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सोमवार, 11 मार्च 2019

शायद... तुम्हें पता हो

हुई मुद्दत
कि वक़्त थम गया
और छोड़ गया तुम्हारा अक्स
मेरे चेहरे के सामने
मेरी बंद आँखों में...

इस अक्स के पीछे का चेहरा
हँसता मुस्कराता बातें करता
सीधे मेरी आँखों में देखता...
अब दिखाई नहीं देता
वो आवाज़ अब सुनाई नहीं देती

हाँ पर...
अब भी कभी कभी
मेरी हथेली पर पसीने की
एक हलकी सी पर्त का एहसास होता है
'दोस्त' वो पसीना आज भी

दो हाथों का मालूम होता है

शायद...
तुम्हें पता हो






सोमवार, 4 जून 2018

ग़ालिब और मैं

ये न थी हमारी क़िस्मत, कि विसाले यार होता
शुक्र है ना तुम पहुंचे, वरना हम पर ही इल्ज़ाम होता

तेरे वादे पर जिए हम, तो ये जान झूठ जाना
तुम पर भी भरोसा होता, जो दूसरों पे किया होता

कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीमकश को
धरा रह जाता तीर तेरा, जो मेरा निकल गया होता

कहूँ किससे मैं की क्या है, शब-ए-ग़म बुरी बला है
ग़र दिन में विसाल होता, तो ज़िक्र-ए-शब-ए-ग़म न होता

ये मसाइले तसव्वुफ़ ये तेरा बयान 'ग़ालिब'
तुझे हम 'दोस्त' समझते जो न हरजाई होता



गुरुवार, 21 जनवरी 2016

नासमझ समझ

तन्हाई की तक़लीफ़,
परेशान न कर पायी मुझे
जुदाई की ज़हमत,
रुला ना पायी मुझे
ऐसा भी नहीं कि मैं ही
पत्थर-दिल हूँ
पर इस दिल की अगन
झुलसा न पायी मुझे
वो भी एक वक़्त था
कि हम उम्मीदों का शौक़ रखते थे
बैठे बैठे खिड़की पे
तुम्हारी राह तकते थे
इंतज़ार में पथरायी ऑंखें
रुला न पायीं मुझे
अब क्या कहें 'दोस्त'
कि क्या था हमारे बीच
क्या ये वो था
जो तुम न समझ सके
या वो, जो समझ न आया मुझे



सोमवार, 2 नवंबर 2015

बेवफ़ा ख़याल

आप देख रहे हैं इसे 
ये है एक ख़्याल
जो मेरे घर आया, मुझसे मिला
और कहा मुझे तुम पसंद आये
क्या मैं तुम्हारे साथ रह सकता हूँ
तुम्हारी क़लम की रोशनाई से ढ़ल सकता हूँ
हड़बड़ी में हिचकिचाते हुए
गड़बड़ी में क़लम उठाते हुए
मैंने कहा क्यों नहीं
तुम मुझे इतनी इज़्ज़त दे रहे हो
तो आओ, रहो मेरे पास
मेरे ख़्यालों में
मेरी कविता में, शायरी में

मुस्करा कर वो मेरे काग़ज़ पर उतर आया
अब वो सबके सामने इतराता है
अपनी जगह दिखाता है
बड़ा ख़ुश नज़र आता है

पर जनाब इससे भी बेहतर
कई ख़ूबसूरत ख़्याल भी मिले
दूर से बड़े मज़ेदार भी लगे
एक तो 
नहाते वक़्त मेरे ग़ुसलख़ाने में पहुँच गया  
बड़ा ही अटपटा लगा मुझे
पर सोचा इतना ख़ूबसूरत ख़्याल !
मैंने उसका नाम ले लिया
एक दो बार ज़ोर से बोल भी दिया
कि याद रह जाए
मेरे साथ मेरे ज़ेहन में बस जाए
पर जनाब मुझे ख़ूबसूरती पर भरोसा नहीं है
उन्हें घमंड होता है ख़ुद पर
वो किसी और की कविता बनना चाहते हैं
किसी ज़्यादा मशहूर और अमीर की
जिसका 
पहले से ही बड़ा नाम हो
उसकी दुनिया चमकदार हो
और ऊंचे दाम हों
ख़ुशी ख़ुशी मैं गुसलखाने से बाहर आया
कागज़ क़लम दावत को सजाया
बड़े शौक़ से 
'दोस्त' जो सर झुकाया
तो उस ख़्याल को नदारद पाया



रविवार, 26 जुलाई 2015

पूरे, आधे-अधूरे

ज़िन्दगी में मिले कई 
कभी हाँ कभी न वाले दोस्त 
कभी वादे निभाने 
कभी न निभाने वाले दोस्त 
उनकी भावनाएं रूकती और चलती हैं ऐसे 
दिवाली की जलती बुझती लाइटें हों जैसे 
अब ये जगह मुझे रास नहीं आ रही 
या शायद इस जगह को ही मैं नहीं भा रहा 
यहाँ एक गीत याद आया,
'ऐ मेरे दिल कहीं और चल'
वाक़ेई इस गीत ने मेरी ज़रुरत समझी है 
मुझे एक नयी दुनिया की तलाश करनी चाहिए  
भले ही ऐसी ही पर दूसरी
इसलिए तुम बिलकुल परेशानी मत उठाओ 
और रहने दो वो अपने बचे हुए कस्में वादे 
आधे अधूरे ही 
जो बाकी हैं वो हो जायेंगे पूरे 
शायद हो ही जायेंगे
कहीं और, किसी दूसरी दुनिया में

फिर ये ज़रूरी तो नहीं 
कि सब कुछ पूरा ही हो ज़िन्दगी में  
दुनिया में आधी अधूरी चीज़ें भी होती है 
और वो खूबसूरत भी हो सकती हैं 
बल्कि होती हैं 
अधखिली कलियाँ कम नहीं होतीं 
खिले हुए फूल से 
आधी मुस्कान
आधा चाँद 
चौदवीं का चाँद 
आधे पहने कपड़े
आधी हाँ आधी ना 

तो जा रहा हूँ 'दोस्त' 
पर शायद आधे मन से 
ढूँढने वो जहाँ, जहाँ 
अधूरे ख्वाबों की 
अधूरे वादों की 
अधूरे रिश्तों की
अधूरी ही सही 
पर इज्ज़त होगी
इज्ज़त होगी अधूरेपन की



मंगलवार, 21 जुलाई 2015

अपनापन ग़मों से

मेरे अपनों के ग़म, अब मेरे हो गए लगते हैं 
वो सब लोग अब, और भी अपने से लगते हैं 

दुनिया में सारे दोस्तों के दर्द अब तो 
खुद ही मेरे दिल में बस गए लगते हैं 

उनके ग़मों की काली घटाओं के आगे
मेरे ही ग़म मुझे फीके फीके से लगते हैं 

वहां कोई है अकेला और वो ज़रा बीमार से रहते हैं 
हम इसीलिए उनके ग़मों से बेज़ार रहते हैं

किसी घर में मातम है उनके वापस न आने का
कोई परेशां है, घर में हमेशा ही मेहमान रहते हैं 

मैं हांकता फिरा 'दोस्त' अपने ही दर्दों की डींगें 
औरों की दास्ताँ से जाना, हम तो जन्नत में रहते हैं  



मंगलवार, 14 जुलाई 2015

वो पहली सी मोहब्बत

मेरे महबूब वो पहली सी मोहब्बत
अब न मिल पायेगी तुमको
तुम अकेले उस तरफ निकल गए
मैं भी कहीं और जा रहा हूँ
ज़िन्दगी की उलझनों में उलझा हूँ
सबको निभानी है दुनियादारी
अब तो ऊपर की ज़रूरतें
हो गयी हैं ज़्यादा ज़रूरी
वो ज़रूरतें जिनके बग़ैर
ज़िन्दगी रुक सकती है
अब प्यार की बात मत करो
सोने, चांदी और नक़द की बात करो
एक हसीन बोसे की बजाय
अच्छे कपड़ों का ज़िक्र हो
आँखों में उम्मीदों की चमक नहीं
गाड़ी की चमक की बात करो
याद नहीं महक महबूब के बदन की
उसकी ज़ुल्फ़ों की
अब तो इत्र की क़ीमत
और खुशबू की बात करो
नशीली आँखों का ज़िक्र छोडो
जाम-ओ-मीना के सुरूर की बात करो
इन सबके बग़ैर रुक जाएगी ज़िन्दगी
प्यार मोहब्बत न हो तो ज़िन्दगी नहीं थमती
मोहब्बत किसी काम नहीं आती
मोहब्बत है क्या
एक एहसास ही तो है
एहसास-ए-मोहब्बत से ज़िन्दगी नहीं चलती 'दोस्त'
वो पहली सी मोहब्बत
अब न मिल पायेगी किसीको









ये ज़िन्दगी

बेतहाशा भागती ज़ार ज़ार ज़िन्दगी 
ये बेअक़्ल, बे-लगाम ज़िन्दगी

समझ सका ना कभी मैं जिसको 
ऐसी बेमक़सद बेअक़ल ज़िन्दगी 

क्या भला करेगी ये मेरा कभी
है ख़ुद जो बेकार बेकाम ज़िन्दगी

क्या दे सकती थी परेशानियों के सिवा
ये मेरी बेहया बेआराम ज़िन्दगी 

मेरी मौत की वजह एक ही है 'दोस्त' 
मेरी ये बेग़ैरत बेईमान ज़िन्दगी



सोमवार, 13 जुलाई 2015

अब... दर्द नहीं होता

उनके वो मिज़ाज नहीं रहे
प्यारे प्यारे मजमून नहीं रहे
हंसी के फ़व्वारे अब नहीं फूटते
वो लम्हे मासूम नहीं रहे
गुज़रा वक़्त याद तो आता है हर वक़्त
पर दर्द नहीं होता 

दुनिया हो गयी बड़ी बेरहम
ये शहर भी अब बेगाना सा लगता है
नक्शे मिट गए
रहनुमा खो गए
कहाँ जाएँ दिखाई नहीं देता 
पर अब इसका दर्द नहीं होता  

अब तुम, तुम नज़र नहीं आते 
मैं भी खुद को समझ नहीं पाता
शायद तुम वोही हो मेरी हमसफ़र 
मैं भी हूँ तुम्हारा, अपना अजनबी
इन बेरहम ख़यालों से लड़ता रहा हूँ 'दोस्त'
पर ग़नीमत है, कि अब... दर्द नहीं होता

एक रूमानी ख़याल

याद है मुझको वो परेशान सा चेहरा
वो पसीने के मोती
वो हवा में झूलती जुल्फों की गिरहें
गिरहों से उलझती नाज़ुक सी उंगलियाँ
इधर उधर तकती
हिरन सी निगाहें
जाने क्या ढूंढ रही थीं
के मैं बीच में गया

उसकी निगाह गुज़री मुझ पर से
ऐसा लगा जैसे
रुई का नन्हा सा
क़तरा छू गया
मेरे चेहरे को
हवा के एक हल्के से झोंके ने
एक हसीन खुशबू का एहसास
सांसों में जगाया
आंखें बंद हो गयीं
धरती सूरज चाँद आवाजें
सब के कारोबार रुक गए
पहले सारी काएनात थम गयी
फिर खामोश हो गयी

किसने डाले छींटे पानी के
चेहरे पे मेरे
नींद खुल गयी
या होश गया
सब कुछ ठीक था
सड़कें, लोग, गाड़ियाँ
बादल, हवा, शोर...
बारिश भी शुरू हो गयी थी


मिट्टी गिरने से पहले

पता नहीं कितनी ज़िन्दगी जी गया मैं
तेरी पलकों के साये के बग़ैर 
साये के सहारे के बग़ैर  
सुकूं के बिना
नींद के बग़ैर 
ना-फ़िक्र लम्हों के बिना 
तेरी गर्मी--मोहब्बत,
आगोश की नरमी के बग़ैर

फिर से पोंछ दे मेरे आंसू 
अपने दुपट्टे के कोने से 
भर ले मेरे पसीने के मोती
अपनी नर्म हथेली में 
और आख़िर 
अगर हो सके
तो अपनी सियाह जुल्फों से
अँधेरा कर दे चेहरे पर मेरे
मूँद लूं मैं आंखें
आखिरी बार 

मिट्टी गिरने से पहले

रविवार, 12 जुलाई 2015

दुश्मन अपना ही

आओ बैठो दुश्मनो
बाकी सब तो चले गए
रिश्तेदार, दोस्त, ख़ैरख़्वाह
अब ये जगह ख़ाली ही रहती है
आप जैसों के लिए
आइये बैठिये, गालियां दीजिये
भला बुरा कहिये
मुझे अच्छा लगेगा
कोई तो कुछ कहेगा
एक ज़माना हो गया
किसीकी कोई बात सुने
किसीकी आवाज़ सुने
कोई ऐसा जो मुझसे मुख़्तसर हो
मेरे लिए हो
वो दे दे मेरे हिस्से के दो लफ्ज़ मुझे
भले ही वो मेरी बदनामी के हों
या आपकी नेकनामी के
आप 
दुश्मन ही सही
हैं तो इंसान ही
तो निकाल डालिये सारे ग़ुबार
और कर दीजिये खाली अपना दिल
मुझे ख़बर है
मैं अच्छा इंसान कभी न था
ख़ासकर अपने दुश्मनो के लिए
पर अब मैं भी बदल सा गया हूँ
अपना ही दुश्मन बन गया हूँ

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

धड़कते अँधेरे

तेरी यादों के उलझते गहराते अँधेरे 
अँधेरी रातों के कसते तंग होते घेरे

याद हैं ज़ुल्फ़ों के वो घनघोर अँधेरे
वो नींद सुकून की सवेरे से अंधेरे

तेरे लब चमकते हैं ख़ूनी खंजरों की तरह 
कोई चिराग़ न रोशन हो जाये क़ातिल पे मेरे

रहने दे दफ़न मुझको दामन में अपने 
कहीं मिट्टी न हटा देना चेहरे से मेरे

तेरे उरोज़ों के नीचे वो धड़कते अँधेरे
मेरा दिल धड़क रहा है 'दोस्त' दिल से तेरे

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...