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बुधवार, 29 जुलाई 2015

चलो एक बार फिर से...

चलो एक बार फिर से हमसफ़र बन जाएँ हम दोनों

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ अजनबीपन की
न तुम मेरी तरफ देखो, देखा हो जैसे ग़ैरों को
न मेरे पैर डगमगाएं साथ चलने में
न आँखें झुक जाएँ तुम्हारी, राह में मिल के
चलो एक बार फिर से...

तुमको नहीं उलझन अपनी ख़ाली ज़िन्दगी से
न कोई परेशानी मुझे अपने पत्थर दिल से
पर चले थे साथ तो शायद कुछ और भी चल लेते
अपने बीच उन बुझे दियों को रोशन कर देते
चलो एक बार फिर से...

ख़तम होने लगे रिश्ता तो उसको रोकना बेहतर
ज़िन्दगी बोझ बन जाये तो उसको बांटना अच्छा
ग़ज़ल जो बीच में ही रह गयी थी आधी अधूरी सी
उसे एक खूबसूरत शेर दे कर छोड़ना अच्छा
चलो एक बार फिर से...



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...