रविवार, 5 सितंबर 2021
छाया की क्षमता
खड़ी? खड़ी नहीं पड़ी थी
मेरा मतलब छाया फर्श पर थी
कुछ देर वो वहीं रुकी
वो छाया
फिर आहिस्ता से हिली
और दूसरे कमरे की तरफ चली
वहां रुकी
छाया का सिर हल्का सा इधर-उधर घूमा
वो कुछ देख रही थी या भांप रही थी
थोड़ी देर में छाया की बाहें हिलीं
फिर इधर उधर घूमने लगीं
पहले ज़रा आराम, से फिर ज़ोर से
थोड़ी देर में वो रुक गयीं
अब उसका सर एक तरफ मुड़ा
फिर दूसरी तरफ
फिर ये सिलसिला शुरू हो गया
दाएं बाएं ऊपर नीचे
फिर गोल गोल चारों ओर
अब सब शांत हो गया
शायद ये काम ख़तम हो गया होगा
छाया के हाथ कमर पर रुक गए
फिर वो एक तरफ मुड़ी और कुछ जांचा
फिर दूसरी तरफ
उसने देखा कि और किस किस की छाया वहां हैं
एक छाया टेबल की है
दो कुर्सियां भी हैं अपनी अपनी छाया के साथ
छाया ने इन छायाओं के बीच की जगह को परखा
सोचा काफी जगह है
और धीरे धीरे टहलना शुरू किया
पहले ज़रा संभल के
आहिस्ता आहिस्ता
फिर तेज़ और तेज़
कई मिनट टहलने के बाद
एक अजीब बात हुई
काफी अजीब
हुआ ये के छाया पर पानी कुछ बूँदें आ गिरीं
पर उन बूंदों की कोई छाया नहीं थी
अगर शायद होगी भी, तो उस वक़्त होगी
जब वो ऊपर से नीचे गिर रही होंगी
अब छाया कैसे सोच सकती है
कि उसके माथे पर भी पसीना आ सकता है
इंसान की जितनी क्षमता और योग्यता है
जितने लक्ष्य वो हासिल कर सकता है
वो उस सबका छाया मात्र ही प्राप्त कर पा रहा है
रविवार, 22 अगस्त 2021
एक चीज़ छोटी सी
रविवार, 8 अगस्त 2021
अरज है इतनी
शनिवार, 7 अगस्त 2021
जो था सो था
वो काफी पहले था
मैं अब जैसा हूँ वैसा नहीं था
बहुत छोटा था
छोटे तो सभी होते हैं
पहले जब वो होते हैं
कि क्या पता होना चाहिए
तब धीरे धीरे पता चल रहा था
क्या ज़रूरी था
क्या नहीं था
क्या कुछ ऐसा था
जो उस वक़्त ज़रूरी था
पर बाद में नहीं होने वाला था
और बहुत कुछ ऐसा था
जो समझ में नहीं आता था
पर ज़रूरी लगता था
शायद बाद में उसकी ज़रुरत पड़ने वाली थी
पर पक्का नहीं था
कि किसी चीज़ की ज़रूरत बाद में पड़ेगी
कितनी बाद में
कुछ दिनों में महीनों में या बरसों में
इतना सोचना नहीं आता था
वक़्त ऐसे ही गुज़र रहा था
कई ग़ैर ज़रूरी चीज़ें
चंद ग़ैर ज़रूरी काम
ज़मीन पर बैठ कर सब जूतों के फीते खोलना
फिर डाल देना
कितना वक़्त होता था
कोई बताने वाला भी नहीं था
मन में कोई नाराज़गी खिन्ननता या उदासी नहीं थी
मैं ख़ुश भी नहीं था
सोमवार, 17 मई 2021
परेशां बुत
सारे रिश्ते भुला कर
अपना पराया गँवा कर
ज़िन्दगी आ गयी है
ऐसे मक़ाम पे
जहाँ न सुकून है न दर्द है
कभी सुकून है तो दर्द भी है
दोनों साथ साथ हैं
फर्क मिट गया है दोनों के बीच का
कभी सुकून दर्द की वजह होता है
तो कभी दर्द में सुकून छुपा होता है
सूरज ढ़लता और चढ़ता साथ साथ
सुबह और शाम साथ साथ
ख़बर नहीं वक़्त चल रहा है
या थमा हुआ है
मैं कहीं जा रहा था
या आ रहा था
या ऐसा कुछ हुआ ही नहीं
मैं कहीं गया ही नहीं
कहीं जाने वाला ही नहीं था
आना जाना सिर्फ एक ख़याल था
हर शख़्स एक बुत बना हुआ था
शनिवार, 15 मई 2021
कुछ खास नहीं
अरे! क्या हाल है दोस्त ?
बस, कुछ खास नहीं
किधर चले?
कहीं नहीं, बस यूँ ही
और कोई नयी ताज़ी ?
नहीं नहीं, कुछ खास नहीं
अच्छा, ये हाथ पे क्या हुआ
कुछ नहीं, ऐसे ही
ये तो जले का निशान लगता है
हाँ असल में वो ...
घर में पकोड़े तुम बना रहे थे?
नहीं नहीं, बस ऐसे ही
उफ़, तेल काफी गरम रहा होगा हाथ फूल गया है
असल में... आग से जला है
आग! कैसी आग?
चिंगारी
चिंगारी? घर में? आग लग गयी थी क्या?
नहीं, असल में पिता जी के दाह संस्कार में एक...
क्या! तुम्हारे फादर गुज़र गए ?
हाँ... वो तीन दिन हुए
ओहो तो ये निशान चिता की आग से?
हाँ हाँ वहीं से, मुझे ही करना था सब कुछ
सॉरी यार... तो क्या बीमार थे ?
नहीं... सिर्फ बूढ़े थे, नब्बे साल के
अरे वाह तब तो पूरी ज़िन्दगी जी लिए ऐसा कह सकते हैं
हाँ, कह भी सकते हैं
बीमार रहे? आख़ीर में?
नहीं कुछ खास नहीं, सिर्फ एक महीना
वाह वाह, जीना हो तो ऐसा
हाँ शायद
अम्म, उनको डेफिनिटली मिस कर रहे होगे?
हम्म... अभी तो कुछ खास नहीं
शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021
मैं: तब और अब
जिन जिन से मिलना था मिल आये हैं
अब आ गए हैं अपने घर दोस्त
ख़ुद से गुफ़्तगू के लिए
तो बैठ गए हम अपने सामने
आमने सामने
और कस ली है कमर
दोनों ने
हिसाब किताब के लिए
बचपन से अब तक क्या मिला
कितना मिला
उसको मैंने कितना बढ़ाया,
गंवाया, कितना बनाया
कितना संवारा, निखारा
पर बचपन में क्या मिला ?
बचपन तक तो मिला नहीं
बचपन में बच्चे कैसे सोचते हैं
क्या करते हैं
क्या उनकी कोई इच्छा होती है
कितना दौड़ते भागते हैं
कूद फांद करते हैं
पार्क में, झूलों पर
अनजाने दोस्तों के बीच
अनजानी ख़ुशियों में डूबे
क्या वो सब था कहीं?
मुझे तो सिर्फ याद है
यहाँ बैठ जाओ
ये खा लो, इसको हाथ मत लगाओ
देखो टूट न जाये
अगर हर चीज़ से डरना पड़ा
सुन्दर चीज़ों से दूर रहना पड़ा
तो मुझे क्या मिला
डर ? और लालच ?
डर और लालच का मैं क्या बना सकता था
ज़्यादा डर और ज़्यादा लालच ?
शायद यही
या तुम्हारे पास कोई दूसरा तर्क है ?
नहीं ना
अजीब बात है
मैंने कई लोगों को ये कहते सुना था
ये बच्चा बड़ा बुद्धिमान है
चार साल की आयु में पूरी हनुमान चालीसा याद कर ली !
और भी बहुत कुछ...
चलो आगे बढ़ते हैं
कॉलेज की बात करें
नहीं, रुको
पहले ये देखो की आज तुम्हारे पास क्या क्या है
कई मज़बूत चीज़ें हैं
घर है नाम है परिवार है
हुनर है ..
एक मिनट
पर ये सब मुझे दिया किसने
तुमने ? बिलकुल नहीं
ये सब मेरी मेहनत, बुद्धिमत्ता और लगन का नतीजा है
मेरे साथ कोई नहीं था
पहले तो जनाब
ये सारे इरादे मैंने अपने अंदर पैदा किये
और फिर उन इरादों को इन तमाम चीज़ों में तबदील किया
किसी को कुछ पता नहीं था
कि मैं क्या चाहता हूँ
क्या सोचता हूँ
मन में कुछ है भी या बस सर झुकाये काम किये जा रहा हूँ
मैं बिलकुल अकेला था
जब मेरे अंदर लगातार ये सारा मंथन चल रहा था
बरसों तक मंथन, मंथन, मंथन
फिर उस मंथन से धीरे धीरे सुनहरी चीज़ें बाहर आने लगीं
धीरे धीरे उन सुंदर चीज़ों से एक नयी दुनिया बनने लगी
तुम्हें मालूम था कि वो सब क्या हो रहा था?
तुम तो ऐसी बात सोच भी नहीं सकते थे
सब बकवास, यही ना
बचपन का वो डर अब विश्वास में ढल चुका था
मैंने अपने विश्वास के सहारे
नए लोग ढूंढे
सुन्दर, प्यारे, निश्चिन्त
जिनके चेहरे पर मुस्कान रहती थी
तनाव नहीं
ये समझ लो कि नए रिश्ते बनाये
जल्द ही वो सब जो मुझे बचपन में मिलना चाहिए था
मैंने जवानी में हासिल किया
दोस्ती स्नेह आत्मविश्वास और भी बहुत कुछ
ख़ुद, अकेले
मैं शायद फिर से बच्चा बन रहा था
तुम्हारी सोच इतनी पुरानी है
कि, कि... तुम्हें सोचना ही नहीं चाहिए
कुछ भी नहीं
सोचना तुम्हारा काम नहीं है
लोग बाहर जा कर काम करते हैं
नाम कमाते हैं धन अर्जित करते हैं
दोस्त बनाते हैं
ये सब तुम्हारे बस का नहीं है
तुम्हें तो बस दिमाग लगाए बग़ैर ही जैसे मिलता रहा है
वैसे ही मिलता रहे...
तुमने कोल्हू देखा है?
मैंने देखा है
एक बैल छोटी सी अँधेरी कोठरी में चक्कर लगाता रहता है
घूमता रहता है, घूमता रहता है
गोल गोल गोल
उसको पता ही नहीं होता कि वो सरसों का तेल निकाल रहा है
सरसों कितनी बड़ी होती है पता है ?
इत्ती सी होती है
तुम वैसे ही हो कोल्हू के उस बैल जैसे
पहली बात तो तुम कुछ नया कर ही नहीं सकते
अगर कुछ कर भी रहे हो तो तुम्हें पता ही नहीं होगा
दुःखद
ख़ैर; ठीक है मैं वापस ज़रूर आया हूँ
पर वापस आ नहीं गया हूँ
मैं वापस बाहर जाने के लिए ही आया हूँ
तुम्हारे साथ मेरा दम घुटता है
मुझे बाहर के बुद्धिमान दुश्मन मंज़ूर हैं
पर घर में छुपे सुरक्षित बेअक्ल दोस्त नहीं
मंगलवार, 23 मार्च 2021
एक बिचारा असंभव विचार
बेहद ख़ुशी हुई
इतने सारे जान पहचान के लोग एक साथ !
पर क्षमा करें
मैं आपके स्वागत में उठ नहीं सकता
हाथ नहीं मिला सकता
नमस्कार नहीं कर सकता
चलिए छोड़िए इस मुद्दे को
जी आप यहाँ इस तरफ की कुर्सी पर बैठ जाइये
और आप उस तरफ ... दरी पर जगह है
बच्चे तो ठीक ही हैं
पानी बरामदे में लगा है
आप शायद बैठना नहीं चाहते
कोई बात नहीं आप जैसा मुनासिब समझें
कहते हैं सबसे मिल कर दुख कम हो जाता है
शायद बंट जाता है
पर यहाँ तो लोग आपस में मिल कर और भी रो रहे हैं
ये ज़रूर है कि थोड़ी देर के बाद घर की बातें
बच्चों के किस्से
ऑफिस की गपशप आड़े आ जाती है
तो माहॉल हल्का होने लगता है
और थोड़ी देर में ठहाके भी सुनाई पड़ते हैं
पर ज़रा दबे-दबे, नज़रें बचा के
मैं सही हूँ
या नहीं
पता नहीं
शायद वैसे मुझे सोचने का हक़ नहीं है
मैंने वो हक़ खो दिया है
ये सत्य है कि
चलना बैठना बोलना भागना
अब मेरे लिये नहीं है
क्योंकि वो सब भौतिक हैं
परन्तु विचार का तो कोई रूप नहीं है
वो तो मन है
कहीं भी जा सकता है
कुछ भी कर सकता है
सबको छू सकता है
किसी चेहरे के इर्दगिर्द मंडरा सकता है
डर नूतन से
ठीक है, ठीक है, माना । क्या माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...
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मैं कौन था और क्या बन गया हूँ पहले बेहतर था, या अब हूँ पहले कुछ था भी, या अभी की तरह ही कुछ नहीं हूँ अगर कुछ था तो क्या था और अगर अब कुछ हूँ...
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मैं घर पर ही था। शायद सोया था, शायद नहीं। पर सोफे पर जो सबसे अधिक आरामदायक मुद्रा हो सकती है, उसमें था। अगर आँखें खुली हैं तो अधिकतर संयोग ह...

