सोमवार, 2 मार्च 2026

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना 

क्या माना ?

यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था 

तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं?

क्या कहा टटपुँजिया? मेरे इस दोपहिया रथ के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया !

हे भगवान, अब इस साइकिल के लिए भी मुझे भाषा की मर्यादा का ध्यान रखना पड़ेगा?

बिलकुल, ये मेरी साइकिल जो है 

पिछली बार तुम कब गिरे थे इससे 

गिरे? तौबा कीजिये। ये गिरने वाला वाहन नहीं है। 

ख़ैर जनाब शायद आप शायद ये भूल गये मैंने आपको कतई पुकारा नहीं था

हो सकता है;  मैं भी तो बाज़ार जा रहा था पर पता नहीं क्यों हैंडल ख़ुदबख़ुद इस रास्ते की तरफ मुड़ गया। आप इस मनचले हैंडल को जानती नहीं ?

वल्लाह ये आप ही की साइकिल है या किसी दिल फ़ेंक देव आनंद की?

क्यों नहीं, हो भी सकती है। हम्म, वैसे ... पहली बार तुम्हारी बात में कुछ दम नज़र आ रहा है। अच्छा एक बात कहूं ?

ठीक है जल्दी बोलो मुझे बहुत काम है 

अ... आज तुम बिलकुल नूतन जैसी दिख रही हो।

अरे! अब ये नूतन कौन है, ये कहाँ से आ गयी?

हैं ! नूतन? हाँ वाक़ेई तुम सही हो।  ये नाम कहाँ से टपक पड़ा?

वल्लाह जवाब, तुमने ही नाम लिया तुम्हें ही नूतन का पता नहीं ?

... ठीक है चलो कुछ दूर साथ चलते हैं 




बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

ऐसा भी होता है

सोचता हूँ कि ऐसा क्या है 

जिसके बारे में सोचने की ज़रुरत नहीं है 

मैं जो कुछ भी अभी सोच रहा हूँ 

या सोच चुका हूँ … क्या उतना ही काफ़ी था 

वहां काफ़ी भीड़ भाड़ थी 

सब थे छोटे-बड़े, पुरुष-महिलाएं 

बच्चे, बूढ़े, जवान 

कुछ मेरे जैसे, कुछ उनके जैसे 

कुछ छड़ी लेकर चलने वाले 

कुछ कूदने वाले भागने वाले 

छड़ी वालों को सहारा देने वाले

उन्हें गेट तक छोड़ के आने वाले 

उनके कार में बैठने का इंतज़ार करने वाले 

खड़ी होती नानी के पीछे हाथ रखने वाले 

कुर्सी सीधी करने वाले 

रसोई में हँसती-मुस्कुराती 

चाय नाश्ता तैयार करतीं

बेटियां भतीजियां

लाइन से सबको प्लेटें पकड़ाते हुए जब नानी की बारी आयी

तो बच्ची को हंसी गयी 

इतनी सी देर में नानी की आँख लग गयी थी 

नानी उठो, नानी .. प्लेट पकड़ो 

प क ड़ो

नानी का चेहरा ध्यान से देखते हुए

बच्ची चुप हो गयी 

उसने चाचा जी की तरफ देखा 

और पीछे हट गई 


सब बूढ़े जवान नानी के इर्द गिर्द  गए 

सबको समझ चुका था 

बेटियां भतीजियां आंसुओं में डूब चुकी थीं 

अब किसीको नानी पीछे हाथ रखने की ज़रूरत  नहीं है 

बूढ़े बच्चों को सांत्वना दे रहे थे 

कोई बात नहीं, कोई बात नहीं

होनी को कौन रोक सकता है 

बस बस... ज़्यादा नहीं रोते  


ये सब भी ज़िंदगी ही तो है… 

कभी कभी ऐसा भी हो जाता है 




कुछ नहीं, पर अँधेरा तो है

इतना अँधेरा !

कहाँ से आया इतना सारा अँधेरा

ये अँधेरा इतना घना क्यूँ है

सारी सड़कें गलियां बगीचे बाज़ार

पता नहीं मैं कहाँ हूँ

कोई आवाज़ भी नहीं है

अँधेरे में कोई आवाज़ क्यों नहीं सुनाई दे रही 

पता नहीं ये सब्ज़ी का बाजार है या मछली का

दूध का या मिठाइयों का या सोने चांदी का

ये अँधेरा सिर्फ बाहर की दुनिया में ही नहीं है

ये मेरे घर के आँगन में, सीढ़ियों पर, रसोई में

और शायद मेरे दिल में

मेरे रोम रोम में घर कर चुका है

शायद मेरा चेहरा भी काला हो गया होगा

मेरे हाथ, पैर, पेट, पीठ

सब कुछ अँधेरे रंग में रंग गए होंगे

शीशा भी कैसे देखूं

शीशा पता ही नहीं कहाँ है

कुछ भी नज़र नहीं आ रहा

अपनी हथेली तक नहीं 

क्या ये रात है?

पर कहाँ गया वो चाँद ?

वो चाँद, वो टिमटिमाते सितारे

मेरी रोशनी के सहारे

आज ठंड भी बहुत है

काश ऊपर कुछ गरम होता

कोई ऊनी कोट या कम्बल

या - सिर्फ तुम्हारे होने का एहसास

तुम्हारी नज़दीकी की गरमाहट

नरम हाथों की पकड़

उन खूबसूरत आँखों की रोशनी

आलिंगन की गरमी

ज़िन्दगी कितनी खाली सी हो चुकी है

कितनी नीरस, ठंडी

अब इस घने अँधेरे में मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ

और कैसे ढूँढूँ

किस तरफ जाऊं

इस दुनिया में कोई भी ना दिखाई दे

कोई बात नहीं

पर तुम न दिखोगी

तो ये ऑंखें किस काम की 

मुझे इनकी ज़रुरत ना होगी

तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में न हो

तो मेरी नब्ज़ किस काम की

तुम्हारा सर मेरे सीने पर न हो

तो ये धड़कन किस काम की



मेहमान दर्द

एक दिन एहसास हुआ मुझे
जैसे किसीने पुकारा हो मुझे 
देखा इधर उधर 
पर न आया कोई नज़र 
फिर किसीने हल्के से छू दिया मुझे 
बेहद घबरा के मैंने पूछा,

"कौन हो भाई दिखाई क्यों नहीं देते"

एक सकपकाई सी आवाज़ ने कहा,
"जी, मैं यहीं हूँ, आपके बिल्कुल नज़दीक"

बग़ैर देखे ही मैंने तीर चला दिया,
"ओह जनाब मैंने पहचाना नहीं 
हम पहले मिले हैं क्या?"

"जी अभी तक तो नहीं"

"नहीं? तो, फरमाएं, कौन हैं आप"

"जी मैं... मैं एक दर्द हूँ"

"दर्द ! आपको मुझसे क्या सरोकार है"

"जी... रहने को जगह मिलेगी कुछ दिनों के लिए"

"क्या? रहने को जगह?
नहीं भाई मुश्किल है मेरे लिए आपको जगह देना 
देखो न मेरे सारे खाने आराम से भरे हैं 
अब आराम से आराम करते हुए आराम को निकाल कर
दर्द को जगह देना बेवक़ूफ़ी होगी ना   
मेरी कितनी बदनामी होगी कुछ ख़बर है आपको"

"अरे जनाब इतने बड़े जिस्म में कोई तो ऐसा खाना होगा 
जहाँ आराम इतना ज़्यादा हो कि मेरा पता ही न चले"
"हैं ! क्या ऐसी भी कोई जगह हो सकती है? पर... आप कौन से दर्द हैं 
मसलन, सर के पेट के या..."
"नहीं नहीं ऐसा नहीं है हम तो जहाँ चले जाएँ वहीं का नाम ले लेते हैं 
जैसे सर दर्द, पीठ दर्द, पेट दर्द वगैरह"
"हम्म..."
"जी ज़रूरत पड़े तो हम हाथ की किसी उंगली में भी रह लेंगे 
पर अगर दो में से एक घुटना मिल जाता तो  क्या बात थी

"ये तो आप ज़्यादती कर रहे हैं 
आराम की भी अपनी ज़िन्दगी है"

"अरे बहुत कर लिया आराम 
अब हमारे जैसे बेसहारों को भी जगह मिलनी चाहिए 
और कितनी रंग बिरंगी विटामिन की गोलियां निगलेंगे
अपने अंदर का माहौल तो एक दिन बर्बाद होना ही है  
फिर उस बर्बादी के पैसे भी देने होंगे
मियां अब वक़्त जाता रहा आराम का
अब ज़माना है परेशानी का
नई नई तरह तरह की अजीबो ग़रीब परेशानियों का
इनसे आदमी का दिमाग़ ज़्यादा चलने लगता है 
अरे जब किसी मुसीबत को टालना हो तो नए तरीक़े ईज़ाद करने पड़ते हैं 
है कि नहीं?
तो जनाब अगर आप हमें रहने की जगह दे दें
तो आप अब से कहीं ज़्यादा अक़्लमंद हो जायेंगे 
ये वादा है"

"आपकी ज़िरह का भी जवाब नहीं 
ठीक है, तो आइये
जहाँ जगह मिले रह जाइये  
और हाँ, आराम से ज़रा तमीज़ से बात कीजियेगा" 

इसके बाद तो जनाब कलाई से लेकर सर तक 
कंधे से एड़ी तक 
पेट, पीठ, कमर हर जगह भर गयी दर्द से 
हकीम के माथे की शिकन बढ़ गयी
दवाओं का असर कम होने लगा 
धीरे धीरे दवाएं भी कम होने लगीं
फिर बंद हो गयीं
हकीम के हाथ दुआ पर आकर ठहर गए 
कहा; अब कोई इलाज नहीं 
लुत्फ़ लीजिये इनका 
दर्द ही तो है कोई मौत तो नहीं है 

बात मुझे सही लगी 
उसके पीछे का जज़्बा भी सही लगा
भई अब दर्द बिचारे कहाँ जाते?
ये सोच के मैंने इन्हें अपना लिया 
अब ये सारे दर्द मेरे हैं 
मेरे अपने हैं 
ये मुझे ज़्यादा तकलीफ भी नहीं देते 
हो सकता है मुझे इनकी आदत पड़ गयी हो  
अब ये सब मेरे साथ ही रहेंगे 
मैं इनका साथ आखिऱ तक न छोड़ूंगा
अब हम बिछड़ेंगे तो शायद
उस बेहद गर्म माहौल में
जब मुझे ख़ुद से, इनसे और इन्हें मुझसे 
निजात मिल जाएगी

आखिऱ हम इस नतीजे पर पहुंचे 'दोस्त'
कि दर्द और परेशानियां तो हमेशा ही रहेंगी
पर आप उनके साथ दोस्त बन के रहेंगे
या उनकी दुश्मनी मोल लेंगे?


चंद्रशेखर आज़ाद कुटी, झाँसी; वो यहाँ १९२४ में अज्ञातवास में रहे। 

गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

शिकायत गज़ल की

क्या इस ग़ज़ल के लबों पर मुस्कान है ?

या वो परेशान है ?

अरे क्यों बिलावजह उठा दिया 

अभी तो मैं सोई थी 

ख़ूबसूरत सपनों में खोई थी 

आँखों में नींद की ख़ुमारी थी 

तैयार होने की बारी थी...  

जी आप से तो कोई  तक़ल्लुफ़ नहीं  

मैं जैसी भी हूँ सोई-जागी, ठीक है 

पर आप तो मुझे दूसरों के सामने पेश करेंगे 

आप मुझे दूसरों के लिए ही बनाते हैं ना 

यहाँ मुझे  दिक़्क़त है

आप तो ऐसे शायर हैं  

कि सर झुकाया, क़लम उठाई  

और बहने लगी ग़ज़ल क़ाग़ज़ पर 

अपनी मर्ज़ी से या ज़बरदस्ती से ... 

ग़र मुझे कुछ और वक़्त मिला होता

तो मैं ज़्यादा अक़लमंद लग सकती थी 

कुछ और ख़ूबसूरत लग सकती थी 

होठों पर लाली लगा सकती थी 

आंखों में काजल डाल सकती थी

गुलाबी और सुनहरे कपड़े वग़ैरह

आख़िर... लोग मेरी तारीफ़ करके 

आप ही की तारीफ़ करते हैं ना  

 



सोमवार, 11 अगस्त 2025

उम्मीद

उम्मीद वो कौन है

क्या है 

वो मेरे लिए क्या है 

वो जो भी है 

जहाँ भी है 

अब... ये सब पता नहीं 

वो ठीक है

बिल्कुल ठीक है या... 

ख़ैर 

दिल कहता है 

कि मेरे से बेहतर हो

शुक्रवार, 20 जून 2025

मिज़ाज गर्म है

गए ज़माने शांति के
ठंडक के 
ठंडे दिमाग़ के 
सलीक़े के, तरीक़े के 
बात चीत के 
समझने समझाने के 
सुलझाने के 
उसकी उसे लौटाने के 
अपना आधा भी,
उसे दे आने के 

क्यों लगते हैं सब इतने नाराज़ ?
कोई भी खुश नहीं 
जैसे कभी ख़ुशी देखी ही नहीं 
मानो दुश्मनी कर ली हो हंसी से 
मुस्कान से मुंह फेर लिया हो 
कितनी ज़मीनों का ख़ून 
सूख नहीं पाया
सूख ही नहीं पाता 
बहाने जो हैं उनके पास
ताज़ा ख़ून बहाने के 

अब तो प्यार जैसी चीज़ भी 
जान लेकर हासिल की जाती है 
चाकू के दिखा कर  
चोट पंहुचा कर 
कपड़े फाड़ कर 
किसी को किसी का ख़ौफ़ नहीं 
मरने का, मारने का
ज़िन्दगी तबाह हो जाने का
राम जाने क्या वजह हैं उनकी 
क्या बहाने हैं उनके 

सुना है लाखों बरस बाद 
ये सूरज आज से कहीं ज़्यादा गरम होगा 
हमारे दिमाग़ की तरह
गरम होता ही जायेगा 
हमारे और नज़दीक आयेगा 
आता ही जायेगा
हमें डरायेगा तड़पायेगा 
झुलसायेगा 
और फिर शायद … 
हमें निगल जायेगा 

सूरज भी देख रहा है हमको 
सीख रहा है चुपचाप हमसे
हमारी ज़िन्दगी से 
उस बेचारे को क्या पता
ग़लत और सही का 
वो हमारी तरह ज़िंदा नहीं
वो हमारी तरह सोचता नहीं 

फिर भी ये अच्छा तरीक़ा होगा
ग़लतियाँ सुधारने का 
हर ग़लत को आग से राख बनाने का
हां, सही को भी साथ जल जाने का
शायद सूरज को इतना तो पता है 
कि सब कुछ ख़त्म करके ही
ग़लत भी ख़त्म हो पायेगा 
एक नई दुनिया तभी जन्मेगी  
जब पुरानी मरेगी 
मुझे मंज़ूर है वो आख़िरी आग 
धू धू करती
आग की वो लपटें
मुझे ढूँढतीं
मुझसे लिपटतीं
मेरा सहारा लेतीं
ग़लत के साथ सही को भी भस्म करतीं


कौन किसका सहारा बनेगा
कौन किसकी ज़िन्दगी बदलेगा 
ये तो वक़्त आने पर 
वक़्त ही बताएगा

 



शनिवार, 21 दिसंबर 2024

एक ख्वाहिश ऐसी

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी,
ऐसी ऐसी, ऐसी ऐसी
कि पूछो मत कैसी कैसी
बेहद अजीब हों जैसी
बिल्कुल नामुमकिन हों, वैसी

कभी कभी तो मुझे लगता है 
मैं कहां से ढूँढूँ ख़्वाहिश ऐसी
मैंने कहाँ से सीखा
ऐसी मांगो दूसरी ढूंढो
ये रहने दो, ये कुछ खास नहीं
अरे ये तो आसान है
इसकी कोई क़ीमत नहीं  
आसान ख़्वाहिश की ख़्वाहिश भी, 
ख़्वाहिश कैसी

तो मैंने सोचा 
कि
सोचा जाये
किसी ऐसी मुश्किल ख़्वाहिश के बारे में 
ऐसी मुश्किल ऐसी मुश्किल, जिसे किसी ने 
कभी न सुलझाया हो, वैसी 
ऐसी मुश्किल जिसका ख़्याल ही किसी को न आया हो  
काम मुश्किल था 
इसीलिए मैंने सोचने का सिलसिला शुरू कर दिया
ऐसी हर एक चीज़, जो हो एक ग़ज़ब की मुश्किल 
जो हो इतनी मुश्क़िल, इतनी मुश्क़िल
कि उसकी ख़्वाहिश से ही दम घुट जाये
 
बरसों की मेहनत के बाद आख़िर 
मुझे मिल ही गया वो ख़्याल 
कि ऐसी चीज़ की ख़्वाहिश करो
जो दिखाई दे
पर मिल न सके
सामने हो पर
उसे छुआ ना जा सके

कहानी कुछ चाँद सितारों जैसी
ये दिखाई देते हैं, बस 
बस इतना ही
उसके आगे कुछ नहीं 
देखिए और खुश रहिये

चलिए 'दोस्त' मुश्किल थोड़ी आसान कर देते हैं 
हज़ारों लफ्ज़ मिटा देते हैं
जी मेरा मतलब है ये लफ्ज़ 'हज़ारों' हटा देते हैं
ग़ालिब बड़े शायर थे मैं उनका
एक हज़ारवां हिस्सा भी नहीं हूँ

"एक ख़्वाहिश ऐसी कि उस एक से ही दम निकले"




सोमवार, 4 नवंबर 2024

ज़िन्दगी या मयकदा

घड़ी की सुइयां सवा बारह पर थीं
आधी रात हो चुकी थी
यानी मयकदे की शाम ढलने लगी थी
लोग कुछ अजीब तरह से हिलने-डुलने लगे थे
जैसे आलस और थकावट ने धर लिया हो
ज़्यादातर लोगों की आवाज़ें भी धीमी हो गई थीं
अब साकी की तरफ़ एक उंगली की बजाय
पूरी हथेली उठ रही थी
पीछे की मेज़ों का शोर ख़त्म हो चला था
एक साक़ी परदे के पीछे चली गयी थी
ख़ैर, कटोरी में बचे चने के आख़िरी दो दाने
मुंह में डालते हुए
मैंने दोनों हाथ घुटनों पर रखे
दीवार की घड़ी पर नज़र डाली
सही वक़्त है
उठने के लिए
सामने रखे नोटों और सिक्कों पर नज़र डाली
सही से थोड़े ज़्यादा लगे
मतलब सही थे
मेज़ का सहारा ले कर
मैं खड़ा हो गया
अब मुझे तीन क़दम सीधे चलना है
जितना हो सके सीधे   
फिर गल्ले के सामने से निकलते हुए दो क़दम बायें
ऐसे वक़्त पर ये हिसाब कर लेना चाहिए
वरना फ़जीहत हो सकती है   
दरवाज़े के बाहर निकलने से पहले
एक लम्हे के लिए मैं पीछे मुड़ा
सब चुपचाप बैठे थे
किसी ने मुझे न देखा न पहचाना
न ही मैंने किसी को
परदे के पीछे साकी अभी भी अपनी तश्तरी पर झुकी हुई थी
गल्ले पर बैठे आदमी का हिलता हाथ
सलाम जैसा लगा
मैं भी सलाम बुदबुदा दिया

शाम की शुरुआत में लोग ज़्यादा ख़ुश होते हैं
ऊंची आवाज़ में बातें करते हैं
चाल तेज़ होती है
प्याले भी जल्दी ख़त्म हो जाते हैं

एक शायराना-सा ख़याल ज़ेहन में पैदा हुआ
मयकदे की हर शाम को जो होता है 
वो इंसान की ज़िन्दगी का अक्स ही होता है
'दोस्त' उम्र के साथ जैसे वक़्त बदलता है
मयकदे की हर शाम का भी वही हश्र होता है

गुरुवार, 26 सितंबर 2024

हमारी स्थिरता

धरती अपनी धुरी पर ४५० मीटर प्रति सेकंड की गति से घूम रही है 

धरती अपने सितारे सूर्य के चारों ओर ३० किलो मीटर प्रति सेकंड की गति से चक्कर लगा रही है 

सूर्य, पूरे सौरमंडल के साथ अपनी आकाश गंगा में २३० किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से चल रहा है

और आकाश गंगा एक सेकंड में अपने अनगिनत तारों, ग्रहों, शायद डार्कमैटर इत्यादि के साथ ६०० किलो मीटर आगे निकल जाती है।


अब भी अगर किसी को लगता है की हम एक ही जगह पर खड़े हैं, तो उन्हें अपना विचार बदलने का अच्छा मौका है 








रविवार, 7 अप्रैल 2024

सच सिर्फ सच

मैं घर पर ही था। शायद सोया था, शायद नहीं। पर सोफे पर जो सबसे अधिक आरामदायक मुद्रा हो सकती है, उसमें था। अगर आँखें खुली हैं तो अधिकतर संयोग है कि मैं सोया नहीं हूँ। अगर बंद हैं तो सोया ही हूं, ऐसा भी पक्का नहीं है। हो सकता है मैं कुछ सोच रहा हूं, किसी बात या घटना की याद कर रहा हूं या सिर्फ़ आराम कर रहा हूं; इनमें से किसी एक की सम्भावना हो सकती है। आपने शायद अनुभव किया हो कि कई बार लोगों से बात करते-करते ऊँघ सी आने लगती है। बातें सुनी-अनसुनी लगने लगती हैं। ख़ास तौर पर बोरिंग लोगों के वही सुने-सुनाए समाचार, वही जानी-पहचानी खुशियां, परेशानियां।
दोपहर के इस वातावरण में सुबह की सुरीली चिड़ियाँ नहीं चहकतीं, कोई इक्का दुक्का कोयल सुनाई दे जाये, तो दे जाये। अधिकतर कौव्वों की ध्वनि ही सराउंड चॅनेल में तैर रही थी। यातायात भी लगभग कुछ नहीं के बराबर था। नगण्य। कदाचित 
इसे ही मनहूसियत कहते होंगे।
विचारों की इस उठा-पटक में मैंने कुछ बेहद अजीब और अलग तरह की आवाज़ सुनी। उस जैसी आवाज़ का घर के सामने वाली सड़क पर सुनाई पड़ना लगभग असम्भव था। पर ये आवाज़ तो घोड़े की टाप जैसी नहीं थी। टेलेविजन की साउंड डिज़ाइन में मैंने घोड़े के टापों के साथ काफी काम किया है। वो तो बिलकुल क्रिस्प होती है, क्लिप-क्लॉप जैसी। क्या बला है ये ? फिर लगा टापों की ध्वनि में कुछ घुंघरू जैसी आवाज़ें भी मिली हुई थीं। अब तो लगा कि ये घोड़ा मुझे खिड़की तक खींच कर ही मानेगा। मैंने ज़रा सा पर्दा हटा कर नीचे झांका।
देखा ना। मुझे पता था कि ये आवाज़ घोड़े की नहीं हो सकती थी। उस जानवर ने ज़ोर से अपना चेहरा दाएं-बाएं हिलाया। अब पता चला घुंघरुओं में पत्थरों की ध्वनि भी मिली हुई थी। अगर मैं इतनी नींद में ना होता तो मुझे ज़बरदस्त झटका लगा होता। नीचे,गेट के ठीक बाहर एक विशालकाय भैंसा खड़ा था। उसके गले में विभिन्न तरह की रंग-बिरंगी मालाएं थीं। बहुत सारी घंटियां भी थीं। माथे पर बड़ा सा लाल टीका था। सबसे बड़ा अचम्भा तो तब हुआ जब मैंने एक बेहद काले आदमी को उसकी पीठ पर सवारी करते देखा। नहीं मैं कोई फिल्म नहीं देख रहा था, निश्चित, निश्चित।
मैंने बैल और गाय ले कर पैसे मांगने वाले लोग कई बार देखे हैं। पर ये आदमी तो भैंसे पर चढ़ा हुआ था। सब कुछ इतना चकित करने वाला था कि मेरा सामान्य ज्ञान इसे समझने में विफल हो गया। वो बेहद काले सज्जन भी अपने भैंसे की तरह ही सज्जित थे, कदाचित उससे अधिक। ख़ैर वो आहिस्ता से सरक कर अपनी सवारी से नीचे उतर गए। भैंसा फिर हिनहिनाया। उन सज्जन ने भैंसे की गर्दन को सहलाया और ऊपर की ओर देखा। मेरा पर्दा दो उंगली बराबर ही खुला होगा। पर उनकी ऊपर देखती नज़र को भांप कर मेरी सांस अटक गयी। मैंने पर्दा छोड़ दिया। कौव्वों की कैं-कें बढ़ गयी थी। शायद वो भैंसे से परेशान हो रहे थे। या शायद घंटियों और मालाओं की ध्वनि से। कुछ क्षणों के बाद मुझे लगा कि कोई भारी भरकम इंसान सीढ़ियों पर चढ़ रहा है। वो नंगे पैर है पर उसका भार हर सीढ़ी पर सुनाई पड़ता है। उसके गले की मालाएं भी बहुत शोर कर रही थीं।

दरवाज़े पर एक बेहद भारी हाथ ने दस्तक दी। केवल एक दस्तक।

अगर मैं आलस और नींद में इस तरह सराबोर नहीं होता तो उस दस्तक की कर्कश ध्वनि से कूद के खड़ा हो जाता। पर इस समय समझ नहीं आया कि क्या किया जाए । दस्तक हुई है, तो आगंतुक के लिए दरवाज़ा खोलना तो बनता ही है। भारत में अतिथि-सत्कार का बड़ा महत्व है। राम-लल्ला का नाम लेते हुए मैंने दरवाज़े को छुआ। सोच-विचार में दो-तीन क्षण और बीत गए। इतने में एक दस्तक और हो गई। धम्म। इस बार मैं हिल गया। क्योंकि मैं दरवाज़े के करीब था।
संभलते हुए मैंने दरवाज़ा खोल दिया। वो अँधेरे सज्जन पूरी तरह दृश्यमान हुए। उनका आकर देखने के लिए मुझे अपनी गर्दन को पूरी तरह नीचे से ऊपर लेना पड़ा। मैंने आदर पूर्वक नमस्कार किया। वो अपनी घनी काली मूछों के पीछे से मुस्कराये। मैं सामने से हट गया जिससे वो अंदर प्रवेश कर सकें। मैंने हाथ से इशारा किया और वो सोफे पर विराजमान हो गए। मैंने कहा 'जल लेकर आता हूं' । 'हं, धन्यवाद'। मैं जल्दी से कांच के गिलास में पानी लेकर आया। उन्होंने गिलास के आर-पार पानी को कौतूहल से देखा और दो घूँट में पूरा पी गए। मैंने पूछा 'और', उन्होंने भंवें सिकोड़ते हुए 'नहीं' सर हिला दिया। मैं गिलास को वापस रखने रसोई में गया तो वो जल्दी में खड़े हो गए थे। इससे पहले मैं उनके पधारने का प्रयोजन पूछूं, एक अजीब घटना हुई। घर को एक झटका सा लगा। भूकम्प जैसा। इससे पहले मैं कुछ सोचता एक के बाद एक कई झटके आ गए। घर के पंखे हिल रहे थे। फ्रिज भी एक तरफ को सरक गया था। ये काफी शक्तिशाली भूकंप था। डर से मैं दीवार को पकड़ कर खड़ा हो गया। मेरे मेहमान भी खड़े थे। उनकी भृकुटि तन गयी थी, और सिकुड़ भी गयी थी। वो अपनी बाहों को दोनों ओर फैला कर सुरक्षा की तलाश में थे। कुछ क्षणों में कड़ाके की आवाज़ के साथ छत में एक लम्बी दरार पड़ गयी। वहां रहने वाले पड़ोसियों की चीत्कारें सुनाई देने लगीं। कैसा भूचाल था ये? रुक ही नहीं रहा था। दीवारों का प्लास्टर भी उखड़ कर गिरने लगा। जल्दी ही छत और दीवारों के अनगिनत टुकड़े लगातार गिरने लगे।

अब एकाएक; वो अँधेरे सज्जन क्रियान्वित हुए। शांति से पहले उन्होंने पर्दा हटा कर नीचे अपनी सवारी को देखा। फिर मेरा हाथ पकड़ के मुझे खिड़की की तरफ़ ले गए। इसके बाद उन्होंने पूरी खिड़की को ही अपने स्थान से हटा दिया। वैसे ही जैसे मैंने पर्दा हटाया था। अगले क्षण मैं बाहर हवा में निकल चुका था। इससे पहले हम नीचे गिरते, उनकी सवारी ऊपर आ चुकी थी। भैंसे जी ये सब देख कर बिल्कुल प्रसन्न नहीं थे। हम दोनों उनकी विशाल पीठ पर विराज गए। कुछ समय तक हम तीनों उस भवन की विनाश-लीला देखते रहे। मेरे पडोसी चीख़ रहे थे। आने-जाने वाले सहायता में जुट रहे थे।

धीरे-धीरे भैंसे जी हम दोनों के साथ ऊपर उठने लगे। शोर कम होता गया। त्रासदी का असर भी कम हो रहा था। हवा थोड़ी ठंडी हो गयी। अब मेरे उस मेहमान ने अपनी जेब से एक बेशकीमती हीरे-मोती जड़े सुनहरे कपड़े का एक लम्बा सा सूची-पत्र बाहर निकाला। उसे ध्यान से परखा और उसके आरम्भ का एक भाग फाड़ कर फ़ेंक दिया। परन्तु वो टुकड़ा हवा में हमारे साथ ही तैरता, चलता रहा। अब उन्होंने आँखें बंद करके ध्यान लगाया और साथ-साथ कोई मन्त्र बुदबुदाया। इसके बाद उस कपड़े में आग लग गयी और कुछ क्षणों में वो राख बन कर बिखर गया।




डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...