अगर उसे सीने से न लगाया होता
उसके चेहरे पे न ये दिल आया होता
उसकी दोस्ती ने दिल को न उलझाया होता
इस रस्ते पर मैंने खुद को, इतना न बढ़ाया होता
अपना न बनाया होता
तन्हाई से न घबराया होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता
उसके चेहरे पे न ये दिल आया होता
उसकी चाहत ने मुझे न भरमाया होता
न उसे सर आँखों पर बिठाया होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता
उसकी दोस्ती ने दिल को न उलझाया होता
सोचने की ताक़त को न डुबाया होता
एक के लिए सबको पराया न बनाया होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता
इस रस्ते पर मैंने खुद को, इतना न बढ़ाया होता
ग़र ज़मीं पर ही अपना घर बनाया होता
एक बेवफ़ा को न अपना 'दोस्त' बनाया होता
तो कितना अच्छा होता, तो कितना अच्छा होता

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