हम्! मैं आज की दुनिया के बारे में सोच रहा था.
कितनी भागम भाग है ना. और ये भागम भाग बढ़ती ही जा रही है. भागने की स्पीड भी तेज़ होती जा रही है. दुनिया वाले इस दौड़ को और भी तेज़ करने की होड़ में लगे हैं. तेज़ कारें, तेज़ ट्रेनें, मेट्रो रेल, ऐअरकण्डीशनएड बसें, फर्राटे से भागती कारें, मोटर साईकलें.
किसीको याद नहीं कि जब वो स्कूल में थे तो उनके पिताजी दोपहर का भोजन करके शांति से ११ बजे घर से निकलते थे. ट्रेन में अपने दोस्तों के साथ गपशप मारते हुए ऑफिस पहुँच जाते थे. और फिर शाम को शांत स्वाभाव से मुस्कराते हुए वापस आते थे।
हाँ "शांत", ये एक ऐसा शब्द है जो अब कोई बोलता नहीं। तो शांति से जीने का कैसे सोचेगा। 'शांति' शब्द का जीवन में प्रयोग कम होता जा रहा है. शायद अब ख़तम ही होने वाला है. अगर लोग चाहें तो अपना सारा काम शांति से कर सकते हैं, पर अब सबको भागम-भाग ही भली लगती है.
मैं अपना उदहारण दूँ तो मैं हफ्ते में २ या ३ बार मुंबई शहर जाता हूँ, पेडर रोड. इसमें मुझे तीन तरह के वाहन बदलने पड़ते हैं. पहले मैं अपने घर से मेट्रो ट्रेन लेता हूँ. जो घर से करीब ३५७ मीटर दूर है. वहां से अंधेरी स्टेशन तीन स्टॉप के बाद आता है. वहां मुझे लोकल का टिकट लेना पड़ता है. तो मैं 'वापसी' टिकट ले लेता हूँ, चर्चगेट का. ग्रांट रोड उतर कर मैं एक बस या शेयर टैक्सी लेता हूँ जो मुझे पेडर रोड पर उतारती है. वहां से भी कुछ २०८ मीटर चल कर मैं फिल्म्स डिवीज़न के अंदर पहुँच जाता हूँ.
अब क्योंकि तीन तरह के ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करना होता है, तो मैं अपने पास आधा घंटा ज़्यादा रखता हूँ. और जल्दी पहुँचने पर इस समय का सदुपयोग दोस्तों से फोन पर बातचीत करके हो जाता है. असल में जहाँ तक हो सके मैं पूरे रास्ते ही फ़ोन पर बात करता हूँ. हाँ कभी कभी लोकल ट्रेन में बहुत शोर होता है. इसलिए कुछ समय बातचीत रोकनी पड़ जाती है... उस समय व्यवधान के लिए खेद हो जाता है.
तो कहने का तात्पर्य ये है कि इस भागम भाग की ज़िन्दगी को भी आसानी से, जिया जा सकता है. जो कुछ भी करना है उसे प्यार से, आराम से शांति से कर लो ना. परेशान हो कर वही काम बेहतर नहीं होने वाला है.
आगे तुम जानो और तुम्हारा काम.