शुक्रवार, 29 मार्च 2024

चलते चलते

चलते चलते 
एकाएक उसे लगा कि
उसकी दायीं हथेली पर
एक हल्कापन सा आ गया 
कुछ तो था जो कम हो गया
एक दबाव जो ग़ायब हो गया
उसने ध्यान नहीं दिया 
छोटी सी बात है, होगा कुछ 
पर उसका हाथ अब अधिक स्वच्छंद था 
वो आसानी से आगे पीछे हिल रहा था 
ये बात निश्चित रूप से ध्यान देने लायक थी 
हथेली में एक गर्मी सी रहा करती थी 
वो कम हो रही है 
अब वहां हवा लग रही थी 
और फिर ठंडक का एहसास होने लगा
कदाचित दो हथेलियों के बीच
पसीने की एक पर्त बन गयी होगी 
उसे याद आया
यदि द्रव का वाष्पीकरण हो तो 
तापमान कम होने लगता है 
इस कारण ठंडक पैदा हो रही थी 

माना कि हाथ छूट गया 
माना कि साथ छूट गया 
पर अब साथ है स्वच्छंदता 
और ठंडक की अनुभूति



भोजन का समय

अपनी ही धुन में अकेले अकेले
बिना किसी सोच के विचार के
वो निकल पड़ा था अकेला ही
साथ के नाम पर बस थी
एक मुस्कान हल्की सी
पथ में मिलती धूप-छाँव
छोटे गांव कुछ बेहद छोटे गांव
हल-बैल मज़दूर-किसान
बुवाई और सिंचाई एक ओर
बच्चों का शोर दूसरी ओर

दूर से माँ की पुकार गुहार
लल्ला बाबूजी आएंगे अबकी बार
रामू, लल्ली, घनस्याम, बनवारी, राधा
हर बच्चा अपनी झोंपड़ी  की तरफ भागा
धुंए का एक बादल हर छप्पर पर बैठा था 
भोजन का समय हो चुका था
रोटी दाल और चावल की सुगंध से वातावरण भर गया था 
उधर सूरज लगातार पश्चिम की ओर झुक रहा था 
और पेड़ों की फुनगियों से नीचे सरकने लगा था
चिड़ियों के झुण्ड किरणों का ये इशारा समझ गए थे 
सब अपने-अपने घोसलों में लौट रहे थे 
उनके बच्चों की चीख़ें उनके माँ-बाप समझ गए थे 
भोजन का समय जो हो गया था
नन्हें भूखे बच्चों की खुली चोंचों को इंतज़ार था 
माँ बाप की चोंचों में तड़पते स्वादिष्ट कीड़े-मकोड़ों का 

















गुरुवार, 14 मार्च 2024

उसकी ट्रेन

वो प्लेटफॉर्म पर खड़ा था
साधारणतया जैसी या जितनी भीड़ होती है वैसी ही थी
भीड़ कम थी, या ज़्यादा थी
ये निर्भर करता है कि इसे कौन जांच रहा है
और वो कहाँ से आया है
 
वातावरण में ठक-ठक की आवाज़ हो रही थी
जो बूट-पॉलिश वाले खाली बैठे थे 
वो अपने-अपने डिब्बों को ठोक रहे थे
अब पॉलिश के ग्राहक काफी कम हो गए हैं
उसे पता था कि इसके अपराधी स्पोर्ट्स टाइप के जूते हैं
जिन्हें पॉलिश नहीं किया जाता...

चर्चगेट की ट्रेन आयी
उसके रुकने के काफी पहले ही हुजूम आगे बढ़ा
झिझकता हुआ वो भी बढ़ा
पर थोड़ा पीछे रहा
ट्रेन रुकी, पहले लटके हुए लोग 
लम्बी कूद लगा कर कूद पड़े
उनमे से कई, नीचे खड़े लोगों से टकरा गए 
अब अंदर दबे हुए लोग लावा की तरह बाहर उगले जा रहे थे
जैसे उन्हें अपने पर नियंत्रण ही नहीं था
प्लेटफॉर्म के लोग ट्रेन के अंदर जाने के लिए ऐसे लालायित थे
जैसे एक बंधा हुए भूखा कुत्ता सामने पड़ी हड्डी को देख रहा हो
उतरती भीड़ ने बहुत ज़ोर का शोर मचाया
युद्ध के आरम्भ की गर्जना जैसा 
जिसका मतलब था कि दूर रहो
हमारे उतरने में बाधा नहीं डालना ...

बिना कपड़े फटे या जेब कतरों के शिकार हुए,
ट्रेन से उतर जाने और चढ़ने को दिन की उपलब्धि कहा जा सकता है...
उसने सोचा चलो अगली बार सही
वो वापस उसी जगह पर खड़ा हो गया
जहां था 
उसके जैसे असफ़ल लोग
इंडिकेटर पर अगली ट्रेन का समय देखने लगे
ट्रेन ६ मिनट के बाद आने वाली थी
६ मिनट गुज़रने में समय ही कितना लगता है
दो या तीन मिनट, बस, इससे ज़्यादा नहीं
उसने सोचा   

बगल के प्लेटफॉर्म पर दूसरी तरफ जाने वाली ट्रेनें आ-जा रही थीं
यात्री भी एक तरह से उदासीन लग रहे थे
जैसे उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी...

अगली ट्रेन आई 
भीड़ फिर उसी तरह आगे बढ़ी
इस बार वो भीड़ का हिस्सा बिल्कुल नहीं बना
थोड़ा पीछे रहा
'ख़बरदार रहना' का शोर फिर से हुआ
पर उसने अनसुना कर दिया
इस बार  
ट्रेन के रुकने से पहले ही उसने एक डिब्बे के बायीं ओर
एक छोटा सा गैप देख लिया था
सही समय पर
अर्जुन जैसी एकाग्रता के साथ वो आगे बढ़ा
और जैसे कहते हैं ना, 'लाइक ए फ्लैश'
उस ज़रा सी खुली जगह में विलीन हो गया
ट्रेन चल पड़ी
वो भी और लोगों की तरह पहुंच ही जायेगा

तेज़ भागती ट्रेन के शोर में
अनजान लोगों के बीच दबे हुए हुए
उसे लगा कि
उसके मोबाइल पर एक मेसेज आया है
चलो शायद कोई तो सोच रहा है
उसके बारे में



डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...