मंगलवार, 14 जुलाई 2015

तेरे खूबसूरत अँधेरे उजाले

तेरे ऊँचे उजले उरोज़ों के बीच 
वो गहरा अँधेरा गलियारा
दोनों उरोजों को अलग करती
एक अनजानी, अनछुई घाटी
मेरी बेशर्म, बेसब्र निगाहें 
उन खूबसूरत रेशमी 
उरोज़ों से फिसल कर 
बेख़ौफ़ पहुँच जाती हैं
उस जादुई गलियारे में
जहाँ कुछ दिखाई नहीं देता 
अँधेरे के सिवा 
कुछ याद नहीं रहता
तेरे सिवा
कुछ सुनाई नहीं देता 
तेरी धडकनों के सिवा 
कोई डर नहीं लगता
लगता है ज़िन्दगी का सारा सुकून
है उसी वादी में
काश अब कोई बुलाये
मिलने आये 
मौत के सिवा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...