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बुधवार, 29 जुलाई 2015

राजू को नींद आयी


मैं ये सोच कर एक बाग़ में रुका था
कि कुछ देर रुक कर सुस्ता सकूंगा
बगीचे की
ठंडी हवा थी सुहानी
कुछ देर शायद सो भी सकूंगा
भटकते हुए मुझको दो दिन हो गए थे
खाना न सही, आराम तो मिलेगा
मगर उसने देखा, वो नजदीक आया
'सोना यहाँ मत', ये सुनके घबराया
थी उसकी आवाज़ भारी, फिर भी वो चिल्लाया
वक़्त की नज़ाकत को ज्यों ही मैं समझा
जल्दी से उठ के खड़ा हो गया मैं
खड़ा हो गया मैं
दफ़ा हो गया मैं
दफ़ा हो गया मैं

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...