गुरुवार, 26 जनवरी 2017

जुर्रत और ख़ता

धीर धीरे जुर्रतों को मेरी
मिल गया दर्जा एक ख़ता का
आहिस्ता आहिस्ता ही सही 
इस मक़ाम तक पहुँच ही गयी ज़िन्दगी
ग़नीमत है

तुम्हें याद तो होगा 
मैंने पहले ही कह दिया था 
मेरी पहली ज़ुर्रत पर ही टोक देना 
बात को वहीँ रोक देना 
तो शिकायत होगी

मैं समझ जाऊंगा
सुलझ जाऊँगा, बदल लूंगा रास्ता
तुम सही तरफ हो लेना
मैं बायें हाथ मुड़ जाऊंगा 

ख़ैर 'दोस्त' अब तो बीती बीत चुकी 
मेहरबानी उनके बर्दाश्त की
जो बर्दाश्त कीं जुर्रतें मेरी
फिर गले लगाया खता को भी
... अब और क्या इनायत होगी


शनिवार, 21 जनवरी 2017

वक़्त बराबरी का

शायद वक़्त आ गया है 
बग़ावत का 
उनसे बराबरी का 
बराबरी के जवाब का 
वैसे ही सख़्त जवाब का 
कभी कभी सोचता हूँ 
क्यों न मैं भी उन जैसा बन जाऊं
मानता हूँ मेरे लिए आसान नहीं होगा 
दूसरों जैसा बनना
उन जैसी गन्दी नाली में उतर कर 
उनसे लड़ना 
उनकी ज़बान में 
उनके पैतरों से 
उन्हें जवाब देना 
असल में मैं वैसा, उन जैसा नहीं हूँ 
पर क्या करूं कब तक जाने दूँ 
उनको सबको 
भर चुका है मेरा प्याला 
दुनिया की कड़वी बातों से 
ऊंचे सुर की आवाज़ों से ...  
अब बुरा न मानें
पर वक़्त निकल गया 
मुरव्वतों का 
मीठी ज़बान का 
कही अनकही करने का 
देखी अनदेखी करने का 
सुनी अनसुनी करने का 
अब तो जनाब यूँ है कि 
उधर से अगर एक ग़लत लफ्ज़ का इस्तेमाल हो गया 
या ऊंचा सुर पकड़ लिया
तो दोस्त समझदारी इसीमें होगी 
कि बराबरी के जवाब के लिए तैयार रहियेगा

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...