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गुरुवार, 21 जनवरी 2016

नासमझ समझ

तन्हाई की तक़लीफ़,
परेशान न कर पायी मुझे
जुदाई की ज़हमत,
रुला ना पायी मुझे
ऐसा भी नहीं कि मैं ही
पत्थर-दिल हूँ
पर इस दिल की अगन
झुलसा न पायी मुझे
वो भी एक वक़्त था
कि हम उम्मीदों का शौक़ रखते थे
बैठे बैठे खिड़की पे
तुम्हारी राह तकते थे
इंतज़ार में पथरायी ऑंखें
रुला न पायीं मुझे
अब क्या कहें 'दोस्त'
कि क्या था हमारे बीच
क्या ये वो था
जो तुम न समझ सके
या वो, जो समझ न आया मुझे



गुरुवार, 30 जुलाई 2015

ख़ाली पन्ने

ख़ाली  पन्नों की तरह दिन पलटते जा रहे हैं,
ख़बर नहीं के ये, रहे हैं या जा रहे हैं।

किसी रोज़ के चेहरे पर कोई नयी कहानी नहीं,
बस वही एक खामोश दास्ताँ दोहराए जा रहे हैं।

सुबह का उजाला करता है सबके दरवाज़े रोशन,
हमारी जिंदगी में तो बस तारीखें बदले जा रहे हैं।

चंद चाहनेवाले, कुछ यार-दोस्त और ढेर से ख़ैरख़्वाह,
पहुँच गए बहुत ऊंचे, अब पहुँच के बाहर होते जा रहे हैं।

समझ नहीं आया कहाँ भूल हुई, कैसे अटक गई गाड़ी,
दुनिया की भागमभाग को हम खिड़की से देखे जा रहे हैं। 

कहा वाइज़ ने अच्छे दिन तो कब के आ चुके 'दोस्त',
पर उन्हीं के इंतज़ार में हम बरसों गुज़ारे जा रहे हैं।

रविवार, 12 जुलाई 2015

दुश्मन अपना ही

आओ बैठो दुश्मनो
बाकी सब तो चले गए
रिश्तेदार, दोस्त, ख़ैरख़्वाह
अब ये जगह ख़ाली ही रहती है
आप जैसों के लिए
आइये बैठिये, गालियां दीजिये
भला बुरा कहिये
मुझे अच्छा लगेगा
कोई तो कुछ कहेगा
एक ज़माना हो गया
किसीकी कोई बात सुने
किसीकी आवाज़ सुने
कोई ऐसा जो मुझसे मुख़्तसर हो
मेरे लिए हो
वो दे दे मेरे हिस्से के दो लफ्ज़ मुझे
भले ही वो मेरी बदनामी के हों
या आपकी नेकनामी के
आप 
दुश्मन ही सही
हैं तो इंसान ही
तो निकाल डालिये सारे ग़ुबार
और कर दीजिये खाली अपना दिल
मुझे ख़बर है
मैं अच्छा इंसान कभी न था
ख़ासकर अपने दुश्मनो के लिए
पर अब मैं भी बदल सा गया हूँ
अपना ही दुश्मन बन गया हूँ

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...