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शनिवार, 7 अगस्त 2021

जो था सो था

एक समय था
वो काफी पहले था
मैं अब जैसा हूँ वैसा नहीं था
बहुत छोटा था
छोटे तो सभी होते हैं
पहले जब वो होते हैं
उस वक़्त मुझे पता नहीं था
कि क्या पता होना चाहिए
तब धीरे धीरे पता चल रहा था
क्या ज़रूरी था
क्या नहीं था
क्या कुछ ऐसा था
जो उस वक़्त ज़रूरी था
पर बाद में नहीं होने वाला था
और बहुत कुछ ऐसा था
जो समझ में नहीं आता था
पर ज़रूरी लगता था
शायद बाद में उसकी ज़रुरत पड़ने वाली थी
पर पक्का नहीं था
कि किसी चीज़ की ज़रूरत बाद में पड़ेगी
कितनी बाद में
कुछ दिनों में महीनों में या बरसों में
इतना सोचना नहीं आता था

वक़्त ऐसे ही गुज़र रहा था
कई ग़ैर ज़रूरी चीज़ें
चंद ग़ैर ज़रूरी काम
ज़मीन पर बैठ कर सब जूतों के फीते खोलना
फिर डाल देना
कितना वक़्त होता था
पर मुझे पता ही नहीं था कि
मेरा दिल और दिमाग़ जो करना चाहता था
वो क्या था 
क्या हो सकता था
अगर वो सामने आता तो.. 
तो मैं उसे पहचान सकता था 
पर उस जैसा कुछ कहीं नहीं था
कोई बताने वाला भी नहीं था
मन में कोई नाराज़गी खिन्ननता या उदासी नहीं थी
मैं ख़ुश भी नहीं था

इसका आश्‍वासन भी मैं नहीं दे सकता 

रविवार, 2 जुलाई 2017

क्या करें क्या ना करें

अब वक़्त आ पहुंचा है वहां, जहाँ
इसे बहुत वक़्त पहले पहुँच जाना चाहिए था 
वक़्त की मीठी बातों में उलझे रहे हम 
हमें इसका इंतज़ार नहीं करना चाहिए था
अगर कुछ करना था तो उठते
और उठ कर, कर देते 
किसीकी हामी या आँख के इशारे को नहीं देखना चाहिए था 
चलो अब तो जो हुआ सो हुआ,
कर चुके जो भी करना,
या ना करना चाहिए था 
बड़े खुश थे हम हज़ारों दिन जेब में लिए 
जोश में खर्च कर दिए आधे,
जो क़तई नहीं करना चाहिए था 
कोई तो बताये कि हमने क्या सही, क्या ग़लत किया 
क्या हम वो सब ही करते रहे जो हमें ना करना चाहिए था?
किस तरफ चलते
किस बात की कोशिश करते 'दोस्त' 
मंज़िल ख़ुद वहां डेरा डाले बैठी थी
जहाँ पहले हमें होना चाहिए था



शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

मेरा वक़्त और मैं

कभी ऐसा सोचा
जिनको मिलना था 
वो बिना मिले ही चले गये 
और ख़त लिखा
कि तुमसे मिल कर बड़ा मज़ा आया
उस दिन मौसम कितना ख़ुशगवार था
चौदहवीं के चाँद पे निखार था
तारे भी बिखरे हुए थे
खुशबु के समंदर
हवा पे तैर रहे थे
कैसी अजीब बात है
इतनी सारी बातें लिख डालीं
जो हुई ही नहीं
कोई ऐसा कैसे लिख सकता है 
मैं तो वहां पहुंचा ही नहीं 
और वो कहता है
हम मिल भी लिए 
पर ज़िक्र चाँद तारों का
खुशबू और हवाओं का
अब 
ख़याल आया ...
शायद मेरा वक़्त और मैं
एक दुसरे से बिछड़ गए हैं
वो धागे टूट गए हैं
जो मुझे मेरे समय से जोड़े रखते हैं 
मुझे जो कुछ कल औरपरसों
करना है / था 
वो सब हो चुका है 
मेरा आने वाला कल बीत चुका है





गुरुवार, 30 जुलाई 2015

ख़ाली पन्ने

ख़ाली  पन्नों की तरह दिन पलटते जा रहे हैं,
ख़बर नहीं के ये, रहे हैं या जा रहे हैं।

किसी रोज़ के चेहरे पर कोई नयी कहानी नहीं,
बस वही एक खामोश दास्ताँ दोहराए जा रहे हैं।

सुबह का उजाला करता है सबके दरवाज़े रोशन,
हमारी जिंदगी में तो बस तारीखें बदले जा रहे हैं।

चंद चाहनेवाले, कुछ यार-दोस्त और ढेर से ख़ैरख़्वाह,
पहुँच गए बहुत ऊंचे, अब पहुँच के बाहर होते जा रहे हैं।

समझ नहीं आया कहाँ भूल हुई, कैसे अटक गई गाड़ी,
दुनिया की भागमभाग को हम खिड़की से देखे जा रहे हैं। 

कहा वाइज़ ने अच्छे दिन तो कब के आ चुके 'दोस्त',
पर उन्हीं के इंतज़ार में हम बरसों गुज़ारे जा रहे हैं।

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

कहां हो तुम

कहां हो तुम

कितना वक़्त गुज़र गया  
तुम्हें देखे, सुने,
महसूस किये 

ये दिन, ये रात
सुबह, शाम
मिल गए, घुल गए
एक दूसरे में 
ख़त्म हो गया फर्क 
अँधेरे और उजाले का 
कहां हो तुम 

चले गए तुम जाने कहां 
शायदतुम्हे जाना था जहां 
अब तुम्हारे नये अपने हैं   
और पुराने पराये हैं  

ख़ाली हो गया जहाँ मेरा
तुम्हारे चले जाने से 
अब मैं और मेरा ये खालीपन 
पूरा कर रहे हैं एक दूसरे की कमी को
दोनों को इंतजार है तुम्हारा

कहां हो तुम



शतरंज के मोहरे

बाबर, एलेग्जेंडर, चंगेज़ 
मुग़ल, जापानी, अंग्रेज़
अकबर, औरंगज़ेब, माओ  
हिमलर, स्टालिन, हिरोहितो
सद्दाम हुसैन, इदी अमीन
तिमूर, अफ़ज़ल, गज़नी

जीतने वाले, हारने वाले
मरने वाले, मारने वाले
एक अँधेरे पिटारे में बंद
एक दूसरे के ऊपर
कूड़े की तरह,
बेतरतीब फेंके हुए
न कोई बात चीत
न कोई हरकत
पर हाथ में तलवार पकड़े
ढ़ाल जकड़े
ताज पहने, पगड़ी बांधे

किसी ने भी ये बात न मानी
ख़त्म हो चुकी थी उनकी कहानी



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...