गुरुवार, 21 जनवरी 2016

नासमझ समझ

तन्हाई की तक़लीफ़,
परेशान न कर पायी मुझे
जुदाई की ज़हमत,
रुला ना पायी मुझे
ऐसा भी नहीं कि मैं ही
पत्थर-दिल हूँ
पर इस दिल की अगन
झुलसा न पायी मुझे
वो भी एक वक़्त था
कि हम उम्मीदों का शौक़ रखते थे
बैठे बैठे खिड़की पे
तुम्हारी राह तकते थे
इंतज़ार में पथरायी ऑंखें
रुला न पायीं मुझे
अब क्या कहें 'दोस्त'
कि क्या था हमारे बीच
क्या ये वो था
जो तुम न समझ सके
या वो, जो समझ न आया मुझे



शनिवार, 16 जनवरी 2016

... तो कितना अच्छा होता

अगर उसे सीने से न लगाया होता
अपना न बनाया होता
तन्हाई से न घबराया होता 
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता 

उसके चेहरे पे न ये दिल आया होता 
उसकी चाहत ने मुझे न भरमाया होता 
न उसे सर आँखों पर बिठाया होता 
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता 

उसकी दोस्ती ने दिल को न उलझाया होता 
सोचने की ताक़त को न डुबाया होता
एक के लिए सबको पराया न बनाया होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता 

इस रस्ते पर 
मैंने खुद को, इतना न बढ़ाया होता 
ग़र ज़मीं पर ही अपना घर बनाया होता 
एक बेवफ़ा को न अपना 'दोस्त' बनाया होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता







डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...