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सोमवार, 2 मार्च 2026

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना 

क्या माना ?

यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था 

तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं?

क्या कहा टटपुँजिया? मेरे इस दोपहिया रथ के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया !

हे भगवान, अब इस साइकिल के लिए भी मुझे भाषा की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ेगा?

बिलकुल, ये मेरी साइकिल जो है 

पिछली बार तुम कब गिरे थे इससे 

गिरे? तौबा कीजिये। ये गिरने वाला वाहन नहीं है। 

ख़ैर जनाब शायद आप शायद ये भूल गये मैंने आपको कतई पुकारा नहीं था

हो सकता है;  मैं भी तो बाज़ार जा रहा था पर पता नहीं क्यों हैंडल ख़ुदबख़ुद इस रास्ते की तरफ मुड़ गया। आप इस मनचले हैंडल को जानती नहीं ?

वल्लाह ये आप ही की साइकिल है या किसी दिल फ़ेंक देव आनंद की?

क्यों नहीं, हो भी सकती है। हम्म, वैसे ... पहली बार तुम्हारी बात में कुछ दम नज़र आ रहा है। अच्छा एक बात कहूं ?

ठीक है जल्दी बोलो मुझे बहुत काम है 

अ... आज तुम बिलकुल नूतन जैसी दिख रही हो।

अरे! अब ये नूतन कौन है, ये कहाँ से आ गयी?

हैं ! नूतन? हाँ वाक़ेई तुम सही हो।  ये नाम कहाँ से टपक पड़ा?

वल्लाह जवाब, तुमने ही नाम लिया तुम्हें ही नूतन का पता नहीं ?

... ठीक है चलो कुछ दूर साथ चलते हैं 




शनिवार, 21 जनवरी 2017

वक़्त बराबरी का

शायद वक़्त आ गया है 
बग़ावत का 
उनसे बराबरी का 
बराबरी के जवाब का 
वैसे ही सख़्त जवाब का 
कभी कभी सोचता हूँ 
क्यों न मैं भी उन जैसा बन जाऊं
मानता हूँ मेरे लिए आसान नहीं होगा 
दूसरों जैसा बनना
उन जैसी गन्दी नाली में उतर कर 
उनसे लड़ना 
उनकी ज़बान में 
उनके पैतरों से 
उन्हें जवाब देना 
असल में मैं वैसा, उन जैसा नहीं हूँ 
पर क्या करूं कब तक जाने दूँ 
उनको सबको 
भर चुका है मेरा प्याला 
दुनिया की कड़वी बातों से 
ऊंचे सुर की आवाज़ों से ...  
अब बुरा न मानें
पर वक़्त निकल गया 
मुरव्वतों का 
मीठी ज़बान का 
कही अनकही करने का 
देखी अनदेखी करने का 
सुनी अनसुनी करने का 
अब तो जनाब यूँ है कि 
उधर से अगर एक ग़लत लफ्ज़ का इस्तेमाल हो गया 
या ऊंचा सुर पकड़ लिया
तो दोस्त समझदारी इसीमें होगी 
कि बराबरी के जवाब के लिए तैयार रहियेगा

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मैं और मेरा अँधेरा

क्या दर्द एक अँधेरा है
या अँधेरा एक दर्द है
या शायद ये दर्द का अँधेरा है
पर ये कालिख पुते दिन रात
सवेरा नहीं होने देते
ज़िन्दगी में मेरी

ये कहाँ के बादल हैं 
जिन्होंने ढक दिया
तुम्हारा चाँद सा चेहरा 
वो सूरज सी मुस्कान 

अब तो तुम हो
और  तुम्हारा नाम
बचा है तो सिर्फ तुम्हारा ग़म
गुज़र जाएगी बाक़ी भी
इसी ग़म के सहारे 'दोस्त'

पर उफ़ ये अधेरा...

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...