बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

ऐसा भी होता है

सोचता हूँ कि ऐसा क्या है 

जिसके बारे में सोचने की ज़रुरत नहीं है 

मैं जो कुछ भी अभी सोच रहा हूँ 

या सोच चुका हूँ … क्या उतना ही काफ़ी था 

वहां काफ़ी भीड़ भाड़ थी 

सब थे छोटे-बड़े, पुरुष-महिलाएं 

बच्चे, बूढ़े, जवान 

कुछ मेरे जैसे, कुछ उनके जैसे 

कुछ छड़ी लेकर चलने वाले 

कुछ कूदने वाले भागने वाले 

छड़ी वालों को सहारा देने वाले

उन्हें गेट तक छोड़ के आने वाले 

उनके कार में बैठने का इंतज़ार करने वाले 

खड़ी होती नानी के पीछे हाथ रखने वाले 

कुर्सी सीधी करने वाले 

रसोई में हँसती-मुस्कुराती 

चाय नाश्ता तैयार करतीं

बेटियां भतीजियां

लाइन से सबको प्लेटें पकड़ाते हुए जब नानी की बारी आयी

तो बच्ची को हंसी गयी 

इतनी सी देर में नानी की आँख लग गयी थी 

नानी उठो, नानी .. प्लेट पकड़ो 

प क ड़ो

नानी का चेहरा ध्यान से देखते हुए

बच्ची चुप हो गयी 

उसने चाचा जी की तरफ देखा 

और पीछे हट गई 


सब बूढ़े जवान नानी के इर्द गिर्द  गए 

सबको समझ चुका था 

बेटियां भतीजियां आंसुओं में डूब चुकी थीं 

अब किसीको नानी पीछे हाथ रखने की ज़रूरत  नहीं है 

बूढ़े बच्चों को सांत्वना दे रहे थे 

कोई बात नहीं, कोई बात नहीं

होनी को कौन रोक सकता है 

बस बस... ज़्यादा नहीं रोते  


ये सब भी ज़िंदगी ही तो है… 

कभी कभी ऐसा भी हो जाता है 




2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सारी यादें ताज़ा हो गयीं । कविता भी क्या खूब है । ऐसा प्रतीत होता है जैसे जीवन का एक अंश चित्रित कर दिया है । जीवन और मृत्यु देखने का तरीक़ा उम्र के स्वरूप होता है । अति उत्तम ।

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत धन्यवाद। जी मैंने जीवन के एक बेहद करीबी अंश को यहाँ ढालने का प्रयत्न किया है। मैं भाग्यशाली हूँ की आपको मेरी कोशिश अच्छी लगी

      हटाएं

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