शुक्रवार, 29 मार्च 2024

भोजन का समय

अपनी ही धुन में अकेले अकेले
बिना किसी सोच के विचार के
वो निकल पड़ा था अकेला ही
साथ के नाम पर बस थी
एक मुस्कान हल्की सी
पथ में मिलती धूप-छाँव
छोटे गांव कुछ बेहद छोटे गांव
हल-बैल मज़दूर-किसान
बुवाई और सिंचाई एक ओर
बच्चों का शोर दूसरी ओर

दूर से माँ की पुकार गुहार
लल्ला बाबूजी आएंगे अबकी बार
रामू, लल्ली, घनस्याम, बनवारी, राधा
हर बच्चा अपनी झोंपड़ी  की तरफ भागा
धुंए का एक बादल हर छप्पर पर बैठा था 
भोजन का समय हो चुका था
रोटी दाल और चावल की सुगंध से वातावरण भर गया था 
उधर सूरज लगातार पश्चिम की ओर झुक रहा था 
और पेड़ों की फुनगियों से नीचे सरकने लगा था
चिड़ियों के झुण्ड किरणों का ये इशारा समझ गए थे 
सब अपने-अपने घोसलों में लौट रहे थे 
उनके बच्चों की चीख़ें उनके माँ-बाप समझ गए थे 
भोजन का समय जो हो गया था
नन्हें भूखे बच्चों की खुली चोंचों को इंतज़ार था 
माँ बाप की चोंचों में तड़पते स्वादिष्ट कीड़े-मकोड़ों का 

















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