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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

कहां हो तुम

कहां हो तुम

कितना वक़्त गुज़र गया  
तुम्हें देखे, सुने,
महसूस किये 

ये दिन, ये रात
सुबह, शाम
मिल गए, घुल गए
एक दूसरे में 
ख़त्म हो गया फर्क 
अँधेरे और उजाले का 
कहां हो तुम 

चले गए तुम जाने कहां 
शायदतुम्हे जाना था जहां 
अब तुम्हारे नये अपने हैं   
और पुराने पराये हैं  

ख़ाली हो गया जहाँ मेरा
तुम्हारे चले जाने से 
अब मैं और मेरा ये खालीपन 
पूरा कर रहे हैं एक दूसरे की कमी को
दोनों को इंतजार है तुम्हारा

कहां हो तुम



रविवार, 19 जुलाई 2015

... ख़ुदा ख़ैर करे

बड़ी दिलकश है उफ़, ये मुस्कान, ख़ुदा ख़ैर करे
कन्धों पे जा ठहरी ज़ुल्फों की ढलान ख़ुदा ख़ैर करे

वो चांदी सी चमकती बालियाँ ज़ुल्फों की जानिब से
घटाओं में जैसे बिजली की चमकार, ख़ुदा ख़ैर करे

गुलाबी रेशम के रंग की रंगत है, चेहरे पे शायद
या रेशम ने है चुराया चेहरे का गुलाब ख़ुदा ख़ैर करे

किस खुशकिस्मत पे इतनी खुश हो, हम भी ज़रा सुने
ग़लत फहमी के होंगे कितने शिकार, ख़ुदा ख़ैर करे

हम तो तस्वीर पर ही डाल चुके हथियार 'दोस्त'
रूबरू हुए तो क्या होगा हाल, ख़ुदा ख़ैर करे



सोमवार, 13 जुलाई 2015

अब... दर्द नहीं होता

उनके वो मिज़ाज नहीं रहे
प्यारे प्यारे मजमून नहीं रहे
हंसी के फ़व्वारे अब नहीं फूटते
वो लम्हे मासूम नहीं रहे
गुज़रा वक़्त याद तो आता है हर वक़्त
पर दर्द नहीं होता 

दुनिया हो गयी बड़ी बेरहम
ये शहर भी अब बेगाना सा लगता है
नक्शे मिट गए
रहनुमा खो गए
कहाँ जाएँ दिखाई नहीं देता 
पर अब इसका दर्द नहीं होता  

अब तुम, तुम नज़र नहीं आते 
मैं भी खुद को समझ नहीं पाता
शायद तुम वोही हो मेरी हमसफ़र 
मैं भी हूँ तुम्हारा, अपना अजनबी
इन बेरहम ख़यालों से लड़ता रहा हूँ 'दोस्त'
पर ग़नीमत है, कि अब... दर्द नहीं होता

शनिवार, 11 जुलाई 2015

पहली मुलाक़ात

याद है मुझको वो लम्हा
जब हमारी नज़रें
मुख्तलिफ़ ख़ूबसूरत नज़ारों से फिसल कर
आपस में टकरा गईं थीं
लगा था एक तेज़ झटका सा
और मेरे दिल पर पड़ा एक भारी सा पत्थर
खिसक कर गिरा और
तुम्हारे दिल के पत्थर से जा टकराया
हवा का एक हल्का सा झोंका आया
तुम्हारा सिलेटी दुपट्टा लहराया
और दुपट्टे की लहरों पे मचलते वो पत्थर
गहरी वादियों में यूं ग़ुम हो गए
जैसे हवाओं का एक झोंका
फूलों के बगीचे में से गुज़र जाए


मुसीबत मेरी

आओ दिखाऊँ तुम्हें ना-अक़्ली मेरी
खुद ही कर बैठे शिकायत उससे मेरी

अब कहीं जाने को मन नहीं करता
घर पर ही रवां है आवारगी मेरी

कह दिया अब न रोयेंगे उसके लिए हम
ये थी हिम्मत या कोई दीवानगी मेरी

मेरा डूबा दिल तो शायद संभल ही जायेगा
पर उनकी पेशानी के ख़म हैं मुसीबत मेरी

जहाँ से वो गुज़रा था 'दोस्त' एक रोज़,
उस राह के ज़र्रे बन गए हैं मंज़िल मेरी



शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मेरी बात मानो

पता है मुझको 
तुम्हारी पर्त दर पर्त 
परेशानियों का
ग़मों के उस मोटे लम्बे लबादे का
जिसमें तुम ढकी हो
पूरी तरह
मुझे ख़बर है
कितनी गर्मी है वहां
उस लबादे के नीचे 
मेरी बात मानो 
मेरी परेशानियों की भी चादर मत ओढ़ो
मत बढ़ाओ बोझ अपने लबादे का 
मैं ख़ुद ही संभाल लूँगा 
इस झीनी सी चादर को
अपनी ज़िन्दगी की गर्मी को
मैं ठीक हूँ मेरे 'दोस्त'
जब तक है मेरे ऊपर
तुम्हारी दोस्ती की चादर

धड़कते अँधेरे

तेरी यादों के उलझते गहराते अँधेरे 
अँधेरी रातों के कसते तंग होते घेरे

याद हैं ज़ुल्फ़ों के वो घनघोर अँधेरे
वो नींद सुकून की सवेरे से अंधेरे

तेरे लब चमकते हैं ख़ूनी खंजरों की तरह 
कोई चिराग़ न रोशन हो जाये क़ातिल पे मेरे

रहने दे दफ़न मुझको दामन में अपने 
कहीं मिट्टी न हटा देना चेहरे से मेरे

तेरे उरोज़ों के नीचे वो धड़कते अँधेरे
मेरा दिल धड़क रहा है 'दोस्त' दिल से तेरे

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...