बुधवार, 21 दिसंबर 2016

अंधेरों के साये

हम हैं साये अंधेरों के
हमें आँखों से नहीं देख पाओगे
यहाँ या वहां हम नहीं मिलने वाले
हमें सिर्फ ख़यालों से ही ढूंढ पाओगे
ग़र आवाज़ देनी हो हमें
तो खुद को पुकार लो
कोई नया गीत गुनगुना लो
हमारा नाम ज़बान से ले पाओगे
हमारे कंधे पर तुम्हारा ये ख़याली हाथ
अब नहीं दे सकेगा ख़याली सहारा
साथ, मदद या आसरा
फ़र्क़ नहीं पड़ता अब
किसी बात से
पता नहीं कैसे
अब हमें कोई छू नहीं सकता
अजीब किल्लत है
जब कन्धा था तो हाथ नहीं थे
अब कई हाथ इसके मुंतज़िर हैं
ये कलाई थामने को बेकरार हैं
शायद फिर हो गया मैं
एक खुशफहमी का शिकार
पता नहीं क्या हुआ है
सब कुछ धुआं हो गया है
मैं यहाँ हूँ या नहीं
यहाँ नहीं तो...
तो फिर कहीं तो हूँगा
जहाँ कहीं भी हूँ
वहां कोई तो होगा
जो शायद मुझे देख सकता होगा
शायद मुझसे मुख़ातिब भी होगा 
अगर ऐसा होगा 'दोस्त'
तो वो भी अंधेरों का साया होगा

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...