मिल गया शायद
वो कोना ज़िन्दगी का
जहाँ कुछ सुकूं है
थोडा आराम है, राहत है
उनके गर्म ख़यालों से,
मेरी गर्म ख़याली से
उन लफ़्ज़ों के तानों से
इस दिल के बानों से
नयी चोटों के दर्द से
पुराने दर्द उभर आने से
पर एका-एक मेरे मन ने
बना लिया एक घेरा सा
ऊंची ऊंची दीवारों का
और कर दीं हैं बाहर इसके
मुश्किलें और तकलीफें
महफूज़ लगता है अब इनके अन्दर
लगता है बस, बस जाऊं यहीं पर
काश अब न बदले कुछ भी
इसके आगे
भले न हो कोई रास्ता या मंजिल
न कोई पीछे न आगे
पिघल के बह जाएँ भले
दोस्ती दुश्मनी प्यार नफरत
नहीं अब किसी की ज़रुरत
नफरत से डर लगता है
प्यार से मन घबराता है
दुश्मनी के अंजाम बुरे होते हैं
दोस्ती भी तो कुछ मांगती है
अब इन सबका कोई डर नहीं
डर अगर है तो बस इतना
कि कल ये खुशनुमा ख़याल
निकले न महज़ एक सपना