बेतहाशा भागती ज़ार ज़ार ज़िन्दगी
ये बेअक़्ल, बे-लगाम ज़िन्दगी
समझ सका ना कभी मैं जिसको
ऐसी बेमक़सद बेअक़ल ज़िन्दगी
क्या भला करेगी ये मेरा कभी
है ख़ुद जो बेकार बेकाम ज़िन्दगी
क्या दे सकती थी परेशानियों के सिवा
ये मेरी बेहया बेआराम ज़िन्दगी
मेरी मौत की वजह एक ही है 'दोस्त'
मेरी ये बेग़ैरत बेईमान ज़िन्दगी

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें