शनिवार, 18 नवंबर 2023

सफ़ाई

आज ये ख़्याल आया
कि अगर किसी वजह से
आंसू बहने लग जाएँ
और आँखें साफ़ हो जाएँ
नज़र भी ठीक हो जाये
दिखने लग जाये कि 
दुनिया कैसी है
साफ़ सुथरी या मैली कुचैली
लोग कैसे हैं
कैसे चलते फिरते हैं
वो उचित व्यवहार कर रहे हैं,
या अनुचित, अथवा कदाचित निकृष्ट 
संसार में हिंसा कितनी है
किसी जगह पर किसी समय पर
प्रेम या अहिंसा भी नज़र आती है या नहीं
चलो इन सब पर तो मेरा नियंत्रण है नहीं
फिर भी और कुछ नहीं तो
दुनिया से मिले ग़मों के
तोहफ़े से मिले
आंसुओं ने
मेरी आँखें तो साफ़ कर दीं



रविवार, 29 अक्टूबर 2023

कुछ अनमोल पल

एहसास की रोशनी

एकाएक एक दिन

कर गयी रोशन 

इस दिल के कुछ ख़ाली अँधेरे खाने 

पुरानी बंद किताब के पन्ने 

काफी अजीब लगा 

बहुत सारी पुरानी चीज़ें,

चेहरे, लोग, बातचीत

एक नया शहर, नया घर, नया कमरा 

नई ज़िन्दगी, नई नौकरी, नई बेकारी

हाँ, नए परिवार में चंद पुराने दोस्तों ने माहौल बदल दिया 

हाथ मिलाना गले लगना शोर मचाना 

"अरे तुम भी ! यहाँ?  वाह मज़ा आ गया।"

इतना जाना पहचाना तहलका

जैसे बीच समुद्र एक हरा भरा द्वीप मिल गया हो 

मेहमान अभी कमरे के दरवाज़े पर ही था 

अंदर संदूक रखने का भी मौका नहीं मिला था 

शोर भी बंद नहीं हुआ था


उस परिवार के साधारण से लोग चारों ओर खड़े थे 

इस हंगामे के मज़े ले रहे थे 

भरा पूरा परिवार था 

बा थीं तीन बच्चे और मम्मी पापा 

कुछ मुस्करा रहे थे कुछ हंस रहे थे 

बा को ये सब पागलपन लग रहा था

एक लम्बी सी निक्कर पहने तुकाराम   

एक हाथ से अपनी हंसी छुपा रहा था 

इन सबसे अलग सफ़ेद फ्रॉक में एक बच्ची थी 

भावरहित चुप और शांत

उसका दांया कन्धा दीवार पर टिका था 

पर उसकी बड़ी-बड़ी गोल आँखें 

मेहमान पर टिकी थीं 

मेहमान ने एक सरसरी सी नज़र उस पर डाली 

और देखा कि

उसकी मासूम निगाहें उस पर ही टिकी थीं 

ये देख कर मेहमान ने उसे नमस्ते कह दिया 

उस बच्ची को ये पता नहीं था कि

किसी को लगातार इतनी देर तक देखना

मासूमियत की निशानी है

और मेहमान को ये पता नहीं था कि

अपनी ज़िन्दगी के इस बेहद नाज़ुक मोड़ पर

वो कितनी सही जगह आ गया है



बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

एक अनजानी वजह

कुछ दिन पहले कुछ बदल गया

आहिस्ता से ...

बेहद आहिस्ता से

कई दिनों तक इसकी ख़बर भी नहीं हुई

लगा ही नहीं कि कुछ बदला है

सब ठीक ही लगता रहा


आख़िरकार जब जो जैसा रहता था

वैसा नहीं रहा

कुछ, जो रोज़ ही होता रहता था

अब नहीं हो रहा

एक अर्से से


मुझे पता है कि अगर कोई चीज़

बहुत धीरे-धीरे बदले तो समझ नहीं आती

पता ही नहीं चलता

लगता रहता है होगा कुछ,

ठीक हो जायेगा


ज़िन्दगी में सब इतने मसरूफ़ हैं

अपनी अपनी उलझनों के साथ

क्या पता किसकी उलझन कितनी मुश्किल है


बातें दो तरह से असर करती हैं

एक; एकाएक कोई बहुत बड़ी बात

या कोई ज़रा सी बात जो धीरे धीरे बहुत दिनों में बदले

ख़ैर, अगर कुछ इतने दिन चला है

तो इसकी जायज़ वजह तो होगी ही

और किसी की वजह पर शक नहीं  किया जाता

किसी की वजह पर शक करने का हक़ किसी को नहीं है

पर सभी अपने तूफानों में उलझे हैं

किसी को नहीं पता कि

कौन कैसे तूफानों से गुज़र रहा है 


... अपने तूफानों को मैं ख़ुद समझ लूँगा



शनिवार, 4 फ़रवरी 2023

सलाह एक दोस्त की

मैं कौन था
और क्या बन गया हूँ
पहले बेहतर था, या अब हूँ
पहले कुछ था भी,
या अभी की तरह ही कुछ नहीं हूँ
अगर कुछ था तो क्या था
और अगर अब कुछ हूँ तो क्या हूँ, कौन हूँ
पर बीच का वो समय
जब मैं कुछ से कुछ और में बदल रहा था
क्या मुझे उसके बारे में नहीं सोचना चाहिए?
वो भी आखिर मैं ही था
वो मेरे ही जीवन का समय था
हो सकता है वो समय ही बेहतर रहा हो
जब मैं बदलाव के तूफ़ानों से गुज़र रहा था
जी, बदलाव
ये शब्द कितना अर्थपूर्ण,
कितना पूर्ण लगता है
अगर चीज़ें बदल नहीं रही हैं
तो वो वास्तव में हैं ही नहीं
वो अस्तित्वहीन हैं
अर्थात शायद जब मैं 'कुछ' बन जाऊँगा
और फिर मेरा बदलना बंद हो जायेगा, 
उस समय निश्चित रूप से
मैं कुछ नहीं रह जाऊँगा
तब मैं समाप्त हो जाऊँगा 
मैं सांस लूँगा, मेरा दिल धड़केगा 
केवल उतना ही 
मेरा व्यक्तित्व समाप्त हो जायेगा 

इसलिए वो बनो
वो जीवन जिओ
जिसमें बदलते हुए समय के थपेड़े हों
उत्सुकता, व्याकुलता, चिंता, घबराहट
जीवन की ऐसी सारी सामान्य बातें
 
राह जीवन है 'दोस्त'
मंज़िल जीवन नहीं है
वो केवल एक पड़ाव है


सोमवार, 2 जनवरी 2023

क्या है वक़्त

कब शुरुआत हुई वक़्त की
क्या ये कहीं छुपा बैठा था
कि एकाएक साथ हो लिया
या ऊपर से टपक पड़ा
और सामने आ गया
वक़्त के पहले कोई ये नहीं सोचता था
कि देर हो गयी
या देर हो रही है
जल्दी चलना पड़ेगा
वरना अँधेरा हो जायेगा
दुकान बंद हो जाएगी
दोस्त के यहाँ खाना ठंडा हो जायेगा
वग़ैरह...
वक़्त की वजह से 
दुनिया भर के झंझट दुनिया के सामने आ गए
क्योंकि अब वक़्त सबके साथ चल रहा है
क्या मुसीबत है
जब हम दोस्त के यहाँ जाते हैं
हमारी छाया साथ-साथ चलती है
वास्तव में वो छाया नहीं, वो वक़्त ख़ुद है
जो हम सबको बता रहा है
जल्दी करो, और जल्दी
या शायद, अब कुछ नहीं हो सकता
गाड़ी निकल गयी
पास की धर्मशाला में रुक जाओ
पर ज़रा जल्दी
वरना आख़िरी कमरा भी बिक जायेगा
छाया की लम्बाई हमें संकेत देती है
कि हमें क्या करना है
और किस गति से करना है
वक़्त दुनिया को चलाता है
हम सब लोगों के ज़रिये

दूसरा दृष्टिकोण


वक़्त की वजह से कई चीज़ें अपने आप भी होती जाती हैं
बोनस की तरह ऑटोमेटिक
अब वक़्त खाली तो बैठ नहीं सकता
रुक भी नहीं सकता
कुछ न कुछ तो करेगा ही बेचारा
आपकी उम्र बढ़ा देगा
कमज़ोरी बढ़ा देगा
बाल सफ़ेद कर देगा
ज़्यादा जोश आया तो बाल ... ग़ायब ही कर देगा
आवाज़ कमज़ोर कर देगा ...
पर ये सब कुछ ग़लत ही करता है
ऐसा भी नहीं है
ये बहुत कुछ सही भी करता है
आपका अनुभव और सहनशक्ति बढ़ाता है
बातचीत का तरीक़ा बेहतर कर देता है
सलीक़ा आ जाता है
वक़्त की वजह से शायद
आप सुर में गाने लगें
बेहतर लेखक बन जाएँ
ऐसी ही इधर-उधर की छोटी-मोटी वजहों से
शायद समाज में आपकी इज़्ज़त बढ़ जाये
घर में  मिठाइयाँ आने लगें
हो सकता है आपको कोई पुरस्कार 
मिल जाये

ऐसे ही किसी वक़्त शायद
आप वक़्त को धन्यवाद भी दे दें। 




डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...