हुई मुद्दत
कि वक़्त थम गया
और छोड़ गया तुम्हारा अक्स
मेरे चेहरे के सामने
मेरी बंद आँखों में...
इस अक्स के पीछे का चेहरा
हँसता मुस्कराता बातें करता
सीधे मेरी आँखों में देखता...
अब दिखाई नहीं देता
वो आवाज़ अब सुनाई नहीं देती
हाँ पर...
अब भी कभी कभी
मेरी हथेली पर पसीने की
एक हलकी सी पर्त का एहसास होता है
'दोस्त' वो पसीना आज भी
दो हाथों का मालूम होता है
शायद...
तुम्हें पता हो
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सोमवार, 11 मार्च 2019
बुधवार, 10 मई 2017
क़ीमत
क़ीमत
हर इंसान लगाता है क़ीमत
हर एक चीज़ की
हर इंसान की
इसकी, उसकी, घर की, गाड़ी की
ज़मीन जायदाद की
यहाँ तक दोस्तों की, मां बाप की
भाई बहनों की
घर बार की, देश दुनिया की
दूसरों के विचारों की
उनकी समझ की, समझदारी की
... अपनी भी
माफ़ करें
शायद यहाँ कुछ अटपटा हो गया
उल्टा पल्टा हो गया
जो पहले आना था वो बाद में आया
क़ीमत खुद की
यानि एक ऐसी बेशक़ीमती चीज़ की
जिसका ख़ुद की नज़र में
कोई मोल नहीं हो सकता
ख़ुद पर कोई दाम नहीं लिखा जा सकता
कोई लिखता भी नहीं
अगर किसीने लिखा भी,
तो वो ग़लत होगा
अपनी नज़र में ज़्यादातर लोग
कुछ ज़्यादा ही क़ीमती होते हैं
या यूँ कहिये बेशक़ीमती होते हैं
हालांकि उनके बारे में दूसरों का ख़याल
कुछ दूसरा ही होता है
ठीक वैसे ही जैसे इनका औरों के बारे में...
चलिए ये सब अंदर की बात है
उसके हर किसीके के मन की बात है
घर घर की बात है
फिर भी इस दुनिया में
ज़्यादातर लोग अपनी क़ीमत को
अपने दिल ही में छुपाये
अपने साथ लेकर चले जाते हैं
दुनिया को पता ही नहीं चल पाता
कि खुद की नज़र में वो
कितने मंहगे या सस्ते थे
रविवार, 26 जुलाई 2015
एक खुशनुमा ख़याल
मिल गया शायद
वो कोना ज़िन्दगी का
जहाँ कुछ सुकूं है
थोडा आराम है, राहत है
उनके गर्म ख़यालों से,
मेरी गर्म ख़याली से
उन लफ़्ज़ों के तानों से
इस दिल के बानों से
नयी चोटों के दर्द से
पुराने दर्द उभर आने से
पर एका-एक मेरे मन ने
बना लिया एक घेरा सा
ऊंची ऊंची दीवारों का
और कर दीं हैं बाहर इसके
मुश्किलें और तकलीफें
महफूज़ लगता है अब इनके अन्दर
लगता है बस, बस जाऊं यहीं पर
काश अब न बदले कुछ भी
इसके आगे
भले न हो कोई रास्ता या मंजिल
न कोई पीछे न आगे
पिघल के बह जाएँ भले
दोस्ती दुश्मनी प्यार नफरत
नहीं अब किसी की ज़रुरत
नफरत से डर लगता है
प्यार से मन घबराता है
दुश्मनी के अंजाम बुरे होते हैं
दोस्ती भी तो कुछ मांगती है
अब इन सबका कोई डर नहीं
डर अगर है तो बस इतना
कि कल ये खुशनुमा ख़याल
निकले न महज़ एक सपनासोमवार, 20 जुलाई 2015
चंद फुटकर विचार
अगर मुझे लगा कि तुम मुझे भला समझते हो,
तो मैं भी तुम्हें भला ही समझूंगा।
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जब मैं अपने ही कर्मों के साथ होता हूँ
तब कोई समस्या नहीं होती
वो मेरे साथ कभी कपट नहीं करते
नतीजा हमेशा उचित ही होता है।
दूध का दूध पानी का पानी।
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हमारे चारों ओर अनगिनत विचार और वस्तुएं बिखरी हुई हैं।
हर विचार या वस्तु को हर व्यक्ति अपनी ही समझ से देखता है।
इस कारण उन सब विचारों और वस्तुओं के और भी कई गुने अधिक रूप बन जाते हैं।
हर मनुष्य का हर वस्तु के बारे में अपना अलग सत्य होता है।
ये सत्य भी मानव के उस एक क्षण के और एक मानसिक स्थिति के लिए ही होता है।
तो क्या संसार में सब कुछ सत्य ही है? असत्य कुछ भी नहीं?
कदाचित।
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तो मैं भी तुम्हें भला ही समझूंगा।
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जब मैं अपने ही कर्मों के साथ होता हूँ
तब कोई समस्या नहीं होती
वो मेरे साथ कभी कपट नहीं करते
नतीजा हमेशा उचित ही होता है।
दूध का दूध पानी का पानी।
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हर विचार या वस्तु को हर व्यक्ति अपनी ही समझ से देखता है।
इस कारण उन सब विचारों और वस्तुओं के और भी कई गुने अधिक रूप बन जाते हैं।
हर मनुष्य का हर वस्तु के बारे में अपना अलग सत्य होता है।
ये सत्य भी मानव के उस एक क्षण के और एक मानसिक स्थिति के लिए ही होता है।
तो क्या संसार में सब कुछ सत्य ही है? असत्य कुछ भी नहीं?
कदाचित।
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रविवार, 12 जुलाई 2015
मेरा अस्तित्व, मेरी छाया
दिन को धूप की तेज़ रोशनी है
सुबह, शाम एक नारंगी एहसास है
रात को चांदनी का ठंडा उजाला है
अगर कहीं ये सब नहीं है
तो वहां बिजली है
उसकी की चमक है
तेज़ उजाले में स्वयं को चमकता देख कर
मन गर्व से भर जाता है
विश्वास हो जाता है कि लोग मुझे ही देख रहे हैं
और ये भी कि
वो मुझे देख कर प्रसन्न हैं
ये बेबुनियाद जानकारी
मेरे अभिमान को बढ़ाती है
मेरे गर्व की छाया मेरे साथ चलती है
चलती रही है
कभी कभी मैं उसे मुड़ के देख लेता हूँ
बड़ा संतोष होता है
उसे पीछे पीछे आते देख कर
कैसे पिछलग्गू की तरह साथ रहती है
क्या जीवन है इस बेचारी का भी
पीछे पीछे रहना बस
न कोई मांग, न क्रोध, न कोई दुःख
सुना था पर जब देखा तो पता चला
ये रौशनी हमेशा रहने वाली नहीं थी
अँधेरा आया और बिना किसी प्रयत्न के
निगल गया रोशनी को
और मेरी छाया को
रौशनी ने मेरा साथ छोड़ा तो
छाया भी साथ नहीं रही
वो घुल गयी अँधेरे ही में
छाया के साथ ही मिट गया मेरा गर्व
मेरा अभिमान
मेरी पहचान
मेरा अस्तित्व भी
कदाचित
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