मेरे ख़्यालों में
मेरी कविता में, शायरी में

मुस्करा कर वो मेरे काग़ज़ पर उतर आया
अब वो सबके सामने इतराता है
अपनी जगह दिखाता है
बड़ा ख़ुश नज़र आता है

पर जनाब इससे भी बेहतर
कई ख़ूबसूरत ख़्याल भी मिले
दूर से बड़े मज़ेदार भी लगे
एक तो 
नहाते वक़्त मेरे ग़ुसलख़ाने में पहुँच गया  
बड़ा ही अटपटा लगा मुझे
पर सोचा इतना ख़ूबसूरत ख़्याल !
मैंने उसका नाम ले लिया
एक दो बार ज़ोर से बोल भी दिया
कि याद रह जाए
मेरे साथ मेरे ज़ेहन में बस जाए
पर जनाब मुझे ख़ूबसूरती पर भरोसा नहीं है
उन्हें घमंड होता है ख़ुद पर
वो किसी और की कविता बनना चाहते हैं
किसी ज़्यादा मशहूर और अमीर की
जिसका 
पहले से ही बड़ा नाम हो
उसकी दुनिया चमकदार हो
और ऊंचे दाम हों
ख़ुशी ख़ुशी मैं गुसलखाने से बाहर आया
कागज़ क़लम दावत को सजाया
बड़े शौक़ से 
'दोस्त' जो सर झुकाया
तो उस ख़्याल को नदारद पाया



शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

चंदा मामा दूर के

आओ कल्पना की उड़ान भरें
अपने कदम चांद पर धरें

चलो परखें चांद की ज़मीन को
आधे अँधेरे आधी रोशनी को

अपना भार चांद पर जांचें
हिरन के जैसे भरें कुलांचें

पहाड़ और पाताल में भागें
कोई पीछे तो कोई आगे

तोडें कीर्तिमान ऊंची कूद के
सब मिल गायें चंदा मामा दूर के











शनिवार, 25 जुलाई 2015

वो कहां मैं कहां

सपनों की दुनिया में है उसका जहांऔर मैं हूँ यहां
खबर नहीं वो है कहां, कितनी दूर है मुझसेमैं हूँ जहां

उसके दोस्तों की महफ़िलवो खुश गवार लम्हे
मुझे मिला साथ इस तन्हाई कामैं हूँ जहां

वो खिलखिलाती शोख़ नज़रें  और हंसी के झरने
मुरझाए सपनों का गुलिस्तां है यहाँ, मैं हूँ जहां

दोस्तों का साथ, वो बाहों के हार, और दिल की बातें 
ढूंढता हूँ खुशियाँ अपने आगोश मेंमैं हूँ जहां

काश मेरे क़दम पहुँच पाते ज़ुल्फ़ के उस मोड़ तक
पर कहाँ वो ज़ुल्फ़, वो हसीन मोड़ और मैं हूँ कहां

काश कोई मोड जोड़ देता हमारी ज़िन्दगी को 'दोस्त'
पर नहीं थी किस्मत में तेरी रहगुज़रमैं हूँ जहां

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...