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शनिवार, 15 मई 2021

कुछ खास नहीं

अरे! क्या हाल है दोस्त ?

बस, कुछ खास नहीं

किधर चले?

कहीं नहीं, बस यूँ ही

और कोई नयी ताज़ी ?

नहीं नहीं, कुछ खास नहीं

अच्छा, ये हाथ पे  क्या हुआ

कुछ नहीं, ऐसे ही

ये तो जले का निशान लगता है

हाँ असल में वो ...

घर में पकोड़े तुम बना रहे थे?

नहीं नहीं, बस ऐसे ही

उफ़, तेल काफी गरम रहा होगा हाथ फूल गया है 

असल में... आग से जला है

आग! कैसी आग?

चिंगारी

चिंगारी? घर में? आग लग गयी थी क्या?

नहीं, असल में पिता जी के दाह संस्कार में एक...

क्या! तुम्हारे फादर गुज़र गए ?

हाँ... वो तीन दिन हुए

ओहो तो ये निशान चिता की आग से?

हाँ हाँ वहीं से, मुझे ही करना था सब कुछ

सॉरी यार... तो क्या बीमार थे ?

नहीं... सिर्फ बूढ़े थे, नब्बे साल के

अरे वाह तब तो पूरी ज़िन्दगी जी लिए ऐसा कह सकते हैं

हाँ, कह भी सकते हैं

बीमार रहे? आख़ीर में?

नहीं कुछ खास नहीं, सिर्फ एक महीना

वाह वाह, जीना हो तो ऐसा

हाँ शायद 

अम्म, उनको डेफिनिटली मिस कर रहे होगे?

हम्म... अभी तो कुछ खास नहीं

बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

ग़ज़ल और हार

सोचता हूँ चंद शेर कहूँ
चंद... से मक़सद है कि
कम से कम इतने तो हो जाएं
कि एक ग़ज़ल की माला अपने गले में पड़ जाये
चलो ग़ज़लों की रवानगी न हो सके, न सही
एक नज़्म की नज़ाक़त ही हाथ लग जाये

चलिए पहले मुद्दा तो ढूंढ लें
जनाब शायद आप मतले की बात कर रहे हैं
मुआफ करें क़िबला... आपने सही फ़रमाया
मतला, मतला --

ख़ैर तो एक बार फिर
काम आएगी ज़िन्दगी,
ज़िन्दगी जो मक़्ते तक पहुँच गयी है
या पंहुचा ही चाहती है 
कितना कुछ है इसके दामन में
इश्क़, जुदाई, मिलन, खुशियां
हसरतें, लालच, चोटें, सुबकियां
कुछ सख़्त हिदायतें, चंद ट्रॉफियां
और भी बहुत कुछ...
अब कोशिश शुरू की जाये
तो जनाब मुलाहज़ा हो जाए --

वो कल मिले और आज बिछड़ गए
वो कल मिले और आज बिछड़ गए

पर मैंने मुक़र्रर तो सुना ही नहीं
जी शायद सुनाई नहीं दिया होगा
यहाँ शोर भी बहुत है
है ना
ख़ैर ग़ौर फरमाएं

वो कल मिले और आज बिछड़ गए
इतनी जल्दी जनाब के तेवर बदल गए

शुक्रिया शुक्रिया... आदाब

वो कल मिले और आज बिछड़ गए

इतनी जल्दी जनाब के तेवर बदल गए
अरमानों पर मेरे बादल घिर आये
मुझसे क्या ग़लत हुआ कोई बतलाये
ये बिला वजह था, यही कह जाये
जो अब तक न हुआ वो हो जाये
कोई नयी नवेली ही घट जाये
पुराना सब कुछ दफ़्न हो जाये
अच्छे वक़्त का बीज जम जाये
और बुरे दिनों पर मिट्टी पड़ जाये --

जी अब ज़रा सोचने के लिए वक़्फ़ा --
म्यां ज़रा वो पानी का प्याला इधर सरकाना
शायद इसीको पानी मांगना कहते होंगे

ग़र कुछ देर और ये सिलसिले चल जाते
तो 'दोस्त' इनमें कुछ और शेर जुड़ जाते
हमने ग़ज़लों के पैगम्बर का क्या बिगाड़ा था
हार नहीं मांगी, ग़ज़ल का हार माँगा था।

अगर आपको पसंद न आई तो क़ुसूर आपका नहीं है








सोमवार, 4 जून 2018

ग़ालिब और मैं

ये न थी हमारी क़िस्मत, कि विसाले यार होता
शुक्र है ना तुम पहुंचे, वरना हम पर ही इल्ज़ाम होता

तेरे वादे पर जिए हम, तो ये जान झूठ जाना
तुम पर भी भरोसा होता, जो दूसरों पे किया होता

कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीमकश को
धरा रह जाता तीर तेरा, जो मेरा निकल गया होता

कहूँ किससे मैं की क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है
ग़र दिन में विसाल होता, तो ज़िक्र-ए-शब-ए-ग़म न होता

ये मसाइले तसव्वुफ़ ये तेरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे हम 'दोस्त' समझते जो न हरजाई होता



गुरुवार, 26 जनवरी 2017

जुर्रत और ख़ता

धीर धीरे जुर्रतों को मेरी
मिल गया दर्जा एक ख़ता का
आहिस्ता आहिस्ता ही सही 
इस मक़ाम तक पहुँच ही गयी ज़िन्दगी
ग़नीमत है

तुम्हें याद तो होगा 
मैंने पहले ही कह दिया था 
मेरी पहली ज़ुर्रत पर ही टोक देना 
बात को वहीँ रोक देना 
तो शिकायत होगी

मैं समझ जाऊंगा
सुलझ जाऊँगा, बदल लूंगा रास्ता
तुम सही तरफ हो लेना
मैं बायें हाथ मुड़ जाऊंगा 

ख़ैर 'दोस्त' अब तो बीती बीत चुकी 
मेहरबानी उनके बर्दाश्त की
जो बर्दाश्त कीं जुर्रतें मेरी
फिर गले लगाया खता को भी
... अब और क्या इनायत होगी


शुक्रवार, 3 जून 2016

राह और राही

जीवन में हम रहे मगन
चले दिए उधर
ले गया जिधर मन
चलते रहे चलते ही रहे हरदम
देखते दाएं बाएं ऊपर नीचे
नदी तालाब बाग़ बगीचे
पैरों की थकावट नापते
रुक गए, जहाँ थक गया बदन

राही राह का होता है
राह भी राही से बनती है
दोनों के वजूद मिट जायें
ग़र राही को लग जाये
मंज़िल से लगन

ज़रा देखा जांचा परखा
पेड़ को, उसकी छाँव को
फूलों फलों को
आते जाते, सुस्ताते लोगों को 
जब लगी लगाव की अगन
अशांत सा हो गया जीवन

वो राह थी इंतज़ार में राही के
राही को भी रास आई मंज़िल
उचटने सा लगा था मन
निकल पड़े फिर से,
राम राम पेड़ भाई
फल फूल तितली भँवरे
आप सब बहुत सुंदर हैं
सुरीले हैं मीठे हैं
पर वो राह मेरे बिना अकेली है
वो दिन रात उसी जगह मेरा इंतज़ार करती है
जहाँ मैं उसे छोड़ आया था
ज़रा भी टस से मस नहीं होती
उसे लगता है अगर वो चल पड़ी तो
मैं उसे कहाँ ढूंढूंगा
उसे बेहद प्यार है मुझसे
राह से वफ़ादार 'दोस्त' कोई नहीं
अपने राही के लिए

बुधवार, 29 जुलाई 2015

राजू को नींद आयी


मैं ये सोच कर एक बाग़ में रुका था
कि कुछ देर रुक कर सुस्ता सकूंगा
बगीचे की
ठंडी हवा थी सुहानी
कुछ देर शायद सो भी सकूंगा
भटकते हुए मुझको दो दिन हो गए थे
खाना न सही, आराम तो मिलेगा
मगर उसने देखा, वो नजदीक आया
'सोना यहाँ मत', ये सुनके घबराया
थी उसकी आवाज़ भारी, फिर भी वो चिल्लाया
वक़्त की नज़ाकत को ज्यों ही मैं समझा
जल्दी से उठ के खड़ा हो गया मैं
खड़ा हो गया मैं
दफ़ा हो गया मैं
दफ़ा हो गया मैं

रविवार, 26 जुलाई 2015

मेहमान नवाज़ दर्द

Photograph for illustration only
सुनी मैंने एक हल्की सी दस्तक
ज़रा सा मुड़ा मैं उस तरफ
उधर, दरवाज़े की तरफ
देखूं तो ज़रा, कौन है भला
उठने लगा बिस्तर से
हलांकि, ज़रा मुश्किल से

कहाँ जा रहे हो बिला वजह
वो गरजा,
मैं फ़ुसफ़ुसाया,
तुमने दस्तक नहीं सुनी क्या
नहीं, लेटे रहो यहीं पर
मैं बोला, मेहमान लौट जाये अगर
मुझे जाना ही होगा
तो मुझे भी साथ ले जाना होगा

ख़ैर, कमर के दर्द को साथ खींचते हुए
लड़खड़ाते संभलते हुए
खोला दरवाज़ा
ये क्या, यहाँ कोई भी नहीं !
पर मेरी कमर से आवाज़ आयी तभी
जी कौन हैं आप
मैं, एक दर्द हूँ जनाब
दर्द तो मैं भी हूँ
पर कौन से दर्द हैं आप
कंधे का हूँ
आइए आइए मैं यहाँ अकेला  ही रहता हूँ
इसे बिस्तर पर ही लिटाये रखता हूँ
कोई साथी नहीं मेरा,
मेरा साथ निभाने को
इसकी तड़प सुनने सुनाने को
अब मज़ा रहेगा जब मिल बैठेंगे दर्द दो
हम बीच में कहीं मिला करेँगे
और खूब बातें किया करेंगे
जी मेहरबानी आपकी
मुझे एक नया घर देने के लिए
वरना आजकल कौन अपने घर
दर्द को बुलावा देता है
पहले आप
जी ठीक आपके बाद

ख़ैर, किसी को पा कर सामने
दरवाज़ा बंद कर दिया मैंने
चिटकनी लगाने को जो हाथ उठाया
तो कंधे में हल्का सा दर्द पाया

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...