पहले हर दर्द से डर लगता था
अब लगता है ग़लत लगता था
अब तो दास्तान-ए-दर्द के दीवान पढ़े जाते हैं
तब बड़ी मुश्किल से एक पन्ना पलटता था
बहुत कुछ मिला उससे, मेरी ख़ुशनसीबी
ग़र वो ख़ुद मिलता तो मेरा नसीब खुलता था
सारी दुनिया में पर्त दर पर्त मैंने ढूँढा उसे
किसी पर्त में तो मिल जायेगा ऐसा लगता था
एहमियत ख़त्म हो गयी हर सुकून, हर दर्द की
पहले हर नफ़े नुक़सान का हिसाब रखता था
मिट गयीं सरहदें सुकून और दर्द की 'दोस्त'
पहले सुकून में भला, दर्द में बुरा लगता था