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रविवार, 2 जुलाई 2017

क्या करें क्या ना करें

अब वक़्त आ पहुंचा है वहां, जहाँ
इसे बहुत वक़्त पहले पहुँच जाना चाहिए था 
वक़्त की मीठी बातों में उलझे रहे हम 
हमें इसका इंतज़ार नहीं करना चाहिए था
अगर कुछ करना था तो उठते
और उठ कर, कर देते 
किसीकी हामी या आँख के इशारे को नहीं देखना चाहिए था 
चलो अब तो जो हुआ सो हुआ,
कर चुके जो भी करना,
या ना करना चाहिए था 
बड़े खुश थे हम हज़ारों दिन जेब में लिए 
जोश में खर्च कर दिए आधे,
जो क़तई नहीं करना चाहिए था 
कोई तो बताये कि हमने क्या सही, क्या ग़लत किया 
क्या हम वो सब ही करते रहे जो हमें ना करना चाहिए था?
किस तरफ चलते
किस बात की कोशिश करते 'दोस्त' 
मंज़िल ख़ुद वहां डेरा डाले बैठी थी
जहाँ पहले हमें होना चाहिए था



शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मैं और मेरा अँधेरा

क्या दर्द एक अँधेरा है
या अँधेरा एक दर्द है
या शायद ये दर्द का अँधेरा है
पर ये कालिख पुते दिन रात
सवेरा नहीं होने देते
ज़िन्दगी में मेरी

ये कहाँ के बादल हैं 
जिन्होंने ढक दिया
तुम्हारा चाँद सा चेहरा 
वो सूरज सी मुस्कान 

अब तो तुम हो
और  तुम्हारा नाम
बचा है तो सिर्फ तुम्हारा ग़म
गुज़र जाएगी बाक़ी भी
इसी ग़म के सहारे 'दोस्त'

पर उफ़ ये अधेरा...

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...