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बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

कुछ नहीं, पर अँधेरा तो है

इतना अँधेरा !

कहाँ से आया इतना सारा अँधेरा

ये अँधेरा इतना घना क्यूँ है

सारी सड़कें गलियां बगीचे बाज़ार

पता नहीं मैं कहाँ हूँ

कोई आवाज़ भी नहीं है

अँधेरे में कोई आवाज़ क्यों नहीं सुनाई दे रही 

पता नहीं ये सब्ज़ी का बाजार है या मछली का

दूध का या मिठाइयों का या सोने चांदी का

ये अँधेरा सिर्फ बाहर की दुनिया में ही नहीं है

ये मेरे घर के आँगन में, सीढ़ियों पर, रसोई में

और शायद मेरे दिल में

मेरे रोम रोम में घर कर चुका है

शायद मेरा चेहरा भी काला हो गया होगा

मेरे हाथ, पैर, पेट, पीठ

सब कुछ अँधेरे रंग में रंग गए होंगे

शीशा भी कैसे देखूं

शीशा पता ही नहीं कहाँ है

कुछ भी नज़र नहीं आ रहा

अपनी हथेली तक नहीं 

क्या ये रात है?

पर कहाँ गया वो चाँद ?

वो चाँद, वो टिमटिमाते सितारे

मेरी रोशनी के सहारे

आज ठंड भी बहुत है

काश ऊपर कुछ गरम होता

कोई ऊनी कोट या कम्बल

या - सिर्फ तुम्हारे होने का एहसास

तुम्हारी नज़दीकी की गरमाहट

नरम हाथों की पकड़

उन खूबसूरत आँखों की रोशनी

आलिंगन की गरमी

ज़िन्दगी कितनी खाली सी हो चुकी है

कितनी नीरस, ठंडी

अब इस घने अँधेरे में मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूँ

और कैसे ढूँढूँ

किस तरफ जाऊं

इस दुनिया में कोई भी ना दिखाई दे

कोई बात नहीं

पर तुम न दिखोगी

तो ये ऑंखें किस काम की 

मुझे इनकी ज़रुरत ना होगी

तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में न हो

तो मेरी नब्ज़ किस काम की

तुम्हारा सर मेरे सीने पर न हो

तो ये धड़कन किस काम की



मेहमान दर्द

एक दिन एहसास हुआ मुझे
जैसे किसीने पुकारा हो मुझे 
देखा इधर उधर 
पर न आया कोई नज़र 
फिर किसीने हल्के से छू दिया मुझे 
बेहद घबरा के मैंने पूछा,

"कौन हो भाई दिखाई क्यों नहीं देते"

एक सकपकाई सी आवाज़ ने कहा,
"जी, मैं यहीं हूँ, आपके बिल्कुल नज़दीक"

बग़ैर देखे ही मैंने तीर चला दिया,
"ओह जनाब मैंने पहचाना नहीं 
हम पहले मिले हैं क्या?"

"जी अभी तक तो नहीं"

"नहीं? तो, फरमाएं, कौन हैं आप"

"जी मैं... मैं एक दर्द हूँ"

"दर्द ! आपको मुझसे क्या सरोकार है"

"जी... रहने को जगह मिलेगी कुछ दिनों के लिए"

"क्या? रहने को जगह?
नहीं भाई मुश्किल है मेरे लिए आपको जगह देना 
देखो न मेरे सारे खाने आराम से भरे हैं 
अब आराम से आराम करते हुए आराम को निकाल कर
दर्द को जगह देना बेवक़ूफ़ी होगी ना   
मेरी कितनी बदनामी होगी कुछ ख़बर है आपको"

"अरे जनाब इतने बड़े जिस्म में कोई तो ऐसा खाना होगा 
जहाँ आराम इतना ज़्यादा हो कि मेरा पता ही न चले"
"हैं ! क्या ऐसी भी कोई जगह हो सकती है? पर... आप कौन से दर्द हैं 
मसलन, सर के पेट के या..."
"नहीं नहीं ऐसा नहीं है हम तो जहाँ चले जाएँ वहीं का नाम ले लेते हैं 
जैसे सर दर्द, पीठ दर्द, पेट दर्द वगैरह"
"हम्म..."
"जी ज़रूरत पड़े तो हम हाथ की किसी उंगली में भी रह लेंगे 
पर अगर दो में से एक घुटना मिल जाता तो  क्या बात थी

"ये तो आप ज़्यादती कर रहे हैं 
आराम की भी अपनी ज़िन्दगी है"

"अरे बहुत कर लिया आराम 
अब हमारे जैसे बेसहारों को भी जगह मिलनी चाहिए 
और कितनी रंग बिरंगी विटामिन की गोलियां निगलेंगे
अपने अंदर का माहौल तो एक दिन बर्बाद होना ही है  
फिर उस बर्बादी के पैसे भी देने होंगे
मियां अब वक़्त जाता रहा आराम का
अब ज़माना है परेशानी का
नई नई तरह तरह की अजीबो ग़रीब परेशानियों का
इनसे आदमी का दिमाग़ ज़्यादा चलने लगता है 
अरे जब किसी मुसीबत को टालना हो तो नए तरीक़े ईज़ाद करने पड़ते हैं 
है कि नहीं?
तो जनाब अगर आप हमें रहने की जगह दे दें
तो आप अब से कहीं ज़्यादा अक़्लमंद हो जायेंगे 
ये वादा है"

"आपकी ज़िरह का भी जवाब नहीं 
ठीक है, तो आइये
जहाँ जगह मिले रह जाइये  
और हाँ, आराम से ज़रा तमीज़ से बात कीजियेगा" 

इसके बाद तो जनाब कलाई से लेकर सर तक 
कंधे से एड़ी तक 
पेट, पीठ, कमर हर जगह भर गयी दर्द से 
हकीम के माथे की शिकन बढ़ गयी
दवाओं का असर कम होने लगा 
धीरे धीरे दवाएं भी कम होने लगीं
फिर बंद हो गयीं
हकीम के हाथ दुआ पर आकर ठहर गए 
कहा; अब कोई इलाज नहीं 
लुत्फ़ लीजिये इनका 
दर्द ही तो है कोई मौत तो नहीं है 

बात मुझे सही लगी 
उसके पीछे का जज़्बा भी सही लगा
भई अब दर्द बिचारे कहाँ जाते?
ये सोच के मैंने इन्हें अपना लिया 
अब ये सारे दर्द मेरे हैं 
मेरे अपने हैं 
ये मुझे ज़्यादा तकलीफ भी नहीं देते 
हो सकता है मुझे इनकी आदत पड़ गयी हो  
अब ये सब मेरे साथ ही रहेंगे 
मैं इनका साथ आखिऱ तक न छोड़ूंगा
अब हम बिछड़ेंगे तो शायद
उस बेहद गर्म माहौल में
जब मुझे ख़ुद से, इनसे और इन्हें मुझसे 
निजात मिल जाएगी

आखिऱ हम इस नतीजे पर पहुंचे 'दोस्त'
कि दर्द और परेशानियां तो हमेशा ही रहेंगी
पर आप उनके साथ दोस्त बन के रहेंगे
या उनकी दुश्मनी मोल लेंगे?


चंद्रशेखर आज़ाद कुटी, झाँसी; वो यहाँ १९२४ में अज्ञातवास में रहे। 

सोमवार, 11 मार्च 2019

शायद... तुम्हें पता हो

हुई मुद्दत
कि वक़्त थम गया
और छोड़ गया तुम्हारा अक्स
मेरे चेहरे के सामने
मेरी बंद आँखों में...

इस अक्स के पीछे का चेहरा
हँसता मुस्कराता बातें करता
सीधे मेरी आँखों में देखता...
अब दिखाई नहीं देता
वो आवाज़ अब सुनाई नहीं देती

हाँ पर...
अब भी कभी कभी
मेरी हथेली पर पसीने की
एक हलकी सी पर्त का एहसास होता है
'दोस्त' वो पसीना आज भी

दो हाथों का मालूम होता है

शायद...
तुम्हें पता हो






मंगलवार, 25 जुलाई 2017

कुछ भी

फिर, फिर क्या हुआ
फिर? फिर क्या होना था
क्या होना था? अरे मगर हुआ क्या
तू भी यार, अरे वही जो होना था,
मतलब?
मतलब कुछ खास नहीं
हे भगवान!
क्यों इतनी भक्ति में डूब गया?
अबे भक्ति छोड
तू अपने इस व्यक्तवय का अर्थ ज़रा समझायेगा मुझे
व्यक्तवय ? अरे दो शब्द व्यक्तवय हो जाते हैं क्या?
अबे उल्लू के पट्ठे मैंने पूछा था कि उस दिन क्या हुआ था
ये लो। अब ये कौन से दिन की बात है?
एक मिनट, 
एक मिनट, रुक ज़रा
ले रुक गया
तेरे घर में थोड़ी दारू है?
'दारू'? अबे पगला गया है? दोपहर के तीन बजे हैं। दारू!
इजाज़त हो तो आपकी तारीफ़ में कुछ कहना है
इरशाद, ज़रूर कहिये
ग़ौर फरमाएं, तेरे जैसे बन्दे से सर खपाना हो
तेरे जैसे बन्दे से ग़र सर खपाना हो
तो 'दोस्त' सुबह चार बजे भी पीनी पड़ सकती है... मुक़र्रर ? नहीं ?
अरे यार तू तो वाकई बड़ा परेशान लग रहा है आज
नहीं नहीं परेशानी कैसी, मैं तो बस ऐसे ही
आज कोई और मुद्दा नहीं है तेरे पास?
अच्छा सुन
चल सुना
तूने किसी जासूसी दफ्तर में नौकरी कर ली है क्या
क्यों, तुझे कैसे पता चला
तू किसी बात का सीधा जवाब ही नहीं दे रहा

कट, बस। बढ़िया हुआ। अगले हफ़्ते दोनों टाइम पर आ जाना ।





गुरुवार, 13 जुलाई 2017

मेरा ख़ज़ाना

धीरे धीरे ही सही
पर कुछ तो है, जो अब नहीं है
मतलब मेरे पास नहीं  है 
शायद चुरा रहा है ये ज़माना
मेरा ख़ज़ाना 
पहले तो ग़ुम हो जाती थीं सिर्फ चीज़ें
एक कमीज़, एक घड़ी, एक कोट
पूर्वजों की दी सोने की एक अंगूठी 
मेरी प्यारी आर्मी जैकेट 
किसीने कहा था उस जैकेट में
तुम बहुत अच्छे लगते हो 
मैंने कहा चलो अब जैकेट न सही 
जैकेट वाली फोटो तो है
उसी से गुज़ारा कर लो

बात उस तक पहुंची है तो
उन ख़तों तक भी जाएगी
उन लफ़्ज़ों को फिर से रोशन कर जाएगी
हाँ वो ही
उसके वो पुराने सहेज के रखे चंद ख़त
जो उसकी ज़ुल्फ़ों के अँधेरे की तरह
अब नहीं दिखाई देते 
उनकी खुशबू की तरह 
उनका वजूद अब एक एहसास से ज़्यादा कुछ नहीं 
और वो लम्बा सा 
घास का एक टुकड़ा
जो पहली और दूसरी कहानी के 
पन्नों के बीच
हमेशा ही दबा रहा 
वो भी शायद गिर गया कहीं
टुकड़ा वो घास का हो सकता है
पर उसका काम बेहद ज़रूरी था 
वो मेरी दोनो कहानियों को अलग रखता था
उस आख़िरी मुलाक़ात के दिन 
उसीने बग़ीचे से तोड़ के दिया
और क़िताब बंद कर दी थी 

अब ख़ैरियत इसी में है
कि चीज़ों को खोने का
रिश्तों के नर्म होने का 
यादों के धुंधले होने का 
उस कमीज, जैकेट और अंगूठी का 
बंद कर दूँ मातम मनाना
ख़ुशक़िस्मती से 'दोस्त' 
क्योंकि कोई चुरा नहीं पायेगा
मेरा ये अंदाज़ आशिकाना
और ख़याल शायराना



बुधवार, 10 मई 2017

क़ीमत

क़ीमत 
हर इंसान लगाता है क़ीमत 
हर एक चीज़ की
हर इंसान की 
इसकी, उसकी, घर की, गाड़ी की 
ज़मीन जायदाद की 
यहाँ तक दोस्तों की, मां बाप की
भाई बहनों की 
घर बार की, देश दुनिया की 
दूसरों के विचारों की 
उनकी समझ की, समझदारी की 

... अपनी भी
माफ़ करें 
शायद यहाँ कुछ अटपटा हो गया
उल्टा पल्टा हो गया 
जो पहले आना था वो बाद में आया
क़ीमत खुद की 
यानि एक ऐसी बेशक़ीमती चीज़ की
जिसका ख़ुद की नज़र में 
कोई मोल नहीं हो सकता
ख़ुद पर कोई दाम नहीं लिखा जा सकता 
कोई लिखता भी नहीं 
अगर किसीने लिखा भी, 
तो वो ग़लत होगा  
अपनी नज़र में ज़्यादातर लोग 
कुछ ज़्यादा ही क़ीमती होते हैं 
या यूँ कहिये बेशक़ीमती होते हैं
हालांकि उनके बारे में दूसरों का ख़याल 
कुछ दूसरा ही होता है
ठीक वैसे ही जैसे इनका औरों के बारे में... 
चलिए ये सब अंदर की बात है 
उसके हर किसीके के मन की बात है 
घर घर की बात है 
फिर भी इस दुनिया में 
ज़्यादातर लोग अपनी क़ीमत को 
अपने दिल ही में छुपाये 
अपने साथ लेकर चले जाते हैं 
दुनिया को पता ही नहीं चल पाता 
कि खुद की नज़र में वो 
कितने मंहगे या सस्ते थे

शनिवार, 6 मई 2017

ये दिल ये पागल दिल मेरा

ये दिल मेरा 
सीने में मेरे 
ज़रा इस तरफ 
हाँ यहीं बीच में 
थोड़ा सा इधर 
हाँ बांयें, थोड़ा और 
बस यहीं 
ये दिल मेरा
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया 
टूट फूट गया
पहले तो ये ला दो 
वो दिला दो 
ये वाला नहीं वो वाला चाहिए 
लाल नहीं पीला 
हरा नहीं नीला 
न ही कभी चैन से बैठा 
न मुझे ही आराम करने दिया  
पर अब 
अब कुछ कहता ही नहीं 
कहीं रूठ तो नहीं गया
हे भगवान  
टूटा फूटा और अब रूठा
ये दिल है या किसीकी दिलरुबा 
जब देखो नखरे 
अरे दिल मेरा है 
और मुझी से नाराज़ रहता है 
सीने में जगह हथिया ली है
और सारा कारोबार समेट लिया 
अब मैं अपने दिमाग़ को लेकर कहाँ जाऊं 
इसकी तो कोई क़द्र ही नहीं करता 
कोई नहीं पूछता 
सब कहते हैं दिल का अच्छा है
वरना बेवकूफ है
हद्द हो गयी जनाब
न सोचा न समझा
और सर पे बेवकूफ का ताज रख दिया 
आपकी इसी बात ने तो दिल तोड़ दिया 
जी यही ... 
दोस्त, ये दिल मेरा 
मेरे सीने के अंदर 
शायद ज़रा टूट गया है 
टूट फूट गया है ...  





बुधवार, 21 दिसंबर 2016

अंधेरों के साये

हम हैं साये अंधेरों के
हमें आँखों से नहीं देख पाओगे
यहाँ या वहां हम नहीं मिलने वाले
हमें सिर्फ ख़यालों से ही ढूंढ पाओगे
ग़र आवाज़ देनी हो हमें
तो खुद को पुकार लो
कोई नया गीत गुनगुना लो
हमारा नाम ज़बान से ले पाओगे
हमारे कंधे पर तुम्हारा ये ख़याली हाथ
अब नहीं दे सकेगा ख़याली सहारा
साथ, मदद या आसरा
फ़र्क़ नहीं पड़ता अब
किसी बात से
पता नहीं कैसे
अब हमें कोई छू नहीं सकता
अजीब किल्लत है
जब कन्धा था तो हाथ नहीं थे
अब कई हाथ इसके मुंतज़िर हैं
ये कलाई थामने को बेकरार हैं
शायद फिर हो गया मैं
एक खुशफहमी का शिकार
पता नहीं क्या हुआ है
सब कुछ धुआं हो गया है
मैं यहाँ हूँ या नहीं
यहाँ नहीं तो...
तो फिर कहीं तो हूँगा
जहाँ कहीं भी हूँ
वहां कोई तो होगा
जो शायद मुझे देख सकता होगा
शायद मुझसे मुख़ातिब भी होगा 
अगर ऐसा होगा 'दोस्त'
तो वो भी अंधेरों का साया होगा

शनिवार, 25 जुलाई 2015

वो कहां मैं कहां

सपनों की दुनिया में है उसका जहांऔर मैं हूँ यहां
खबर नहीं वो है कहां, कितनी दूर है मुझसेमैं हूँ जहां

उसके दोस्तों की महफ़िलवो खुश गवार लम्हे
मुझे मिला साथ इस तन्हाई कामैं हूँ जहां

वो खिलखिलाती शोख़ नज़रें  और हंसी के झरने
मुरझाए सपनों का गुलिस्तां है यहाँ, मैं हूँ जहां

दोस्तों का साथ, वो बाहों के हार, और दिल की बातें 
ढूंढता हूँ खुशियाँ अपने आगोश मेंमैं हूँ जहां

काश मेरे क़दम पहुँच पाते ज़ुल्फ़ के उस मोड़ तक
पर कहाँ वो ज़ुल्फ़, वो हसीन मोड़ और मैं हूँ कहां

काश कोई मोड जोड़ देता हमारी ज़िन्दगी को 'दोस्त'
पर नहीं थी किस्मत में तेरी रहगुज़रमैं हूँ जहां

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...