उनके वो मिज़ाज नहीं रहे
प्यारे प्यारे मजमून नहीं रहे
हंसी के फ़व्वारे अब नहीं फूटते
वो लम्हे मासूम नहीं रहे
गुज़रा वक़्त याद तो आता है हर वक़्त
पर दर्द नहीं होता
दुनिया हो गयी बड़ी बेरहम
ये शहर भी अब बेगाना सा लगता है
नक्शे मिट गए
रहनुमा खो गए
कहाँ जाएँ दिखाई नहीं देता
पर अब इसका दर्द नहीं होता
अब तुम, तुम नज़र नहीं आते
मैं भी खुद को समझ नहीं पाता
शायद तुम वोही हो मेरी हमसफ़र
मैं भी हूँ तुम्हारा, अपना अजनबी
इन बेरहम ख़यालों से लड़ता रहा हूँ 'दोस्त'
पर ग़नीमत है, कि अब... दर्द नहीं होता

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