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शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

... याद नहीं

यादों के नासूर थे, या ज़ख्म--जुदाई, याद  नहीं,
बस एक हल्का सा दर्द रह गया है, वजह याद नहीं

जब हम साथ थे, तो थी सारे जहाँ से दोस्ती,
तुम्हारे बाद कितनों ने निगाहें फेर लीं, याद नहीं 

निगाहें तो मिल ही जाती हैं, किसी न किसी से
पर किसी नज़र ने मुझसे कुछ कहा हो, याद नहीं

कहना, सुनना, कुछ  कहना या अनसुना करना
लफ्ज़ सिर्फ आवाज़ें रह गए हैं, मक़सद याद नहीं

अब भी बहुत से लोग करते हैं बहुत सी बातें मुझसे
दिल तक किसीकी बात पहुंची हो, याद नहीं

मैं डूबा रहा तुम्हारी बातों में, निगाहों में 'दोस्त'
कितनी गहराई थी अपनी दोस्ती में, ये भी याद नहीं 




मंगलवार, 14 जुलाई 2015

शर्त दोस्ती की

आजकल मन ज़रा बोझिल सा है 
देख कर दुनिया को
ख़ुद कोख़ुद की शकल को 
अपने घर को 
दर--दीवार को 
दीवार की बदरंगी को 
बदरंगी दीवार की दरारों को 
दोस्तों के मिज़ाज को 
अपनों के तेवर को 

अब फैसला हो ही जाना चाहिए 
देर से नुकसान बढ़ सकता है 
बर्दाश्त की हद्द से गुज़र सकता है 
असली मुद्दा है 'क्यों'  
आख़िर क्यों बर्दाश्त करे कोई 
अगर तुमको अपनी बातों में मायेने नज़र आते हैं 
और मेरा हर लफ्ज़ मज़ाक 
तो हम दोस्त नहीं दुश्मन हैं
अगर तुम्हें लगता है कि तुम जेल में हो
तो मैं भी यहाँ मर रहा हूँ घुट घुट कर  
जिस तरह तुम्हें फ़ख्र है अपनी अक़्ल पर
वैसे ही मुझे भी घमंड है अपनी सोच पर
मैं अपनी बेईज्ज़ती बर्दाश्त कर लूं
पर अपने ख़्यालों के बारे में कुछ नहीं सुनूंगा
बिलकुल तुम्हारी तरह
मेरे ख़्याल मुझे भी प्यारे हैं 
दुनिया में सबसे न्यारे हैं 
ख़ूबसूरत हैं 
अक़्ल से भरे पूरे हैं 
इनमें कोई कमी नहीं 
किसी को हक़ नहीं इनको ग़लत कहने का 
इनकी बेईज्ज़ती करने का 
ये मेरे दिमाग़ की उपज हैं 
ये पाक हैं 
ये मेरे भगवान हैं 

शायद हमारी दोस्ती की सबसे ज़रूरी शर्त होगी 
इज्ज़त मेरे विचारों की 
मेरे ख़्यालों की 
तुम मुझे कुछ भी कह लो 
मेरी शक्ल का  
मेरे कपड़ों का मज़ाक उड़ा लो 
पर अगर तुमने कहा
कि मैंने जो कहा, वो ग़लत गलत था 
तो 'दोस्तवक़्त बर्बाद मत करो 
मैं इस तरफ मुड़ता हूँ
तुम उस तरफ मुड़ लो

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...