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शनिवार, 6 मई 2017

ये दिल ये पागल दिल मेरा

ये दिल मेरा 
सीने में मेरे 
ज़रा इस तरफ 
हाँ यहीं बीच में 
थोड़ा सा इधर 
हाँ बांयें, थोड़ा और 
बस यहीं 
ये दिल मेरा
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया 
टूट फूट गया
पहले तो ये ला दो 
वो दिला दो 
ये वाला नहीं वो वाला चाहिए 
लाल नहीं पीला 
हरा नहीं नीला 
न ही कभी चैन से बैठा 
न मुझे ही आराम करने दिया  
पर अब 
अब कुछ कहता ही नहीं 
कहीं रूठ तो नहीं गया
हे भगवान  
टूटा फूटा और अब रूठा
ये दिल है या किसीकी दिलरुबा 
जब देखो नखरे 
अरे दिल मेरा है 
और मुझी से नाराज़ रहता है 
सीने में जगह हथिया ली है
और सारा कारोबार समेट लिया 
अब मैं अपने दिमाग़ को लेकर कहाँ जाऊं 
इसकी तो कोई क़द्र ही नहीं करता 
कोई नहीं पूछता 
सब कहते हैं दिल का अच्छा है
वरना बेवकूफ है
हद्द हो गयी जनाब
न सोचा न समझा
और सर पे बेवकूफ का ताज रख दिया 
आपकी इसी बात ने तो दिल तोड़ दिया 
जी यही ... 
दोस्त, ये दिल मेरा 
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया है 
टूट फूट गया है ...  





बुधवार, 29 जुलाई 2015

चलो एक बार फिर से...

चलो एक बार फिर से हमसफ़र बन जाएँ हम दोनों

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ अजनबीपन की
न तुम मेरी तरफ देखो, देखा हो जैसे ग़ैरों को
न मेरे पैर डगमगाएं साथ चलने में
न आँखें झुक जाएँ तुम्हारी, राह में मिल के
चलो एक बार फिर से...

तुमको नहीं उलझन अपनी ख़ाली ज़िन्दगी से
न कोई परेशानी मुझे अपने पत्थर दिल से
पर चले थे साथ तो शायद कुछ और भी चल लेते
अपने बीच उन बुझे दियों को रोशन कर देते
चलो एक बार फिर से...

ख़तम होने लगे रिश्ता तो उसको रोकना बेहतर
ज़िन्दगी बोझ बन जाये तो उसको बांटना अच्छा
ग़ज़ल जो बीच में ही रह गयी थी आधी अधूरी सी
उसे एक खूबसूरत शेर दे कर छोड़ना अच्छा
चलो एक बार फिर से...



रविवार, 26 जुलाई 2015

एक खुशनुमा ख़याल

मिल गया शायद 
वो कोना ज़िन्दगी का 
जहाँ कुछ सुकूं है 
थोडा आराम है, राहत है
उनके गर्म ख़यालों से,
मेरी गर्म ख़याली से 
उन लफ़्ज़ों के तानों से 
इस दिल के बानों से 
नयी चोटों  के दर्द से
पुराने दर्द उभर आने से

पर एका-एक मेरे मन ने
बना लिया एक घेरा सा 
ऊंची ऊंची दीवारों का
और कर दीं हैं बाहर इसके 
मुश्किलें और तकलीफें
महफूज़ लगता है अब इनके अन्दर 
लगता है बसबस जाऊं यहीं पर   

काश अब बदले कुछ भी 
इसके आगे
भले हो कोई रास्ता या मंजिल 
कोई पीछे  आगे 
पिघल के बह जाएँ भले 
दोस्ती दुश्मनी प्यार नफरत 
नहीं अब किसी की ज़रुरत 

नफरत से डर लगता है
प्यार से मन घबराता है
दुश्मनी के अंजाम बुरे होते हैं
दोस्ती भी तो कुछ मांगती है
अब इन सबका कोई डर नहीं
डर अगर है तो बस इतना
कि कल ये खुशनुमा ख़याल
निकले  महज़ एक सपना

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...