memories लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
memories लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 29 अक्टूबर 2023

कुछ अनमोल पल

एहसास की रोशनी

एकाएक एक दिन

कर गयी रोशन 

इस दिल के कुछ ख़ाली अँधेरे खाने 

पुरानी बंद किताब के पन्ने 

काफी अजीब लगा 

बहुत सारी पुरानी चीज़ें,

चेहरे, लोग, बातचीत

एक नया शहर, नया घर, नया कमरा 

नई ज़िन्दगी, नई नौकरी, नई बेकारी

हाँ, नए परिवार में चंद पुराने दोस्तों ने माहौल बदल दिया 

हाथ मिलाना गले लगना शोर मचाना 

"अरे तुम भी ! यहाँ?  वाह मज़ा आ गया।"

इतना जाना पहचाना तहलका

जैसे बीच समुद्र एक हरा भरा द्वीप मिल गया हो 

मेहमान अभी कमरे के दरवाज़े पर ही था 

अंदर संदूक रखने का भी मौका नहीं मिला था 

शोर भी बंद नहीं हुआ था


उस परिवार के साधारण से लोग चारों ओर खड़े थे 

इस हंगामे के मज़े ले रहे थे 

भरा पूरा परिवार था 

बा थीं तीन बच्चे और मम्मी पापा 

कुछ मुस्करा रहे थे कुछ हंस रहे थे 

बा को ये सब पागलपन लग रहा था

एक लम्बी सी निक्कर पहने तुकाराम   

एक हाथ से अपनी हंसी छुपा रहा था 

इन सबसे अलग सफ़ेद फ्रॉक में एक बच्ची थी 

भावरहित चुप और शांत

उसका दांया कन्धा दीवार पर टिका था 

पर उसकी बड़ी-बड़ी गोल आँखें 

मेहमान पर टिकी थीं 

मेहमान ने एक सरसरी सी नज़र उस पर डाली 

और देखा कि

उसकी मासूम निगाहें उस पर ही टिकी थीं 

ये देख कर मेहमान ने उसे नमस्ते कह दिया 

उस बच्ची को ये पता नहीं था कि

किसी को लगातार इतनी देर तक देखना

मासूमियत की निशानी है

और मेहमान को ये पता नहीं था कि

अपनी ज़िन्दगी के इस बेहद नाज़ुक मोड़ पर

वो कितनी सही जगह आ गया है



सोमवार, 11 मार्च 2019

शायद... तुम्हें पता हो

हुई मुद्दत
कि वक़्त थम गया
और छोड़ गया तुम्हारा अक्स
मेरे चेहरे के सामने
मेरी बंद आँखों में...

इस अक्स के पीछे का चेहरा
हँसता मुस्कराता बातें करता
सीधे मेरी आँखों में देखता...
अब दिखाई नहीं देता
वो आवाज़ अब सुनाई नहीं देती

हाँ पर...
अब भी कभी कभी
मेरी हथेली पर पसीने की
एक हलकी सी पर्त का एहसास होता है
'दोस्त' वो पसीना आज भी

दो हाथों का मालूम होता है

शायद...
तुम्हें पता हो






सोमवार, 13 जुलाई 2015

अब... दर्द नहीं होता

उनके वो मिज़ाज नहीं रहे
प्यारे प्यारे मजमून नहीं रहे
हंसी के फ़व्वारे अब नहीं फूटते
वो लम्हे मासूम नहीं रहे
गुज़रा वक़्त याद तो आता है हर वक़्त
पर दर्द नहीं होता 

दुनिया हो गयी बड़ी बेरहम
ये शहर भी अब बेगाना सा लगता है
नक्शे मिट गए
रहनुमा खो गए
कहाँ जाएँ दिखाई नहीं देता 
पर अब इसका दर्द नहीं होता  

अब तुम, तुम नज़र नहीं आते 
मैं भी खुद को समझ नहीं पाता
शायद तुम वोही हो मेरी हमसफ़र 
मैं भी हूँ तुम्हारा, अपना अजनबी
इन बेरहम ख़यालों से लड़ता रहा हूँ 'दोस्त'
पर ग़नीमत है, कि अब... दर्द नहीं होता

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...