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बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

कुछ नहीं, पर अँधेरा तो है

इतना अँधेरा !

कहाँ से आया इतना सारा अँधेरा

ये अँधेरा इतना घना क्यूँ है

सारी सड़कें गलियां बगीचे बाज़ार

पता नहीं मैं कहाँ हूँ

कोई आवाज़ भी नहीं है

अँधेरे में कोई आवाज़ क्यों नहीं सुनाई दे रही 

पता नहीं ये सब्ज़ी का बाजार है या मछली का

दूध का या मिठाइयों का या सोने चांदी का

ये अँधेरा सिर्फ बाहर की दुनिया में ही नहीं है

ये मेरे घर के आँगन में, सीढ़ियों पर, रसोई में

और शायद मेरे दिल में

मेरे रोम रोम में घर कर चुका है

शायद मेरा चेहरा भी काला हो गया होगा

मेरे हाथ, पैर, पेट, पीठ

सब कुछ अँधेरे रंग में रंग गए होंगे

शीशा भी कैसे देखूं

शीशा पता ही नहीं कहाँ है

कुछ भी नज़र नहीं आ रहा

अपनी हथेली तक नहीं 

क्या ये रात है?

पर कहाँ गया वो चाँद ?

वो चाँद, वो टिमटिमाते सितारे

मेरी रोशनी के सहारे

आज ठंड भी बहुत है

काश ऊपर कुछ गरम होता

कोई ऊनी कोट या कम्बल

या - सिर्फ तुम्हारे होने का एहसास

तुम्हारी नज़दीकी की गरमाहट

नरम हाथों की पकड़

उन खूबसूरत आँखों की रोशनी

आलिंगन की गरमी

ज़िन्दगी कितनी खाली सी हो चुकी है

कितनी नीरस, ठंडी

अब इस घने अँधेरे में मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ

और कैसे ढूँढूँ

किस तरफ जाऊं

इस दुनिया में कोई भी ना दिखाई दे

कोई बात नहीं

पर तुम न दिखोगी

तो ये ऑंखें किस काम की 

मुझे इनकी ज़रुरत ना होगी

तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में न हो

तो मेरी नब्ज़ किस काम की

तुम्हारा सर मेरे सीने पर न हो

तो ये धड़कन किस काम की



मेहमान दर्द

एक दिन एहसास हुआ मुझे
जैसे किसीने पुकारा हो मुझे 
देखा इधर उधर 
पर न आया कोई नज़र 
फिर किसीने हल्के से छू दिया मुझे 
बेहद घबरा के मैंने पूछा,

"कौन हो भाई दिखाई क्यों नहीं देते"

एक सकपकाई सी आवाज़ ने कहा,
"जी, मैं यहीं हूँ, आपके बिल्कुल नज़दीक"

बग़ैर देखे ही मैंने तीर चला दिया,
"ओह जनाब मैंने पहचाना नहीं 
हम पहले मिले हैं क्या?"

"जी अभी तक तो नहीं"

"नहीं? तो, फरमाएं, कौन हैं आप"

"जी मैं... मैं एक दर्द हूँ"

"दर्द ! आपको मुझसे क्या सरोकार है"

"जी... रहने को जगह मिलेगी कुछ दिनों के लिए"

"क्या? रहने को जगह?
नहीं भाई मुश्किल है मेरे लिए आपको जगह देना 
देखो न मेरे सारे खाने आराम से भरे हैं 
अब आराम से आराम करते हुए आराम को निकाल कर
दर्द को जगह देना बेवक़ूफ़ी होगी ना   
मेरी कितनी बदनामी होगी कुछ ख़बर है आपको"

"अरे जनाब इतने बड़े जिस्म में कोई तो ऐसा खाना होगा 
जहाँ आराम इतना ज़्यादा हो कि मेरा पता ही न चले"
"हैं ! क्या ऐसी भी कोई जगह हो सकती है? पर... आप कौन से दर्द हैं 
मसलन, सर के पेट के या..."
"नहीं नहीं ऐसा नहीं है हम तो जहाँ चले जाएँ वहीं का नाम ले लेते हैं 
जैसे सर दर्द, पीठ दर्द, पेट दर्द वगैरह"
"हम्म..."
"जी ज़रूरत पड़े तो हम हाथ की किसी उंगली में भी रह लेंगे 
पर अगर दो में से एक घुटना मिल जाता तो  क्या बात थी

"ये तो आप ज़्यादती कर रहे हैं 
आराम की भी अपनी ज़िन्दगी है"

"अरे बहुत कर लिया आराम 
अब हमारे जैसे बेसहारों को भी जगह मिलनी चाहिए 
और कितनी रंग बिरंगी विटामिन की गोलियां निगलेंगे
अपने अंदर का माहौल तो एक दिन बर्बाद होना ही है  
फिर उस बर्बादी के पैसे भी देने होंगे
मियां अब वक़्त जाता रहा आराम का
अब ज़माना है परेशानी का
नई नई तरह तरह की अजीबो ग़रीब परेशानियों का
इनसे आदमी का दिमाग़ ज़्यादा चलने लगता है 
अरे जब किसी मुसीबत को टालना हो तो नए तरीक़े ईज़ाद करने पड़ते हैं 
है कि नहीं?
तो जनाब अगर आप हमें रहने की जगह दे दें
तो आप अब से कहीं ज़्यादा अक़्लमंद हो जायेंगे 
ये वादा है"

"आपकी ज़िरह का भी जवाब नहीं 
ठीक है, तो आइये
जहाँ जगह मिले रह जाइये  
और हाँ, आराम से ज़रा तमीज़ से बात कीजियेगा" 

इसके बाद तो जनाब कलाई से लेकर सर तक 
कंधे से एड़ी तक 
पेट, पीठ, कमर हर जगह भर गयी दर्द से 
हकीम के माथे की शिकन बढ़ गयी
दवाओं का असर कम होने लगा 
धीरे धीरे दवाएं भी कम होने लगीं
फिर बंद हो गयीं
हकीम के हाथ दुआ पर आकर ठहर गए 
कहा; अब कोई इलाज नहीं 
लुत्फ़ लीजिये इनका 
दर्द ही तो है कोई मौत तो नहीं है 

बात मुझे सही लगी 
उसके पीछे का जज़्बा भी सही लगा
भई अब दर्द बिचारे कहाँ जाते?
ये सोच के मैंने इन्हें अपना लिया 
अब ये सारे दर्द मेरे हैं 
मेरे अपने हैं 
ये मुझे ज़्यादा तकलीफ भी नहीं देते 
हो सकता है मुझे इनकी आदत पड़ गयी हो  
अब ये सब मेरे साथ ही रहेंगे 
मैं इनका साथ आखिऱ तक न छोड़ूंगा
अब हम बिछड़ेंगे तो शायद
उस बेहद गर्म माहौल में
जब मुझे ख़ुद से, इनसे और इन्हें मुझसे 
निजात मिल जाएगी

आखिऱ हम इस नतीजे पर पहुंचे 'दोस्त'
कि दर्द और परेशानियां तो हमेशा ही रहेंगी
पर आप उनके साथ दोस्त बन के रहेंगे
या उनकी दुश्मनी मोल लेंगे?


चंद्रशेखर आज़ाद कुटी, झाँसी; वो यहाँ १९२४ में अज्ञातवास में रहे। 

शुक्रवार, 20 जून 2025

मिज़ाज गर्म है

गए ज़माने शांति के
ठंडक के 
ठंडे दिमाग़ के 
सलीक़े के, तरीक़े के 
बात चीत के 
समझने समझाने के 
सुलझाने के 
उसकी उसे लौटाने के 
अपना आधा भी,
उसे दे आने के 

क्यों लगते हैं सब इतने नाराज़ ?
कोई भी खुश नहीं 
जैसे कभी ख़ुशी देखी ही नहीं 
मानो दुश्मनी कर ली हो हंसी से 
मुस्कान से मुंह फेर लिया हो 
कितनी ज़मीनों का ख़ून 
सूख नहीं पाया
सूख ही नहीं पाता 
बहाने जो हैं उनके पास
ताज़ा ख़ून बहाने के 

अब तो प्यार जैसी चीज़ भी 
जान लेकर हासिल की जाती है 
चाकू के दिखा कर  
चोट पंहुचा कर 
कपड़े फाड़ कर 
किसी को किसी का ख़ौफ़ नहीं 
मरने का, मारने का
ज़िन्दगी तबाह हो जाने का
राम जाने क्या वजह हैं उनकी 
क्या बहाने हैं उनके 

सुना है लाखों बरस बाद 
ये सूरज आज से कहीं ज़्यादा गरम होगा 
हमारे दिमाग़ की तरह
गरम होता ही जायेगा 
हमारे और नज़दीक आयेगा 
आता ही जायेगा
हमें डरायेगा तड़पायेगा 
झुलसायेगा 
और फिर शायद … 
हमें निगल जायेगा 

सूरज भी देख रहा है हमको 
सीख रहा है चुपचाप हमसे
हमारी ज़िन्दगी से 
उस बेचारे को क्या पता
ग़लत और सही का 
वो हमारी तरह ज़िंदा नहीं
वो हमारी तरह सोचता नहीं 

फिर भी ये अच्छा तरीक़ा होगा
ग़लतियाँ सुधारने का 
हर ग़लत को आग से राख बनाने का
हां, सही को भी साथ जल जाने का
शायद सूरज को इतना तो पता है 
कि सब कुछ ख़त्म करके ही
ग़लत भी ख़त्म हो पायेगा 
एक नई दुनिया तभी जन्मेगी  
जब पुरानी मरेगी 
मुझे मंज़ूर है वो आख़िरी आग 
धू धू करती
आग की वो लपटें
मुझे ढूँढतीं
मुझसे लिपटतीं
मेरा सहारा लेतीं
ग़लत के साथ सही को भी भस्म करतीं


कौन किसका सहारा बनेगा
कौन किसकी ज़िन्दगी बदलेगा 
ये तो वक़्त आने पर 
वक़्त ही बताएगा

 



बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

एक अनजानी वजह

कुछ दिन पहले कुछ बदल गया

आहिस्ता से ...

बेहद आहिस्ता से

कई दिनों तक इसकी ख़बर भी नहीं हुई

लगा ही नहीं कि कुछ बदला है

सब ठीक ही लगता रहा


आख़िरकार जब जो जैसा रहता था

वैसा नहीं रहा

कुछ, जो रोज़ ही होता रहता था

अब नहीं हो रहा

एक अर्से से


मुझे पता है कि अगर कोई चीज़

बहुत धीरे-धीरे बदले तो समझ नहीं आती

पता ही नहीं चलता

लगता रहता है होगा कुछ,

ठीक हो जायेगा


ज़िन्दगी में सब इतने मसरूफ़ हैं

अपनी अपनी उलझनों के साथ

क्या पता किसकी उलझन कितनी मुश्किल है


बातें दो तरह से असर करती हैं

एक; एकाएक कोई बहुत बड़ी बात

या कोई ज़रा सी बात जो धीरे धीरे बहुत दिनों में बदले

ख़ैर, अगर कुछ इतने दिन चला है

तो इसकी जायज़ वजह तो होगी ही

और किसी की वजह पर शक नहीं  किया जाता

किसी की वजह पर शक करने का हक़ किसी को नहीं है

पर सभी अपने तूफानों में उलझे हैं

किसी को नहीं पता कि

कौन कैसे तूफानों से गुज़र रहा है 


... अपने तूफानों को मैं ख़ुद समझ लूँगा



रविवार, 8 अगस्त 2021

अरज है इतनी

अरज है इतनी
दरस दिखाओ
... यहाँ आओ या वहां आओ 
घर पे या बाहर ही आओ 
बताओ कब आओगे 
और फिर वादा निभाओ 
कितने दिन हो गए 
हाँ हाँ करते
यहाँ वहां करते 
आज नहीं कल करते 
अभी नहीं फिर कभी कहते 

ज़माने की फिकर है तुमको
तुमसे बहुत काम होगा सबको 
कभी मेरा भी कोई काम कर जाओ 
अब दोस्ती एक तरफ़ा तो नहीं हो सकती 
तुम्हारा नाम अच्छे लोगों में शामिल है 
क्योंकि तुम सबकी मदद करते हो 
पर क्योंकि उन सब में मैं शामिल नहीं हूँ 
इसलिए उन सबको 'सब' नहीं कहा जा सकता 
कभी सोचा है इसके बारे में 
शायद तुम बड़ा सोचते हो 
जहाँ सब शामिल हों वो बड़ा हो गया 
पर मुझे भी शामिल करने से 
वो कुछ ज़्यादा बड़ा हो जायेगा 
और तुम उसे संभाल नहीं पाओगे 
या मेरी वजह से उसकी कीमत कम हो जाएगी 

शायद मैं कुछ ज़यादा ही अक्ल लगा बैठा 
खैर फिर भी 
हो सके तो आओ
दरस दिखाओ 
अरज तो इतनी ही थी

शनिवार, 16 मार्च 2019

पता नहीं क्यों

दूर वो जो पर्दा दिखाई देता है
उस के पीछे कोई बैठा लगता है
कभी कभी वो परदे पर एक अक्स छोड़ देता है
पर कभी दिखाई नहीं देता
मैंने तो उसे कभी देखा नहीं
नहीं, असल में किसी ने भी नहीं
कौन होगा वो
और वो वहां क्यों छुपा बैठा है
क्या उसे दुनिया की ज़रुरत नहीं है
या शायद वो दुनिया से छुप रहा है

आज मैंने दूर से देखा
कुछ दूरी पर लोगों का एक झुण्ड था
वो सब उस परदे की ओर देख रहे थे
ज़ोर ज़ोर से बातें कर रहे थे
हाथ हिला-हिला कर इशारे कर रहे थे
ऐसा लगा कि वो आज तो इस पर्दे का
पर्दा फाश करके ही रहेंगे
मैं उनके नज़दीक गया
उन सबकी मिली-जुली आवाज़ों से कुछ समझ न आया
फिर मैंने एक के कंधे पर हाथ रखा
कोई फायदा नहीं हुआ
दूसरे का हाथ पकड़ के उसे टोका
तो वो दूसरा हाथ हिलाने लगा
फिर मैंने उसे अपनी ओर खींचा
उसने बेहद अजीब नज़रों से मुझे देखा
"क्या चाहिए", वो बोला
मैंने कहा, "ऐसा भी क्या हो गया
इस परदे का किस्सा तो पुराना है"
"अजी जनाब आपको पता नहीं,
उस परदे के पीछे एक नहीं दो लोग हैं"
ज़हन में एक बिजली सी चमकी
दो लोग!
कैसे? किसने देखा ?
सबने देखा
पहले एक का सर ऊपर आया
फिर छुप गया
फिर दूसरे का
और वो भी नीचे बैठ गया
दो लोग!
कोई बोला "मुझे पता है दूसरा सर किसी औरत का है,
दोनों एक साथ ऊपर नहीं आते"
जैसे वो साथ दिखाई नहीं देना चाहते
किसी को नहीं, कभी नहीं



गुरुवार, 22 नवंबर 2018

अनंत निरंतर गीत

गाता हूँ एक गीत पुराना
बेहद पुराना
पुराणों से भी पुराना
ऋग वेद के सूक्तों से अनजाना
आओ सुनो ये गीत पुराना

शायद मैं कोई ग़लती कर जाऊं
एक वाक्य या शब्द भूल जाऊं
पर गीत के भाव नहीं बदलेंगे
भाव जो ऋषियों ने इसमें भरे हैं
वो भावनाएं नहीं बदलेंगी
जैसे जन्म का आनंद
देहांत का दुःख
नहीं बदलते
वैसे ही इस गीत के भाव अमिट हैं
हो सकता है बहुत दूर कहीं
कोई इन शब्दों को न समझे
पर ऐसा कोई न होगा
जो इन भावनाओं को न जानेगा

जन्म का आनंद
देहांत का दुःख
साधुओं का वो ही गीत मैं दोहराऊंगा
जाने वाले के लिए गाऊंगा

आपको भी सुनाऊँगा
इस गीत की गाथा है बहुत लम्बी
हमारे आपके जीवन से लम्बी
जीवन से भी लम्बी
हर जीवन का गीत अलग है
शब्द, सुर और धुन अलग है
इसीलिए गीत बेहद लम्बा है
पर ये आज का गीत है
हमारे इस दोस्त के लिए
इसके खूबसूरत जीवन के लिए
और जीवन के... अंत के लिए
इसके इस सुंदर जीवन के मैं आज
कुछ ही पन्ने ही गा पाऊंगा
पलटूँगा पन्ने धीरे धीरे
गाऊंगा गीत धीरे धीरे
आत्मा विदा लेगी धीरे धीरे
वो हम सबको ध्यान से देख ले
हम सबकी आँखों के आंसू सोख ले
बच्चों का रोना सुन ले
माँ बाप की सिसकियों को समझ ले
उसकी आत्मा सबके पास जाएगी
हर मित्र का चेहरा देखेगी
दूर दूर के लोगों को धन्यवाद् देगी

आत्मा को पता है कि ये गीत है कितना पुराना
जब ये गाँव नहीं था
घर नहीं थे
शायद ये सब जंगल था
रास्ता नहीं था
कोई आता-जाता नहीं था
किसी साधु ने इसे गाया होगा
जब उसका कोई अपना स्वर्ग सिधारा होगा
उसके लिए गाया होगा ये गाना
पर सच पूछो ये गीत है उससे भी पुराना
जब वो साधु संत भी नहीं थे
चारों ओर था बेहद तेज़ प्रकाश
हवा में तैर रहे थे पहाड़
चमकते सितारे और घूमते गृह
मानो हवा में आग के गोले थे
वो गोले कभी लाल थे कभी नीले थे
हरे कभी बैंगनी थे
पर उस दृश्य को देखने वाला कोई न था
उस गरम गोले पर रहने वाला कोई न था

फिर आयी एक छाया
एक बहुत बड़ी छाया
दूर दूर तक तक फैलती
आसानी से आसमान में तैरती
वो फैल गयी पूरी धरती पर
फिर धीरे धीरे
धरती की आग हुई ठंडी
धीरे धीरे
फिर उस छाया से पानी निकला
पानी से धरती का रंग निखरा
घास उगी तालाब बने
फूल खिले उनके बीज बने

तालाब में आई मछली
पहाड़ से नदी उतरी ...

तुम ये सब छोड़ के चले गए 'दोस्त'
अब जाओ सितारों और ग्रहों में घूमो
उन संतों से मिलो जिन्होंने ये गीत लिखा
जनम और मरण का संगीत लिखा







रविवार, 2 जुलाई 2017

क्या करें क्या ना करें

अब वक़्त आ पहुंचा है वहां, जहाँ
इसे बहुत वक़्त पहले पहुँच जाना चाहिए था 
वक़्त की मीठी बातों में उलझे रहे हम 
हमें इसका इंतज़ार नहीं करना चाहिए था
अगर कुछ करना था तो उठते
और उठ कर, कर देते 
किसीकी हामी या आँख के इशारे को नहीं देखना चाहिए था 
चलो अब तो जो हुआ सो हुआ,
कर चुके जो भी करना,
या ना करना चाहिए था 
बड़े खुश थे हम हज़ारों दिन जेब में लिए 
जोश में खर्च कर दिए आधे,
जो क़तई नहीं करना चाहिए था 
कोई तो बताये कि हमने क्या सही, क्या ग़लत किया 
क्या हम वो सब ही करते रहे जो हमें ना करना चाहिए था?
किस तरफ चलते
किस बात की कोशिश करते 'दोस्त' 
मंज़िल ख़ुद वहां डेरा डाले बैठी थी
जहाँ पहले हमें होना चाहिए था



बुधवार, 10 मई 2017

क़ीमत

क़ीमत 
हर इंसान लगाता है क़ीमत 
हर एक चीज़ की
हर इंसान की 
इसकी, उसकी, घर की, गाड़ी की 
ज़मीन जायदाद की 
यहाँ तक दोस्तों की, मां बाप की
भाई बहनों की 
घर बार की, देश दुनिया की 
दूसरों के विचारों की 
उनकी समझ की, समझदारी की 

... अपनी भी
माफ़ करें 
शायद यहाँ कुछ अटपटा हो गया
उल्टा पल्टा हो गया 
जो पहले आना था वो बाद में आया
क़ीमत खुद की 
यानि एक ऐसी बेशक़ीमती चीज़ की
जिसका ख़ुद की नज़र में 
कोई मोल नहीं हो सकता
ख़ुद पर कोई दाम नहीं लिखा जा सकता 
कोई लिखता भी नहीं 
अगर किसीने लिखा भी, 
तो वो ग़लत होगा  
अपनी नज़र में ज़्यादातर लोग 
कुछ ज़्यादा ही क़ीमती होते हैं 
या यूँ कहिये बेशक़ीमती होते हैं
हालांकि उनके बारे में दूसरों का ख़याल 
कुछ दूसरा ही होता है
ठीक वैसे ही जैसे इनका औरों के बारे में... 
चलिए ये सब अंदर की बात है 
उसके हर किसीके के मन की बात है 
घर घर की बात है 
फिर भी इस दुनिया में 
ज़्यादातर लोग अपनी क़ीमत को 
अपने दिल ही में छुपाये 
अपने साथ लेकर चले जाते हैं 
दुनिया को पता ही नहीं चल पाता 
कि खुद की नज़र में वो 
कितने मंहगे या सस्ते थे

शनिवार, 6 मई 2017

ये दिल ये पागल दिल मेरा

ये दिल मेरा 
सीने में मेरे 
ज़रा इस तरफ 
हाँ यहीं बीच में 
थोड़ा सा इधर 
हाँ बांयें, थोड़ा और 
बस यहीं 
ये दिल मेरा
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया 
टूट फूट गया
पहले तो ये ला दो 
वो दिला दो 
ये वाला नहीं वो वाला चाहिए 
लाल नहीं पीला 
हरा नहीं नीला 
न ही कभी चैन से बैठा 
न मुझे ही आराम करने दिया  
पर अब 
अब कुछ कहता ही नहीं 
कहीं रूठ तो नहीं गया
हे भगवान  
टूटा फूटा और अब रूठा
ये दिल है या किसीकी दिलरुबा 
जब देखो नखरे 
अरे दिल मेरा है 
और मुझी से नाराज़ रहता है 
सीने में जगह हथिया ली है
और सारा कारोबार समेट लिया 
अब मैं अपने दिमाग़ को लेकर कहाँ जाऊं 
इसकी तो कोई क़द्र ही नहीं करता 
कोई नहीं पूछता 
सब कहते हैं दिल का अच्छा है
वरना बेवकूफ है
हद्द हो गयी जनाब
न सोचा न समझा
और सर पे बेवकूफ का ताज रख दिया 
आपकी इसी बात ने तो दिल तोड़ दिया 
जी यही ... 
दोस्त, ये दिल मेरा 
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया है 
टूट फूट गया है ...  





मंगलवार, 2 मई 2017

कहीं ये वो तो नहीं

इतना अँधेरा !
क्यों हैं इतना अँधेरा ?
और कोई दिखाई क्यूँ नहीं देता 
क्या इस दुनिया में सिर्फ मैं ही बचा हूँ 
और बाकी दुनिया? वो कहाँ है 
दुनिया वाले कहाँ हैं 
वो सब लोग... 
लाखों करोड़ों
क्या कोई बम फट गया 
या कोई भयानक आग लग गयी 
पर... इस अँधेरे में आग भी नज़र नहीं आ रही 
धुआं... वो भी नहीं 
ये... ये क्या जगह है 
कौन सा शहर है 
ये सड़क है या कोई वीराना 
किसी का कोई घर 
इंसान की कोई आवाज़
कोई हरकत किसी पेड़ की 
हवा का कोई झोंका 
उफ़... क्या मैं इस दुनिया में अकेला ही हूँ 

एका-एक घुप्प अँधेरे में 
अँधेरे का ही एक टुकड़ा हिला 
... ज़रा सा
और उस अंधेरे से निकल कर 
मेरी ही डगर की तरफ आने लगा 
...ओह तो मेरे जैसा एक और भी है 
मैंने सोचा चलो कोई तो मिला 
पर मन में डर भी था 
पता नहीं कौन...
दोस्त या कोई और 
पर अँधेरे के उस टुकड़े ने दुश्मन जैसी कोई हरकत नहीं की 
वो बेहद आहिस्ता से कुछ नज़दीक आया 
फिर रुक गया 
फिर चला फिर रुक गया 
फिर चला...
इस रुकने चलने में हमारी दूरी काफी कम हो गयी 
मुझे लगा ये दोस्त हो या ना हो 
दुश्मन तो बिल्कुल नहीं है 
धीरे धीरे वो साया मेरे बिल्कुल पीछे आ गया 
मैं ज़रा डरा, हिचकिचाया
तो वो भी वहीं रुक ही गया 

फिर... कुछ बेहद अविस्वशनीय हो गया 
मेरे कंधे पर एक हाथ आया 
मैं सन्न रह गया 
पीछे मुड़ न सका 
दो तरह के डर मन में लबालब भरे हुए थे 
दोनों ही हालातों में दिल को संभालना असम्भव होगा
... ये कोई अनजाना दुश्मन न हो  
या वो दोस्त सारी उम्र जिसका इंतज़ार किया



बुधवार, 19 अप्रैल 2017

आसान मुश्किलें

मुश्किलेँ ?
मुश्किलें हैं तो क्या हुआ
नामुमकिन तो नहीं हैं
जब से मैंने इनको तव्वजोह देना बंद कर दिया
ये मेरे आगे पीछे घूमने लगीं
मैंने फिर भी हवा न दी
अरे भाई जब इंसान का काम आसानी से चल जाता है
तो मुश्किलों की क्या ज़रुरत है
तो जनाब मेरे इन नए तेवरों से
मुश्किलों की शक्ल उड़ी उड़ी लगने लगी है
घबरा सी गयी लगती हैं
ख़ैर बहुत परेशान कर लिया इन्होनें मुझे
इन्हें अपने पर कुछ ज़्यादा ही घमंड हो गया था
और घमंड तो एक दिन टूटना ही था
ये हमेशा ही टूटता है
सही वक़्त आ जाये तो किसी भी मुश्किल का घमंड
आसानी से टूट जाता है


शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

शोर और शांति

कितना शोर है चारों तरफ़ 
कितनी हलचल 
सड़क दिखती है मेरी खिड़की से 
कारें टेम्पो ऑटो स्कूटरों की आवाज़ें 
और उनके हॉर्न 
बीच में सड़क पार करने की कोशिश में 
बच्चों के हाथ पकड़े औरतें, कुछ बूढ़े
दुम दबाये बिदकते कुत्ते 
कितनी परेशानियों में है हर कोई 
कोई यहाँ से वहां जाना चाहता है 
तो किसीको उस तरफ से, इधर आना है 
कई इस शोर में फोन को कान पर दबाये हैं 
भागे जा रहे हैं 
कुछ कहने की कोशिश में 
या कुछ सुनने की ख्वाहिश में

कुछ देर में मन भारी हो गया 
खिड़की के बाहर अगर इतनी ऊर्जा है 
तो पूरे शहर में क्या होगा 
और दुनिया में... ?
मैं अंदर गया 
खिड़की भी बंद कर दी 
आवाज़ें ज़रूर काम हो गयीं 
पर मन पर जम चुका था 
उस छोटी सी सड़क के 
परशानियों का बोझ

मुझे समुद्र की याद गयी 
समुद्र मुझे बेहद पसंद है 
उसकी लहरों में कितनी ताक़त होती है 
कितनी दृढ़ता 
वो कभी रुकती नहीं 
एक लहर शोर मचाती किनारे से टकराती है 
तो उसके पीछे दूसरी 
फिर एक और, फिर और एक
एक एक कर के  
अनगिनत लहरें एक सा शोर मचातीं
अपने-अपने किनारे पा जाती हैं
पता नहीं कितनी लहरें हैं समुद्र में 
और कहाँ छुपी बैठी हैं 
पर आपको अंदर की बात बताऊँ  
लहरों को देखने से मेरा मन शांत हो जाता है 
क्योंकि इनका शोर और इनकी उर्जा अलग है 
मेरी आँखें बंद होने लगीं थीं
पलकें भारी होने लगीं 
धीरे धीरे मन लहरों के नीचे चला गया 
नीचे झाँका तो अथाह गहराई नज़र आयी 
अब लहरें ऊपर से जा रही थीं 
उनका शोर काम हो गया था 
लगा जैसे यहाँ भी खिड़की बंद हो गयी हो 
नीचे की दुनिया अलग थी 
बिलकुल अलग 
मैं और नीचे गया 
थोड़ा और नीचे 
और भी थोड़ा 
लगने लगा जैसे स्वर्ग गया हो 
वहाँ सब कुछ बिलकुल धीमे चल रहा था 
एक नन्हा सा शंख रेंग रहा था 
पता नहीं उसे कहीं जाना भी था या नहीं 
कुछ छोटी बड़ी मछलियां बिना ध्येय के रेंग रही थीं 
इधर उधर 
जैसे शाम को टहलने निकली हों 
किसीको कोई जल्दी नहीं 
किसीसे मिलना नहीं 
कहीं जाना नहीं
कुछ पूछना नहीं 
कुछ कहना नहीं 
कोई समस्या नहीं 
ऊपर की दुनिया में क्या हो रहा है 
वहां कितना शोर है 
कितनी परेशानियां हैं 
किसी को कुछ पता नहीं


डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...