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शुक्रवार, 20 जून 2025

मिज़ाज गर्म है

गए ज़माने शांति के
ठंडक के 
ठंडे दिमाग़ के 
सलीक़े के, तरीक़े के 
बात चीत के 
समझने समझाने के 
सुलझाने के 
उसकी उसे लौटाने के 
अपना आधा भी,
उसे दे आने के 

क्यों लगते हैं सब इतने नाराज़ ?
कोई भी खुश नहीं 
जैसे कभी ख़ुशी देखी ही नहीं 
मानो दुश्मनी कर ली हो हंसी से 
मुस्कान से मुंह फेर लिया हो 
कितनी ज़मीनों का ख़ून 
सूख नहीं पाया
सूख ही नहीं पाता 
बहाने जो हैं उनके पास
ताज़ा ख़ून बहाने के 

अब तो प्यार जैसी चीज़ भी 
जान लेकर हासिल की जाती है 
चाकू के दिखा कर  
चोट पंहुचा कर 
कपड़े फाड़ कर 
किसी को किसी का ख़ौफ़ नहीं 
मरने का, मारने का
ज़िन्दगी तबाह हो जाने का
राम जाने क्या वजह हैं उनकी 
क्या बहाने हैं उनके 

सुना है लाखों बरस बाद 
ये सूरज आज से कहीं ज़्यादा गरम होगा 
हमारे दिमाग़ की तरह
गरम होता ही जायेगा 
हमारे और नज़दीक आयेगा 
आता ही जायेगा
हमें डरायेगा तड़पायेगा 
झुलसायेगा 
और फिर शायद … 
हमें निगल जायेगा 

सूरज भी देख रहा है हमको 
सीख रहा है चुपचाप हमसे
हमारी ज़िन्दगी से 
उस बेचारे को क्या पता
ग़लत और सही का 
वो हमारी तरह ज़िंदा नहीं
वो हमारी तरह सोचता नहीं 

फिर भी ये अच्छा तरीक़ा होगा
ग़लतियाँ सुधारने का 
हर ग़लत को आग से राख बनाने का
हां, सही को भी साथ जल जाने का
शायद सूरज को इतना तो पता है 
कि सब कुछ ख़त्म करके ही
ग़लत भी ख़त्म हो पायेगा 
एक नई दुनिया तभी जन्मेगी  
जब पुरानी मरेगी 
मुझे मंज़ूर है वो आख़िरी आग 
धू धू करती
आग की वो लपटें
मुझे ढूँढतीं
मुझसे लिपटतीं
मेरा सहारा लेतीं
ग़लत के साथ सही को भी भस्म करतीं


कौन किसका सहारा बनेगा
कौन किसकी ज़िन्दगी बदलेगा 
ये तो वक़्त आने पर 
वक़्त ही बताएगा

 



मंगलवार, 2 मई 2017

कहीं ये वो तो नहीं

इतना अँधेरा !
क्यों हैं इतना अँधेरा ?
और कोई दिखाई क्यूँ नहीं देता 
क्या इस दुनिया में सिर्फ मैं ही बचा हूँ 
और बाकी दुनिया? वो कहाँ है 
दुनिया वाले कहाँ हैं 
वो सब लोग... 
लाखों करोड़ों
क्या कोई बम फट गया 
या कोई भयानक आग लग गयी 
पर... इस अँधेरे में आग भी नज़र नहीं आ रही 
धुआं... वो भी नहीं 
ये... ये क्या जगह है 
कौन सा शहर है 
ये सड़क है या कोई वीराना 
किसी का कोई घर 
इंसान की कोई आवाज़
कोई हरकत किसी पेड़ की 
हवा का कोई झोंका 
उफ़... क्या मैं इस दुनिया में अकेला ही हूँ 

एका-एक घुप्प अँधेरे में 
अँधेरे का ही एक टुकड़ा हिला 
... ज़रा सा
और उस अंधेरे से निकल कर 
मेरी ही डगर की तरफ आने लगा 
...ओह तो मेरे जैसा एक और भी है 
मैंने सोचा चलो कोई तो मिला 
पर मन में डर भी था 
पता नहीं कौन...
दोस्त या कोई और 
पर अँधेरे के उस टुकड़े ने दुश्मन जैसी कोई हरकत नहीं की 
वो बेहद आहिस्ता से कुछ नज़दीक आया 
फिर रुक गया 
फिर चला फिर रुक गया 
फिर चला...
इस रुकने चलने में हमारी दूरी काफी कम हो गयी 
मुझे लगा ये दोस्त हो या ना हो 
दुश्मन तो बिल्कुल नहीं है 
धीरे धीरे वो साया मेरे बिल्कुल पीछे आ गया 
मैं ज़रा डरा, हिचकिचाया
तो वो भी वहीं रुक ही गया 

फिर... कुछ बेहद अविस्वशनीय हो गया 
मेरे कंधे पर एक हाथ आया 
मैं सन्न रह गया 
पीछे मुड़ न सका 
दो तरह के डर मन में लबालब भरे हुए थे 
दोनों ही हालातों में दिल को संभालना असम्भव होगा
... ये कोई अनजाना दुश्मन न हो  
या वो दोस्त सारी उम्र जिसका इंतज़ार किया



सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

... छोडो जाने दो


हम पहुँच न पाये वक़्त पर
अफ़सोस है तुम्हें इंतज़ार करना पड़ा
और नाराज़गी का कहर हमें झेलना पड़ा
वो तमतमाया चेहरा
वो मोती पसीने के
माथे पे होठों पे
वो झुंझलाहट की भाषा
पूरे बदन पे
तुम्हें याद हो तो
हमारी अटपटी रूकती अटकती
चाल भी कुछ कह थी
... छोडो जाने दो

पर हमें ये ग़िला रहेगा
तुम उस इंतज़ार का लुत्फ़ उठा सके
हम तो तुम्हारे इंतज़ार में
जाने क्या क्या कर गए
कितने किस्से गढ़ लिए
कितनी ग़ज़लें लिख गए
हर ख्याल के बाद

सामने
आता तुम्हारा चेहरा
और हमारे होठों पर एक मुस्कान
... ख़ैर जाने दो

मैंने तुम्हारा इंतज़ार ज़रूर किया
लम्बे इंतज़ार पे ग़ुरूर भी किया
पर तुम हमेशा मेरे साथ रही
आस पास रही
जब जब तुम नहीं आई
और मैं मुँह लटकाये वापिस गया
मैं तुम्हे भी अपने साथ ले गया
तुमने सुना ही होगा
वो मशहूर ख्याल
"तुम मेरे पास होती हो,
जब कोई दूसरा नहीं होता"
... छोड़ो ये भी जाने दो


शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

मेरा वक़्त और मैं

कभी ऐसा सोचा
जिनको मिलना था 
वो बिना मिले ही चले गये 
और ख़त लिखा
कि तुमसे मिल कर बड़ा मज़ा आया
उस दिन मौसम कितना ख़ुशगवार था
चौदहवीं के चाँद पे निखार था
तारे भी बिखरे हुए थे
खुशबु के समंदर
हवा पे तैर रहे थे
कैसी अजीब बात है
इतनी सारी बातें लिख डालीं
जो हुई ही नहीं
कोई ऐसा कैसे लिख सकता है 
मैं तो वहां पहुंचा ही नहीं 
और वो कहता है
हम मिल भी लिए 
पर ज़िक्र चाँद तारों का
खुशबू और हवाओं का
अब 
ख़याल आया ...
शायद मेरा वक़्त और मैं
एक दुसरे से बिछड़ गए हैं
वो धागे टूट गए हैं
जो मुझे मेरे समय से जोड़े रखते हैं 
मुझे जो कुछ कल औरपरसों
करना है / था 
वो सब हो चुका है 
मेरा आने वाला कल बीत चुका है





डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...