क्या प्रकाश की ओर बढ़ना ही सत्य है
क्या अंधकार में रहना सर्वथा मिथ्या है
क्या अंधकार ही मिथ्या है
क्या अंधकार में जीवन बिताना मूर्खता है
क्या अंधकार और प्रकाश के बीच एक समझौता नहीं हो सकता
इनके बीच कोई रास्ता नहीं निकल सकता
जहाँ से मैं कहीं भी जा सकूँ
कभी कभी मुझे एक ओर तीव्र प्रकाश दिखाई देता है
जो मुझे अपनी ओर खींचता है
उस ओर बढ़ता हूँ
तो बीच में एक पारदर्शी दीवार से टकरा जाता हूँ
वो दीवार मुझे रोक देती है
आगे नहीं जाने देती
शायद वो चाहती है कि मुझे कहीं प्रकाश की आदत न पड़ जाये
ऐसा न हो कि मैं प्रकाश के बिना रह न सकूँ
जबकि अँधेरा ऐसा नहीं सोचता
वो मुझे चारों ओर से घेरे रखता है
एक सुरक्षा कवच की तरह
अँधेरे में मैं कहीं भी जा सकता हूँ
वहां कोई दीवार नहीं होती
फिर भी जाने क्यों
मेरे अंदर ही कोई शक्ति मुझे
अँधेरे से प्रकाश की ओर जाने के लिए प्रेरित करती रहती है
इन दो शक्तियों के बीच मुझे वो रेखा ढूढनी होगी
जहाँ दोनों का मेल हो एक ओर प्रकाश हो
और दूसरी ओर अँधेरा हो
वहां मैं शांति से ऑंखें बंद करके बैठ सकूँ
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