nazm लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
nazm लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 10 मई 2017

क़ीमत

क़ीमत 
हर इंसान लगाता है क़ीमत 
हर एक चीज़ की
हर इंसान की 
इसकी, उसकी, घर की, गाड़ी की 
ज़मीन जायदाद की 
यहाँ तक दोस्तों की, मां बाप की
भाई बहनों की 
घर बार की, देश दुनिया की 
दूसरों के विचारों की 
उनकी समझ की, समझदारी की 

... अपनी भी
माफ़ करें 
शायद यहाँ कुछ अटपटा हो गया
उल्टा पल्टा हो गया 
जो पहले आना था वो बाद में आया
क़ीमत खुद की 
यानि एक ऐसी बेशक़ीमती चीज़ की
जिसका ख़ुद की नज़र में 
कोई मोल नहीं हो सकता
ख़ुद पर कोई दाम नहीं लिखा जा सकता 
कोई लिखता भी नहीं 
अगर किसीने लिखा भी, 
तो वो ग़लत होगा  
अपनी नज़र में ज़्यादातर लोग 
कुछ ज़्यादा ही क़ीमती होते हैं 
या यूँ कहिये बेशक़ीमती होते हैं
हालांकि उनके बारे में दूसरों का ख़याल 
कुछ दूसरा ही होता है
ठीक वैसे ही जैसे इनका औरों के बारे में... 
चलिए ये सब अंदर की बात है 
उसके हर किसीके के मन की बात है 
घर घर की बात है 
फिर भी इस दुनिया में 
ज़्यादातर लोग अपनी क़ीमत को 
अपने दिल ही में छुपाये 
अपने साथ लेकर चले जाते हैं 
दुनिया को पता ही नहीं चल पाता 
कि खुद की नज़र में वो 
कितने मंहगे या सस्ते थे

रविवार, 26 जुलाई 2015

पूरे, आधे-अधूरे

ज़िन्दगी में मिले कई 
कभी हाँ कभी न वाले दोस्त 
कभी वादे निभाने 
कभी न निभाने वाले दोस्त 
उनकी भावनाएं रूकती और चलती हैं ऐसे 
दिवाली की जलती बुझती लाइटें हों जैसे 
अब ये जगह मुझे रास नहीं आ रही 
या शायद इस जगह को ही मैं नहीं भा रहा 
यहाँ एक गीत याद आया,
'ऐ मेरे दिल कहीं और चल'
वाक़ेई इस गीत ने मेरी ज़रुरत समझी है 
मुझे एक नयी दुनिया की तलाश करनी चाहिए  
भले ही ऐसी ही पर दूसरी
इसलिए तुम बिलकुल परेशानी मत उठाओ 
और रहने दो वो अपने बचे हुए कस्में वादे 
आधे अधूरे ही 
जो बाकी हैं वो हो जायेंगे पूरे 
शायद हो ही जायेंगे
कहीं और, किसी दूसरी दुनिया में

फिर ये ज़रूरी तो नहीं 
कि सब कुछ पूरा ही हो ज़िन्दगी में  
दुनिया में आधी अधूरी चीज़ें भी होती है 
और वो खूबसूरत भी हो सकती हैं 
बल्कि होती हैं 
अधखिली कलियाँ कम नहीं होतीं 
खिले हुए फूल से 
आधी मुस्कान
आधा चाँद 
चौदवीं का चाँद 
आधे पहने कपड़े
आधी हाँ आधी ना 

तो जा रहा हूँ 'दोस्त' 
पर शायद आधे मन से 
ढूँढने वो जहाँ, जहाँ 
अधूरे ख्वाबों की 
अधूरे वादों की 
अधूरे रिश्तों की
अधूरी ही सही 
पर इज्ज़त होगी
इज्ज़त होगी अधूरेपन की



एक खुशनुमा ख़याल

मिल गया शायद 
वो कोना ज़िन्दगी का 
जहाँ कुछ सुकूं है 
थोडा आराम है, राहत है
उनके गर्म ख़यालों से,
मेरी गर्म ख़याली से 
उन लफ़्ज़ों के तानों से 
इस दिल के बानों से 
नयी चोटों  के दर्द से
पुराने दर्द उभर आने से

पर एका-एक मेरे मन ने
बना लिया एक घेरा सा 
ऊंची ऊंची दीवारों का
और कर दीं हैं बाहर इसके 
मुश्किलें और तकलीफें
महफूज़ लगता है अब इनके अन्दर 
लगता है बसबस जाऊं यहीं पर   

काश अब बदले कुछ भी 
इसके आगे
भले हो कोई रास्ता या मंजिल 
कोई पीछे  आगे 
पिघल के बह जाएँ भले 
दोस्ती दुश्मनी प्यार नफरत 
नहीं अब किसी की ज़रुरत 

नफरत से डर लगता है
प्यार से मन घबराता है
दुश्मनी के अंजाम बुरे होते हैं
दोस्ती भी तो कुछ मांगती है
अब इन सबका कोई डर नहीं
डर अगर है तो बस इतना
कि कल ये खुशनुमा ख़याल
निकले  महज़ एक सपना

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मेरी बात मानो

पता है मुझको 
तुम्हारी पर्त दर पर्त 
परेशानियों का
ग़मों के उस मोटे लम्बे लबादे का
जिसमें तुम ढकी हो
पूरी तरह
मुझे ख़बर है
कितनी गर्मी है वहां
उस लबादे के नीचे 
मेरी बात मानो 
मेरी परेशानियों की भी चादर मत ओढ़ो
मत बढ़ाओ बोझ अपने लबादे का 
मैं ख़ुद ही संभाल लूँगा 
इस झीनी सी चादर को
अपनी ज़िन्दगी की गर्मी को
मैं ठीक हूँ मेरे 'दोस्त'
जब तक है मेरे ऊपर
तुम्हारी दोस्ती की चादर

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...