ख़ाली पन्नों की तरह दिन पलटते जा रहे हैं,
ख़बर नहीं के ये, आ रहे हैं या जा रहे हैं।
किसी रोज़ के चेहरे पर कोई नयी कहानी नहीं,
बस वही एक खामोश दास्ताँ दोहराए जा रहे हैं।
सुबह का उजाला करता है सबके दरवाज़े रोशन,
हमारी जिंदगी में तो बस तारीखें बदले जा रहे हैं।
चंद चाहनेवाले, कुछ यार-दोस्त और ढेर से ख़ैरख़्वाह,
पहुँच गए बहुत ऊंचे, अब पहुँच के बाहर होते जा रहे हैं।
समझ नहीं आया कहाँ भूल हुई, कैसे अटक गई गाड़ी,
दुनिया की भागमभाग को हम खिड़की से देखे जा रहे हैं।
कहा वाइज़ ने अच्छे दिन तो कब के आ चुके 'दोस्त',
पर उन्हीं के इंतज़ार में हम बरसों गुज़ारे जा रहे हैं।