सोमवार, 13 जुलाई 2015

एक रूमानी ख़याल

याद है मुझको वो परेशान सा चेहरा
वो पसीने के मोती
वो हवा में झूलती जुल्फों की गिरहें
गिरहों से उलझती नाज़ुक सी उंगलियाँ
इधर उधर तकती
हिरन सी निगाहें
जाने क्या ढूंढ रही थीं
के मैं बीच में गया

उसकी निगाह गुज़री मुझ पर से
ऐसा लगा जैसे
रुई का नन्हा सा
क़तरा छू गया
मेरे चेहरे को
हवा के एक हल्के से झोंके ने
एक हसीन खुशबू का एहसास
सांसों में जगाया
आंखें बंद हो गयीं
धरती सूरज चाँद आवाजें
सब के कारोबार रुक गए
पहले सारी काएनात थम गयी
फिर खामोश हो गयी

किसने डाले छींटे पानी के
चेहरे पे मेरे
नींद खुल गयी
या होश गया
सब कुछ ठीक था
सड़कें, लोग, गाड़ियाँ
बादल, हवा, शोर...
बारिश भी शुरू हो गयी थी


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