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रविवार, 2 जुलाई 2017

क्या करें क्या ना करें

अब वक़्त आ पहुंचा है वहां, जहाँ
इसे बहुत वक़्त पहले पहुँच जाना चाहिए था 
वक़्त की मीठी बातों में उलझे रहे हम 
हमें इसका इंतज़ार नहीं करना चाहिए था
अगर कुछ करना था तो उठते
और उठ कर, कर देते 
किसीकी हामी या आँख के इशारे को नहीं देखना चाहिए था 
चलो अब तो जो हुआ सो हुआ,
कर चुके जो भी करना,
या ना करना चाहिए था 
बड़े खुश थे हम हज़ारों दिन जेब में लिए 
जोश में खर्च कर दिए आधे,
जो क़तई नहीं करना चाहिए था 
कोई तो बताये कि हमने क्या सही, क्या ग़लत किया 
क्या हम वो सब ही करते रहे जो हमें ना करना चाहिए था?
किस तरफ चलते
किस बात की कोशिश करते 'दोस्त' 
मंज़िल ख़ुद वहां डेरा डाले बैठी थी
जहाँ पहले हमें होना चाहिए था



रविवार, 26 जुलाई 2015

पूरे, आधे-अधूरे

ज़िन्दगी में मिले कई 
कभी हाँ कभी न वाले दोस्त 
कभी वादे निभाने 
कभी न निभाने वाले दोस्त 
उनकी भावनाएं रूकती और चलती हैं ऐसे 
दिवाली की जलती बुझती लाइटें हों जैसे 
अब ये जगह मुझे रास नहीं आ रही 
या शायद इस जगह को ही मैं नहीं भा रहा 
यहाँ एक गीत याद आया,
'ऐ मेरे दिल कहीं और चल'
वाक़ेई इस गीत ने मेरी ज़रुरत समझी है 
मुझे एक नयी दुनिया की तलाश करनी चाहिए  
भले ही ऐसी ही पर दूसरी
इसलिए तुम बिलकुल परेशानी मत उठाओ 
और रहने दो वो अपने बचे हुए कस्में वादे 
आधे अधूरे ही 
जो बाकी हैं वो हो जायेंगे पूरे 
शायद हो ही जायेंगे
कहीं और, किसी दूसरी दुनिया में

फिर ये ज़रूरी तो नहीं 
कि सब कुछ पूरा ही हो ज़िन्दगी में  
दुनिया में आधी अधूरी चीज़ें भी होती है 
और वो खूबसूरत भी हो सकती हैं 
बल्कि होती हैं 
अधखिली कलियाँ कम नहीं होतीं 
खिले हुए फूल से 
आधी मुस्कान
आधा चाँद 
चौदवीं का चाँद 
आधे पहने कपड़े
आधी हाँ आधी ना 

तो जा रहा हूँ 'दोस्त' 
पर शायद आधे मन से 
ढूँढने वो जहाँ, जहाँ 
अधूरे ख्वाबों की 
अधूरे वादों की 
अधूरे रिश्तों की
अधूरी ही सही 
पर इज्ज़त होगी
इज्ज़त होगी अधूरेपन की



शनिवार, 25 जुलाई 2015

धागा, एक ख्याल का

कुछ तो गिला है उनके  चले जाने का 
कुछ ये ग़म कि ये लोग मरते ही नहीं

ज़िन्दगी अगर उदास है उनके बग़ैर 
तो इनकी वजह से मौत भी है शर्मसार,

वो तो फैला देते थे बहारें मोहब्बत की 
इनसे सुलग जातीं हैं चिंगारियां नफरत की 

कितना फर्क़ है 'दोस्त' इस दुनिया के इंसानों में 
वो अगर भगवान् थे, तो ये शामिल हैं हैवानों में

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

वो पहली सी मोहब्बत

मेरे महबूब वो पहली सी मोहब्बत
अब न मिल पायेगी तुमको
तुम अकेले उस तरफ निकल गए
मैं भी कहीं और जा रहा हूँ
ज़िन्दगी की उलझनों में उलझा हूँ
सबको निभानी है दुनियादारी
अब तो ऊपर की ज़रूरतें
हो गयी हैं ज़्यादा ज़रूरी
वो ज़रूरतें जिनके बग़ैर
ज़िन्दगी रुक सकती है
अब प्यार की बात मत करो
सोने, चांदी और नक़द की बात करो
एक हसीन बोसे की बजाय
अच्छे कपड़ों का ज़िक्र हो
आँखों में उम्मीदों की चमक नहीं
गाड़ी की चमक की बात करो
याद नहीं महक महबूब के बदन की
उसकी ज़ुल्फ़ों की
अब तो इत्र की क़ीमत
और खुशबू की बात करो
नशीली आँखों का ज़िक्र छोडो
जाम-ओ-मीना के सुरूर की बात करो
इन सबके बग़ैर रुक जाएगी ज़िन्दगी
प्यार मोहब्बत न हो तो ज़िन्दगी नहीं थमती
मोहब्बत किसी काम नहीं आती
मोहब्बत है क्या
एक एहसास ही तो है
एहसास-ए-मोहब्बत से ज़िन्दगी नहीं चलती 'दोस्त'
वो पहली सी मोहब्बत
अब न मिल पायेगी किसीको









शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मेरी बात मानो

पता है मुझको 
तुम्हारी पर्त दर पर्त 
परेशानियों का
ग़मों के उस मोटे लम्बे लबादे का
जिसमें तुम ढकी हो
पूरी तरह
मुझे ख़बर है
कितनी गर्मी है वहां
उस लबादे के नीचे 
मेरी बात मानो 
मेरी परेशानियों की भी चादर मत ओढ़ो
मत बढ़ाओ बोझ अपने लबादे का 
मैं ख़ुद ही संभाल लूँगा 
इस झीनी सी चादर को
अपनी ज़िन्दगी की गर्मी को
मैं ठीक हूँ मेरे 'दोस्त'
जब तक है मेरे ऊपर
तुम्हारी दोस्ती की चादर

धड़कते अँधेरे

तेरी यादों के उलझते गहराते अँधेरे 
अँधेरी रातों के कसते तंग होते घेरे

याद हैं ज़ुल्फ़ों के वो घनघोर अँधेरे
वो नींद सुकून की सवेरे से अंधेरे

तेरे लब चमकते हैं ख़ूनी खंजरों की तरह 
कोई चिराग़ न रोशन हो जाये क़ातिल पे मेरे

रहने दे दफ़न मुझको दामन में अपने 
कहीं मिट्टी न हटा देना चेहरे से मेरे

तेरे उरोज़ों के नीचे वो धड़कते अँधेरे
मेरा दिल धड़क रहा है 'दोस्त' दिल से तेरे

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...