चलो एक बार फिर से हमसफ़र बन जाएँ हम दोनों
न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ अजनबीपन की
न तुम मेरी तरफ देखो, देखा हो जैसे ग़ैरों को
न मेरे पैर डगमगाएं साथ चलने में
न आँखें झुक जाएँ तुम्हारी, राह में मिल के
चलो एक बार फिर से...
तुमको नहीं उलझन अपनी ख़ाली ज़िन्दगी से
न कोई परेशानी मुझे अपने पत्थर दिल से
पर चले थे साथ तो शायद कुछ और भी चल लेते
अपने बीच उन बुझे दियों को रोशन कर देते
चलो एक बार फिर से...
ख़तम होने लगे रिश्ता तो उसको रोकना बेहतर
ज़िन्दगी बोझ बन जाये तो उसको बांटना अच्छा
ग़ज़ल जो बीच में ही रह गयी थी आधी अधूरी सी
उसे एक खूबसूरत शेर दे कर छोड़ना अच्छा
चलो एक बार फिर से...
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बुधवार, 29 जुलाई 2015
मंगलवार, 14 जुलाई 2015
शर्त दोस्ती की
आजकल मन ज़रा बोझिल सा है
देख कर दुनिया को
अपने घर को
दर-ओ-दीवार को
दीवार की बदरंगी को
बदरंगी दीवार की दरारों को
दोस्तों के मिज़ाज को
अपनों के तेवर को
अब फैसला हो ही जाना चाहिए
देर से नुकसान बढ़ सकता है
बर्दाश्त की हद्द से गुज़र सकता है
असली मुद्दा है 'क्यों'
आख़िर क्यों बर्दाश्त करे कोई
अगर तुमको अपनी बातों में मायेने नज़र आते हैं
और मेरा हर लफ्ज़ मज़ाक
तो हम दोस्त नहीं दुश्मन हैं
अगर तुम्हें लगता है कि तुम जेल में हो
तो मैं भी यहाँ मर रहा हूँ घुट घुट कर
जिस तरह तुम्हें फ़ख्र है अपनी अक़्ल पर
वैसे ही मुझे भी घमंड है अपनी सोच पर
मैं अपनी बेईज्ज़ती बर्दाश्त कर लूं
पर अपने ख़्यालों के बारे में कुछ नहीं सुनूंगा
बिलकुल तुम्हारी तरह
मेरे ख़्याल मुझे भी प्यारे हैं
दुनिया में सबसे न्यारे हैं
ख़ूबसूरत हैं
अक़्ल से भरे पूरे हैं
इनमें कोई कमी नहीं
किसी को हक़ नहीं इनको ग़लत कहने का
इनकी बेईज्ज़ती करने का
ये मेरे दिमाग़ की उपज हैं
ये पाक हैं
ये मेरे भगवान हैं
शायद हमारी दोस्ती की सबसे ज़रूरी शर्त होगी
इज्ज़त मेरे विचारों की
मेरे ख़्यालों की
तुम मुझे कुछ भी कह लो
मेरी शक्ल का
मेरे कपड़ों का मज़ाक उड़ा लो
पर अगर तुमने कहा
कि मैंने जो कहा, वो ग़लत गलत था
तो 'दोस्त' वक़्त बर्बाद मत करो
मैं इस तरफ मुड़ता हूँ
तुम उस तरफ मुड़ लो
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