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बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

एक अनजानी वजह

कुछ दिन पहले कुछ बदल गया

आहिस्ता से ...

बेहद आहिस्ता से

कई दिनों तक इसकी ख़बर भी नहीं हुई

लगा ही नहीं कि कुछ बदला है

सब ठीक ही लगता रहा


आख़िरकार जब जो जैसा रहता था

वैसा नहीं रहा

कुछ, जो रोज़ ही होता रहता था

अब नहीं हो रहा

एक अर्से से


मुझे पता है कि अगर कोई चीज़

बहुत धीरे-धीरे बदले तो समझ नहीं आती

पता ही नहीं चलता

लगता रहता है होगा कुछ,

ठीक हो जायेगा


ज़िन्दगी में सब इतने मसरूफ़ हैं

अपनी अपनी उलझनों के साथ

क्या पता किसकी उलझन कितनी मुश्किल है


बातें दो तरह से असर करती हैं

एक; एकाएक कोई बहुत बड़ी बात

या कोई ज़रा सी बात जो धीरे धीरे बहुत दिनों में बदले

ख़ैर, अगर कुछ इतने दिन चला है

तो इसकी जायज़ वजह तो होगी ही

और किसी की वजह पर शक नहीं  किया जाता

किसी की वजह पर शक करने का हक़ किसी को नहीं है

पर सभी अपने तूफानों में उलझे हैं

किसी को नहीं पता कि

कौन कैसे तूफानों से गुज़र रहा है 


... अपने तूफानों को मैं ख़ुद समझ लूँगा



सोमवार, 11 मार्च 2019

शायद... तुम्हें पता हो

हुई मुद्दत
कि वक़्त थम गया
और छोड़ गया तुम्हारा अक्स
मेरे चेहरे के सामने
मेरी बंद आँखों में...

इस अक्स के पीछे का चेहरा
हँसता मुस्कराता बातें करता
सीधे मेरी आँखों में देखता...
अब दिखाई नहीं देता
वो आवाज़ अब सुनाई नहीं देती

हाँ पर...
अब भी कभी कभी
मेरी हथेली पर पसीने की
एक हलकी सी पर्त का एहसास होता है
'दोस्त' वो पसीना आज भी

दो हाथों का मालूम होता है

शायद...
तुम्हें पता हो






बुधवार, 21 दिसंबर 2016

अंधेरों के साये

हम हैं साये अंधेरों के
हमें आँखों से नहीं देख पाओगे
यहाँ या वहां हम नहीं मिलने वाले
हमें सिर्फ ख़यालों से ही ढूंढ पाओगे
ग़र आवाज़ देनी हो हमें
तो खुद को पुकार लो
कोई नया गीत गुनगुना लो
हमारा नाम ज़बान से ले पाओगे
हमारे कंधे पर तुम्हारा ये ख़याली हाथ
अब नहीं दे सकेगा ख़याली सहारा
साथ, मदद या आसरा
फ़र्क़ नहीं पड़ता अब
किसी बात से
पता नहीं कैसे
अब हमें कोई छू नहीं सकता
अजीब किल्लत है
जब कन्धा था तो हाथ नहीं थे
अब कई हाथ इसके मुंतज़िर हैं
ये कलाई थामने को बेकरार हैं
शायद फिर हो गया मैं
एक खुशफहमी का शिकार
पता नहीं क्या हुआ है
सब कुछ धुआं हो गया है
मैं यहाँ हूँ या नहीं
यहाँ नहीं तो...
तो फिर कहीं तो हूँगा
जहाँ कहीं भी हूँ
वहां कोई तो होगा
जो शायद मुझे देख सकता होगा
शायद मुझसे मुख़ातिब भी होगा 
अगर ऐसा होगा 'दोस्त'
तो वो भी अंधेरों का साया होगा

रविवार, 12 जुलाई 2015

दुश्मन अपना ही

आओ बैठो दुश्मनो
बाकी सब तो चले गए
रिश्तेदार, दोस्त, ख़ैरख़्वाह
अब ये जगह ख़ाली ही रहती है
आप जैसों के लिए
आइये बैठिये, गालियां दीजिये
भला बुरा कहिये
मुझे अच्छा लगेगा
कोई तो कुछ कहेगा
एक ज़माना हो गया
किसीकी कोई बात सुने
किसीकी आवाज़ सुने
कोई ऐसा जो मुझसे मुख़्तसर हो
मेरे लिए हो
वो दे दे मेरे हिस्से के दो लफ्ज़ मुझे
भले ही वो मेरी बदनामी के हों
या आपकी नेकनामी के
आप 
दुश्मन ही सही
हैं तो इंसान ही
तो निकाल डालिये सारे ग़ुबार
और कर दीजिये खाली अपना दिल
मुझे ख़बर है
मैं अच्छा इंसान कभी न था
ख़ासकर अपने दुश्मनो के लिए
पर अब मैं भी बदल सा गया हूँ
अपना ही दुश्मन बन गया हूँ

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...