शुक्र है ना तुम पहुंचे, वरना हम पर ही इल्ज़ाम होता
तेरे वादे पर जिए हम, तो ये जान झूठ जाना
तुम पर भी भरोसा होता, जो दूसरों पे किया होता
कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीमकश को
धरा रह जाता तीर तेरा, जो मेरा निकल गया होता
कहूँ किससे मैं की क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है
ग़र दिन में विसाल होता, तो ज़िक्र-ए-शब-ए-ग़म न होता
ये मसाइले तसव्वुफ़ ये तेरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे हम 'दोस्त' समझते जो न हरजाई होता