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गुरुवार, 16 जुलाई 2015

कोशिश एक ग़ज़ल की

एक ग़ज़ल कहने की कोशिश में हाथ रुक गए
मिन्नतों के बाद भी लफ़्ज़ों के अंदाज़ रुक गए 

मांगी मदद अल्लाह से, सिर्फ एक अदद ख़याल की,
ख़याल की तो छोडिये उनके किवाड़ बंद हो गए 

ग़ज़ल बहती रही है और बहती ही रहेगी,
पर आज उसके बहने के सब बहाने रुक गए

हम तो समझे थे कोई ख़ास मुश्किल पेश आयेगी,
पर कलम खामोश रही और स्याही के रंग उड़ गए

मक़ता तो है बहुत दूर इस ग़ज़ल के लिये 'दोस्त',
मतले में ही इस दिमाग़ के कारोबार रुक गए



शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मेरी बात मानो

पता है मुझको 
तुम्हारी पर्त दर पर्त 
परेशानियों का
ग़मों के उस मोटे लम्बे लबादे का
जिसमें तुम ढकी हो
पूरी तरह
मुझे ख़बर है
कितनी गर्मी है वहां
उस लबादे के नीचे 
मेरी बात मानो 
मेरी परेशानियों की भी चादर मत ओढ़ो
मत बढ़ाओ बोझ अपने लबादे का 
मैं ख़ुद ही संभाल लूँगा 
इस झीनी सी चादर को
अपनी ज़िन्दगी की गर्मी को
मैं ठीक हूँ मेरे 'दोस्त'
जब तक है मेरे ऊपर
तुम्हारी दोस्ती की चादर

बात बस बिगड़ सी गयी

जाने क्या तुमने कही
जाने मैंने क्या सुनी
बात कुछ बिगड़ सी गयी
जाने क्या तुमने कही

चेहरा तमतमा सा गया, 
मन में गुस्सा भर गया
कस गयीं नसें दिल की, 
बात बस बिगड़ सी गयी

आँखें ताज्जुब से फटीं
और नीचे को झुकीं
सपने सब बिखर से गए, 
बात बस बिगड़ ही गयी

खुल गए राज़ कई 
पी लूं आज ज़हर कोई 
ख़त्म कर दूँ सब यहीं 
बात बस बिगड़ थी गयी



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...