रविवार, 7 अप्रैल 2024

सच सिर्फ सच

मैं घर पर ही था। शायद सोया था, शायद नहीं। पर सोफे पर जो सबसे अधिक आरामदायक मुद्रा हो सकती है, उसमें था। अगर आँखें खुली हैं तो अधिकतर संयोग है कि मैं सोया नहीं हूँ। अगर बंद हैं तो सोया ही हूं, ऐसा भी पक्का नहीं है। हो सकता है मैं कुछ सोच रहा हूं, किसी बात या घटना की याद कर रहा हूं या सिर्फ़ आराम कर रहा हूं; इनमें से किसी एक की सम्भावना हो सकती है। आपने शायद अनुभव किया हो कि कई बार लोगों से बात करते-करते ऊँघ सी आने लगती है। बातें सुनी-अनसुनी लगने लगती हैं। ख़ास तौर पर बोरिंग लोगों के वही सुने-सुनाए समाचार, वही जानी-पहचानी खुशियां, परेशानियां।
दोपहर के इस वातावरण में सुबह की सुरीली चिड़ियाँ नहीं चहकतीं, कोई इक्का दुक्का कोयल सुनाई दे जाये, तो दे जाये। अधिकतर कौव्वों की ध्वनि ही सराउंड चॅनेल में तैर रही थी। यातायात भी लगभग कुछ नहीं के बराबर था। नगण्य। कदाचित 
इसे ही मनहूसियत कहते होंगे।
विचारों की इस उठा-पटक में मैंने कुछ बेहद अजीब और अलग तरह की आवाज़ सुनी। उस जैसी आवाज़ का घर के सामने वाली सड़क पर सुनाई पड़ना लगभग असम्भव था। पर ये आवाज़ तो घोड़े की टाप जैसी नहीं थी। टेलेविजन की साउंड डिज़ाइन में मैंने घोड़े के टापों के साथ काफी काम किया है। वो तो बिलकुल क्रिस्प होती है, क्लिप-क्लॉप जैसी। क्या बला है ये ? फिर लगा टापों की ध्वनि में कुछ घुंघरू जैसी आवाज़ें भी मिली हुई थीं। अब तो लगा कि ये घोड़ा मुझे खिड़की तक खींच कर ही मानेगा। मैंने ज़रा सा पर्दा हटा कर नीचे झांका।
देखा ना। मुझे पता था कि ये आवाज़ घोड़े की नहीं हो सकती थी। उस जानवर ने ज़ोर से अपना चेहरा दाएं-बाएं हिलाया। अब पता चला घुंघरुओं में पत्थरों की ध्वनि भी मिली हुई थी। अगर मैं इतनी नींद में ना होता तो मुझे ज़बरदस्त झटका लगा होता। नीचे,गेट के ठीक बाहर एक विशालकाय भैंसा खड़ा था। उसके गले में विभिन्न तरह की रंग-बिरंगी मालाएं थीं। बहुत सारी घंटियां भी थीं। माथे पर बड़ा सा लाल टीका था। सबसे बड़ा अचम्भा तो तब हुआ जब मैंने एक बेहद काले आदमी को उसकी पीठ पर सवारी करते देखा। नहीं मैं कोई फिल्म नहीं देख रहा था, निश्चित, निश्चित।
मैंने बैल और गाय ले कर पैसे मांगने वाले लोग कई बार देखे हैं। पर ये आदमी तो भैंसे पर चढ़ा हुआ था। सब कुछ इतना चकित करने वाला था कि मेरा सामान्य ज्ञान इसे समझने में विफल हो गया। वो बेहद काले सज्जन भी अपने भैंसे की तरह ही सज्जित थे, कदाचित उससे अधिक। ख़ैर वो आहिस्ता से सरक कर अपनी सवारी से नीचे उतर गए। भैंसा फिर हिनहिनाया। उन सज्जन ने भैंसे की गर्दन को सहलाया और ऊपर की ओर देखा। मेरा पर्दा दो उंगली बराबर ही खुला होगा। पर उनकी ऊपर देखती नज़र को भांप कर मेरी सांस अटक गयी। मैंने पर्दा छोड़ दिया। कौव्वों की कैं-कें बढ़ गयी थी। शायद वो भैंसे से परेशान हो रहे थे। या शायद घंटियों और मालाओं की ध्वनि से। कुछ क्षणों के बाद मुझे लगा कि कोई भारी भरकम इंसान सीढ़ियों पर चढ़ रहा है। वो नंगे पैर है पर उसका भार हर सीढ़ी पर सुनाई पड़ता है। उसके गले की मालाएं भी बहुत शोर कर रही थीं।

दरवाज़े पर एक बेहद भारी हाथ ने दस्तक दी। केवल एक दस्तक।

अगर मैं आलस और नींद में इस तरह सराबोर नहीं होता तो उस दस्तक की कर्कश ध्वनि से कूद के खड़ा हो जाता। पर इस समय समझ नहीं आया कि क्या किया जाए । दस्तक हुई है, तो आगंतुक के लिए दरवाज़ा खोलना तो बनता ही है। भारत में अतिथि-सत्कार का बड़ा महत्व है। राम-लल्ला का नाम लेते हुए मैंने दरवाज़े को छुआ। सोच-विचार में दो-तीन क्षण और बीत गए। इतने में एक दस्तक और हो गई। धम्म। इस बार मैं हिल गया। क्योंकि मैं दरवाज़े के करीब था।
संभलते हुए मैंने दरवाज़ा खोल दिया। वो अँधेरे सज्जन पूरी तरह दृश्यमान हुए। उनका आकर देखने के लिए मुझे अपनी गर्दन को पूरी तरह नीचे से ऊपर लेना पड़ा। मैंने आदर पूर्वक नमस्कार किया। वो अपनी घनी काली मूछों के पीछे से मुस्कराये। मैं सामने से हट गया जिससे वो अंदर प्रवेश कर सकें। मैंने हाथ से इशारा किया और वो सोफे पर विराजमान हो गए। मैंने कहा 'जल लेकर आता हूं' । 'हं, धन्यवाद'। मैं जल्दी से कांच के गिलास में पानी लेकर आया। उन्होंने गिलास के आर-पार पानी को कौतूहल से देखा और दो घूँट में पूरा पी गए। मैंने पूछा 'और', उन्होंने भंवें सिकोड़ते हुए 'नहीं' सर हिला दिया। मैं गिलास को वापस रखने रसोई में गया तो वो जल्दी में खड़े हो गए थे। इससे पहले मैं उनके पधारने का प्रयोजन पूछूं, एक अजीब घटना हुई। घर को एक झटका सा लगा। भूकम्प जैसा। इससे पहले मैं कुछ सोचता एक के बाद एक कई झटके आ गए। घर के पंखे हिल रहे थे। फ्रिज भी एक तरफ को सरक गया था। ये काफी शक्तिशाली भूकंप था। डर से मैं दीवार को पकड़ कर खड़ा हो गया। मेरे मेहमान भी खड़े थे। उनकी भृकुटि तन गयी थी, और सिकुड़ भी गयी थी। वो अपनी बाहों को दोनों ओर फैला कर सुरक्षा की तलाश में थे। कुछ क्षणों में कड़ाके की आवाज़ के साथ छत में एक लम्बी दरार पड़ गयी। वहां रहने वाले पड़ोसियों की चीत्कारें सुनाई देने लगीं। कैसा भूचाल था ये? रुक ही नहीं रहा था। दीवारों का प्लास्टर भी उखड़ कर गिरने लगा। जल्दी ही छत और दीवारों के अनगिनत टुकड़े लगातार गिरने लगे।

अब एकाएक; वो अँधेरे सज्जन क्रियान्वित हुए। शांति से पहले उन्होंने पर्दा हटा कर नीचे अपनी सवारी को देखा। फिर मेरा हाथ पकड़ के मुझे खिड़की की तरफ़ ले गए। इसके बाद उन्होंने पूरी खिड़की को ही अपने स्थान से हटा दिया। वैसे ही जैसे मैंने पर्दा हटाया था। अगले क्षण मैं बाहर हवा में निकल चुका था। इससे पहले हम नीचे गिरते, उनकी सवारी ऊपर आ चुकी थी। भैंसे जी ये सब देख कर बिल्कुल प्रसन्न नहीं थे। हम दोनों उनकी विशाल पीठ पर विराज गए। कुछ समय तक हम तीनों उस भवन की विनाश-लीला देखते रहे। मेरे पडोसी चीख़ रहे थे। आने-जाने वाले सहायता में जुट रहे थे।

धीरे-धीरे भैंसे जी हम दोनों के साथ ऊपर उठने लगे। शोर कम होता गया। त्रासदी का असर भी कम हो रहा था। हवा थोड़ी ठंडी हो गयी। अब मेरे उस मेहमान ने अपनी जेब से एक बेशकीमती हीरे-मोती जड़े सुनहरे कपड़े का एक लम्बा सा सूची-पत्र बाहर निकाला। उसे ध्यान से परखा और उसके आरम्भ का एक भाग फाड़ कर फ़ेंक दिया। परन्तु वो टुकड़ा हवा में हमारे साथ ही तैरता, चलता रहा। अब उन्होंने आँखें बंद करके ध्यान लगाया और साथ-साथ कोई मन्त्र बुदबुदाया। इसके बाद उस कपड़े में आग लग गयी और कुछ क्षणों में वो राख बन कर बिखर गया।




2 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रहस्यमय सजीव चित्रण, सत्यम शिवम सुंदरम। एक जीवन की सच्चाई।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद ब्रजेश। तुम्हारे विचारों से इस पोस्ट को अधिक बल मिलेगा।

      हटाएं

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...