गुरुवार, 16 जुलाई 2015

कोशिश एक ग़ज़ल की

एक ग़ज़ल कहने की कोशिश में हाथ रुक गए
मिन्नतों के बाद भी लफ़्ज़ों के अंदाज़ रुक गए 

मांगी मदद अल्लाह से, सिर्फ एक अदद ख़याल की,
ख़याल की तो छोडिये उनके किवाड़ बंद हो गए 

ग़ज़ल बहती रही है और बहती ही रहेगी,
पर आज उसके बहने के सब बहाने रुक गए

हम तो समझे थे कोई ख़ास मुश्किल पेश आयेगी,
पर कलम खामोश रही और स्याही के रंग उड़ गए

मक़ता तो है बहुत दूर इस ग़ज़ल के लिये 'दोस्त',
मतले में ही इस दिमाग़ के कारोबार रुक गए



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