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रविवार, 12 जुलाई 2015

दुश्मन अपना ही

आओ बैठो दुश्मनो
बाकी सब तो चले गए
रिश्तेदार, दोस्त, ख़ैरख़्वाह
अब ये जगह ख़ाली ही रहती है
आप जैसों के लिए
आइये बैठिये, गालियां दीजिये
भला बुरा कहिये
मुझे अच्छा लगेगा
कोई तो कुछ कहेगा
एक ज़माना हो गया
किसीकी कोई बात सुने
किसीकी आवाज़ सुने
कोई ऐसा जो मुझसे मुख़्तसर हो
मेरे लिए हो
वो दे दे मेरे हिस्से के दो लफ्ज़ मुझे
भले ही वो मेरी बदनामी के हों
या आपकी नेकनामी के
आप 
दुश्मन ही सही
हैं तो इंसान ही
तो निकाल डालिये सारे ग़ुबार
और कर दीजिये खाली अपना दिल
मुझे ख़बर है
मैं अच्छा इंसान कभी न था
ख़ासकर अपने दुश्मनो के लिए
पर अब मैं भी बदल सा गया हूँ
अपना ही दुश्मन बन गया हूँ

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...