गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

शिकायत गज़ल की

क्या इस ग़ज़ल के लबों पर मुस्कान है ?

या वो परेशान है ?

अरे क्यों बिलावजह उठा दिया 

अभी तो मैं सोई थी 

ख़ूबसूरत सपनों में खोई थी 

आँखों में नींद की ख़ुमारी थी 

तैयार होने की बारी थी...  

जी आप से तो कोई  तक़ल्लुफ़ नहीं  

मैं जैसी भी हूँ सोई-जागी, ठीक है 

पर आप तो मुझे दूसरों के सामने पेश करेंगे 

आप मुझे दूसरों के लिए ही बनाते हैं ना 

यहाँ मुझे  दिक़्क़त है

आप तो ऐसे शायर हैं  

कि सर झुकाया, क़लम उठाई  

और बहने लगी ग़ज़ल क़ाग़ज़ पर 

अपनी मर्ज़ी से या ज़बरदस्ती से ... 

ग़र मुझे कुछ और वक़्त मिला होता

तो मैं ज़्यादा अक़लमंद लग सकती थी 

कुछ और ख़ूबसूरत लग सकती थी 

होठों पर लाली लगा सकती थी 

आंखों में काजल डाल सकती थी

गुलाबी और सुनहरे कपड़े वग़ैरह

आख़िर... लोग मेरी तारीफ़ करके 

आप ही की तारीफ़ करते हैं ना  

 



सोमवार, 11 अगस्त 2025

उम्मीद

उम्मीद वो कौन है

क्या है 

वो मेरे लिए क्या है 

वो जो भी है 

जहाँ भी है 

अब... ये सब पता नहीं 

वो ठीक है

बिल्कुल ठीक है या... 

ख़ैर 

दिल कहता है 

कि मेरे से बेहतर हो

शुक्रवार, 20 जून 2025

मिज़ाज गर्म है

गए ज़माने शांति के
ठंडक के 
ठंडे दिमाग़ के 
सलीक़े के, तरीक़े के 
बात चीत के 
समझने समझाने के 
सुलझाने के 
उसकी उसे लौटाने के 
अपना आधा भी,
उसे दे आने के 

क्यों लगते हैं सब इतने नाराज़ ?
कोई भी खुश नहीं 
जैसे कभी ख़ुशी देखी ही नहीं 
मानो दुश्मनी कर ली हो हंसी से 
मुस्कान से मुंह फेर लिया हो 
कितनी ज़मीनों का ख़ून 
सूख नहीं पाया
सूख ही नहीं पाता 
बहाने जो हैं उनके पास
ताज़ा ख़ून बहाने के 

अब तो प्यार जैसी चीज़ भी 
जान लेकर हासिल की जाती है 
चाकू के दिखा कर  
चोट पंहुचा कर 
कपड़े फाड़ कर 
किसी को किसी का ख़ौफ़ नहीं 
मरने का, मारने का
ज़िन्दगी तबाह हो जाने का
राम जाने क्या वजह हैं उनकी 
क्या बहाने हैं उनके 

सुना है लाखों बरस बाद 
ये सूरज आज से कहीं ज़्यादा गरम होगा 
हमारे दिमाग़ की तरह
गरम होता ही जायेगा 
हमारे और नज़दीक आयेगा 
आता ही जायेगा
हमें डरायेगा तड़पायेगा 
झुलसायेगा 
और फिर शायद … 
हमें निगल जायेगा 

सूरज भी देख रहा है हमको 
सीख रहा है चुपचाप हमसे
हमारी ज़िन्दगी से 
उस बेचारे को क्या पता
ग़लत और सही का 
वो हमारी तरह ज़िंदा नहीं
वो हमारी तरह सोचता नहीं 

फिर भी ये अच्छा तरीक़ा होगा
ग़लतियाँ सुधारने का 
हर ग़लत को आग से राख बनाने का
हां, सही को भी साथ जल जाने का
शायद सूरज को इतना तो पता है 
कि सब कुछ ख़त्म करके ही
ग़लत भी ख़त्म हो पायेगा 
एक नई दुनिया तभी जन्मेगी  
जब पुरानी मरेगी 
मुझे मंज़ूर है वो आख़िरी आग 
धू धू करती
आग की वो लपटें
मुझे ढूँढतीं
मुझसे लिपटतीं
मेरा सहारा लेतीं
ग़लत के साथ सही को भी भस्म करतीं


कौन किसका सहारा बनेगा
कौन किसकी ज़िन्दगी बदलेगा 
ये तो वक़्त आने पर 
वक़्त ही बताएगा

 



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...