आओ दिखाऊँ तुम्हें ना-अक़्ली मेरी
खुद ही कर बैठे शिकायत उससे मेरी
अब कहीं जाने को मन नहीं करता
घर पर ही रवां है आवारगी मेरी
कह दिया अब न रोयेंगे उसके लिए हम
ये थी हिम्मत या कोई दीवानगी मेरी
मेरा डूबा दिल तो शायद संभल ही जायेगा
पर उनकी पेशानी के ख़म हैं मुसीबत मेरी
जहाँ से वो गुज़रा था 'दोस्त' एक रोज़,
उस राह के ज़र्रे बन गए हैं मंज़िल मेरी
खुद ही कर बैठे शिकायत उससे मेरी
अब कहीं जाने को मन नहीं करता
घर पर ही रवां है आवारगी मेरी
कह दिया अब न रोयेंगे उसके लिए हम
ये थी हिम्मत या कोई दीवानगी मेरी
मेरा डूबा दिल तो शायद संभल ही जायेगा
पर उनकी पेशानी के ख़म हैं मुसीबत मेरी
जहाँ से वो गुज़रा था 'दोस्त' एक रोज़,
उस राह के ज़र्रे बन गए हैं मंज़िल मेरी
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