ठीक है, ठीक है, माना ।
सोमवार, 2 मार्च 2026
डर नूतन से
बुधवार, 18 फ़रवरी 2026
ऐसा भी होता है
सोचता हूँ कि ऐसा क्या है
जिसके बारे में सोचने की ज़रुरत नहीं है
मैं जो कुछ भी अभी सोच रहा हूँ
या सोच चुका हूँ … क्या उतना ही काफ़ी था
वहां काफ़ी भीड़ भाड़ थी
सब थे छोटे-बड़े, पुरुष-महिलाएं
बच्चे, बूढ़े, जवान
कुछ मेरे जैसे, कुछ उनके जैसे
कुछ छड़ी लेकर चलने वाले
कुछ कूदने वाले भागने वाले
छड़ी वालों को सहारा देने वाले
उन्हें गेट तक छोड़ के आने वाले
उनके कार में बैठने का इंतज़ार करने वाले
खड़ी होती नानी के पीछे हाथ रखने वाले
कुर्सी सीधी करने वाले
रसोई में हँसती-मुस्कुराती
चाय नाश्ता तैयार करतीं
बेटियां भतीजियां
लाइन से सबको प्लेटें पकड़ाते हुए जब नानी की बारी आयी
तो बच्ची को हंसी आ गयी
इतनी सी देर में नानी की आँख लग गयी थी
नानी उठो, नानी .. प्लेट पकड़ो
प क ड़ो
नानी का चेहरा ध्यान से देखते हुए
बच्ची चुप हो गयी
उसने चाचा जी की तरफ देखा
और पीछे हट गई
सब बूढ़े जवान नानी के इर्द गिर्द आ गए
सबको समझ आ चुका था
बेटियां भतीजियां आंसुओं में डूब चुकी थीं
अब किसीको नानी पीछे हाथ रखने की ज़रूरत नहीं है
बूढ़े बच्चों को सांत्वना दे रहे थे
कोई बात नहीं, कोई बात नहीं
होनी को कौन रोक सकता है
बस बस... ज़्यादा नहीं रोते
ये सब भी ज़िंदगी ही तो है…
कभी कभी ऐसा भी हो जाता है
कुछ नहीं, पर अँधेरा तो है
इतना अँधेरा !
कहाँ से आया इतना सारा अँधेरा
ये अँधेरा इतना घना क्यूँ है
सारी सड़कें गलियां बगीचे बाज़ार
पता नहीं मैं कहाँ हूँ
कोई आवाज़ भी नहीं है
अँधेरे में कोई आवाज़ क्यों नहीं सुनाई दे रही
पता नहीं ये सब्ज़ी का बाजार है या मछली का
दूध का या मिठाइयों का या सोने चांदी का
ये अँधेरा सिर्फ बाहर की दुनिया में ही नहीं है
ये मेरे घर के आँगन में, सीढ़ियों पर, रसोई में
और शायद मेरे दिल में
मेरे रोम रोम में घर कर चुका है
शायद मेरा चेहरा भी काला हो गया होगा
मेरे हाथ, पैर, पेट, पीठ
सब कुछ अँधेरे रंग में रंग गए होंगे
शीशा भी कैसे देखूं
शीशा पता ही नहीं कहाँ है
कुछ भी नज़र नहीं आ रहा
अपनी हथेली तक नहीं
क्या ये रात है?
पर कहाँ गया वो चाँद ?
वो चाँद, वो टिमटिमाते सितारे
मेरी रोशनी के सहारे
आज ठंड भी बहुत है
काश ऊपर कुछ गरम होता
कोई ऊनी कोट या कम्बल
या - सिर्फ तुम्हारे होने का एहसास
तुम्हारी नज़दीकी की गरमाहट
नरम हाथों की पकड़
उन खूबसूरत आँखों की रोशनी
आलिंगन की गरमी
ज़िन्दगी कितनी खाली सी हो चुकी है
कितनी नीरस, ठंडी
अब इस घने अँधेरे में मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ
और कैसे ढूँढूँ
किस तरफ जाऊं
इस दुनिया में कोई भी ना दिखाई दे
कोई बात नहीं
पर तुम न दिखोगी
तो ये ऑंखें किस काम की
मुझे इनकी ज़रुरत ना होगी
तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में न हो
तो मेरी नब्ज़ किस काम की
तुम्हारा सर मेरे सीने पर न हो
तो ये धड़कन किस
काम की
मेहमान दर्द
"कौन हो भाई दिखाई क्यों नहीं देते"
एक सकपकाई सी आवाज़ ने कहा,
"जी अभी तक तो नहीं"
"नहीं? तो, फरमाएं, कौन हैं आप"
"जी मैं... मैं एक दर्द हूँ"
"दर्द ! आपको मुझसे क्या सरोकार है"
"जी... रहने को जगह मिलेगी कुछ दिनों के लिए"
"क्या? रहने को जगह?
नहीं भाई मुश्किल है मेरे लिए आपको जगह देना
"ये तो आप ज़्यादती कर रहे हैं
नई नई तरह तरह की अजीबो ग़रीब परेशानियों का
तो जनाब अगर आप हमें रहने की जगह दे दें
आखिऱ हम इस नतीजे पर पहुंचे 'दोस्त'
कि दर्द और परेशानियां तो हमेशा ही रहेंगी
पर आप उनके साथ दोस्त बन के रहेंगे
डर नूतन से
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