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बुधवार, 11 अक्टूबर 2023

एक अनजानी वजह

कुछ दिन पहले कुछ बदल गया

आहिस्ता से ...

बेहद आहिस्ता से

कई दिनों तक इसकी ख़बर भी नहीं हुई

लगा ही नहीं कि कुछ बदला है

सब ठीक ही लगता रहा


आख़िरकार जब जो जैसा रहता था

वैसा नहीं रहा

कुछ, जो रोज़ ही होता रहता था

अब नहीं हो रहा

एक अर्से से


मुझे पता है कि अगर कोई चीज़

बहुत धीरे-धीरे बदले तो समझ नहीं आती

पता ही नहीं चलता

लगता रहता है होगा कुछ,

ठीक हो जायेगा


ज़िन्दगी में सब इतने मसरूफ़ हैं

अपनी अपनी उलझनों के साथ

क्या पता किसकी उलझन कितनी मुश्किल है


बातें दो तरह से असर करती हैं

एक; एकाएक कोई बहुत बड़ी बात

या कोई ज़रा सी बात जो धीरे धीरे बहुत दिनों में बदले

ख़ैर, अगर कुछ इतने दिन चला है

तो इसकी जायज़ वजह तो होगी ही

और किसी की वजह पर शक नहीं  किया जाता

किसी की वजह पर शक करने का हक़ किसी को नहीं है

पर सभी अपने तूफानों में उलझे हैं

किसी को नहीं पता कि

कौन कैसे तूफानों से गुज़र रहा है 


... अपने तूफानों को मैं ख़ुद समझ लूँगा



शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

मेरा वक़्त और मैं

कभी ऐसा सोचा
जिनको मिलना था 
वो बिना मिले ही चले गये 
और ख़त लिखा
कि तुमसे मिल कर बड़ा मज़ा आया
उस दिन मौसम कितना ख़ुशगवार था
चौदहवीं के चाँद पे निखार था
तारे भी बिखरे हुए थे
खुशबु के समंदर
हवा पे तैर रहे थे
कैसी अजीब बात है
इतनी सारी बातें लिख डालीं
जो हुई ही नहीं
कोई ऐसा कैसे लिख सकता है 
मैं तो वहां पहुंचा ही नहीं 
और वो कहता है
हम मिल भी लिए 
पर ज़िक्र चाँद तारों का
खुशबू और हवाओं का
अब 
ख़याल आया ...
शायद मेरा वक़्त और मैं
एक दुसरे से बिछड़ गए हैं
वो धागे टूट गए हैं
जो मुझे मेरे समय से जोड़े रखते हैं 
मुझे जो कुछ कल औरपरसों
करना है / था 
वो सब हो चुका है 
मेरा आने वाला कल बीत चुका है





शनिवार, 25 जुलाई 2015

वो कहां मैं कहां

सपनों की दुनिया में है उसका जहांऔर मैं हूँ यहां
खबर नहीं वो है कहां, कितनी दूर है मुझसेमैं हूँ जहां

उसके दोस्तों की महफ़िलवो खुश गवार लम्हे
मुझे मिला साथ इस तन्हाई कामैं हूँ जहां

वो खिलखिलाती शोख़ नज़रें  और हंसी के झरने
मुरझाए सपनों का गुलिस्तां है यहाँ, मैं हूँ जहां

दोस्तों का साथ, वो बाहों के हार, और दिल की बातें 
ढूंढता हूँ खुशियाँ अपने आगोश मेंमैं हूँ जहां

काश मेरे क़दम पहुँच पाते ज़ुल्फ़ के उस मोड़ तक
पर कहाँ वो ज़ुल्फ़, वो हसीन मोड़ और मैं हूँ कहां

काश कोई मोड जोड़ देता हमारी ज़िन्दगी को 'दोस्त'
पर नहीं थी किस्मत में तेरी रहगुज़रमैं हूँ जहां

रविवार, 19 जुलाई 2015

मैं और मेरी झील

कोई आया, कोई गया
कोई न आया
मुझे कुछ ना हुआ
उसने कुछ कहा,
मैंने कुछ न कहा
वो चुप न रहा
मैं खुश रहा
वो बोलते रहे चीख़ते रहे
मैं सुनता रहा
वो आये साथ साथ
पिये खाए साथ साथ
एक दूसरे से ऊंचे 
हँसे, खिलखिलाए साथ साथ
मैं देखता रहा
सुनता रहा

किसी ने कहा
उसकी अक़्ल सबसे बेहतर है
मगर उसकी ज़िन्दगी बदतर है
सौतेला समझा उसे ज़िन्दगी ने
इस शिकायत को
उतनी ही आसानी से
किसी ने ग़लत कहा
अपनी नज़र में
हर एक शख्स
दूसरे से बेहतर है
मगर आप क्या हैं आप कौन हैं
ये दूसरे जानते हैं
आप से बेहतर
पर ये राज़ कोई नहीं जानता

ख़ैर, ये सब ख़त्म तो होना ही था
सो हो गया
सब उठ गए
आवाजें आहिस्ता हुईं
लफ़्ज़ कम हो गए
दरवाज़ा कुछ देर खुला रहा
फिर बंद हो गया
अपने पराये, सब चले गए
मैंने खुद की तरफ देखा;
क्या मैं पहले से ज्यादा खुश हूँ ?
परेशान हूँ ?
या शायद ज्यादा अकल्मंद हूँ ?
फिर अन्दर झांका
परखा, जांचा
पर कोई फर्क न पाया

बत्तियां बुझ गयीं
मैं बिस्तर पर लेट गया
चादर ओढ़ ली 
साथ ही
एक सफ़ेद कोहरे की चादर
मन की झील पर छा गयी
झील शांत हो गयी
फिर सो गयी
अपनी झील की गोद में
चेहरा छुपा के
मैं भी सो गया

... ख़ुदा ख़ैर करे

बड़ी दिलकश है उफ़, ये मुस्कान, ख़ुदा ख़ैर करे
कन्धों पे जा ठहरी ज़ुल्फों की ढलान ख़ुदा ख़ैर करे

वो चांदी सी चमकती बालियाँ ज़ुल्फों की जानिब से
घटाओं में जैसे बिजली की चमकार, ख़ुदा ख़ैर करे

गुलाबी रेशम के रंग की रंगत है, चेहरे पे शायद
या रेशम ने है चुराया चेहरे का गुलाब ख़ुदा ख़ैर करे

किस खुशकिस्मत पे इतनी खुश हो, हम भी ज़रा सुने
ग़लत फहमी के होंगे कितने शिकार, ख़ुदा ख़ैर करे

हम तो तस्वीर पर ही डाल चुके हथियार 'दोस्त'
रूबरू हुए तो क्या होगा हाल, ख़ुदा ख़ैर करे



गुरुवार, 16 जुलाई 2015

एक अनिश्चित भविष्य

मुस्कराहट
तुम्हारे चेहरे की मुस्कराहट
देख पाना मुश्किल था
मुस्कराहट ही नहीं बल्कि उसका अंश भी 
वो है या नहीं 
शायद है और शायद नहीं 
क्या वो इतनी कमज़ोर है 
कि दिखाई नहीं देती 
या इतनी मुश्किल है कि समझ नहीं आती  
शायद बेहद ध्यान से देखना पड़े 
नहीं तुम्हारे चेहरे को नहीं 
मुस्कराहट को 
मुस्कराहट को ढूंढने के लिए 
मुझे पता है कि वो है यहीं

शायद उस मुस्कान ने भी मुंह मोड़ लिया है मुझसे 
तुम्हारी तरह 
मन तो चाहता था कि वो मुस्कान
दे देती मुझे भी 
मुस्काने के बहाने 
एक बीमारी की तरह 
वो मुझे भी बीमार कर जाती
मुझे मुस्कराता हुआ छोड़ जाती
वो शायद मेरे साथ लुका छिपी खेल रही है 
जैसे तुम खेलती थी 
पर ये मेरे साथ क्यों खेल रही है 
इसे तो तुम्हारे चेहरा पर खेलना चाहिए

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

वो पहली सी मोहब्बत

मेरे महबूब वो पहली सी मोहब्बत
अब न मिल पायेगी तुमको
तुम अकेले उस तरफ निकल गए
मैं भी कहीं और जा रहा हूँ
ज़िन्दगी की उलझनों में उलझा हूँ
सबको निभानी है दुनियादारी
अब तो ऊपर की ज़रूरतें
हो गयी हैं ज़्यादा ज़रूरी
वो ज़रूरतें जिनके बग़ैर
ज़िन्दगी रुक सकती है
अब प्यार की बात मत करो
सोने, चांदी और नक़द की बात करो
एक हसीन बोसे की बजाय
अच्छे कपड़ों का ज़िक्र हो
आँखों में उम्मीदों की चमक नहीं
गाड़ी की चमक की बात करो
याद नहीं महक महबूब के बदन की
उसकी ज़ुल्फ़ों की
अब तो इत्र की क़ीमत
और खुशबू की बात करो
नशीली आँखों का ज़िक्र छोडो
जाम-ओ-मीना के सुरूर की बात करो
इन सबके बग़ैर रुक जाएगी ज़िन्दगी
प्यार मोहब्बत न हो तो ज़िन्दगी नहीं थमती
मोहब्बत किसी काम नहीं आती
मोहब्बत है क्या
एक एहसास ही तो है
एहसास-ए-मोहब्बत से ज़िन्दगी नहीं चलती 'दोस्त'
वो पहली सी मोहब्बत
अब न मिल पायेगी किसीको









तेरे खूबसूरत अँधेरे उजाले

तेरे ऊँचे उजले उरोज़ों के बीच 
वो गहरा अँधेरा गलियारा
दोनों उरोजों को अलग करती
एक अनजानी, अनछुई घाटी
मेरी बेशर्म, बेसब्र निगाहें 
उन खूबसूरत रेशमी 
उरोज़ों से फिसल कर 
बेख़ौफ़ पहुँच जाती हैं
उस जादुई गलियारे में
जहाँ कुछ दिखाई नहीं देता 
अँधेरे के सिवा 
कुछ याद नहीं रहता
तेरे सिवा
कुछ सुनाई नहीं देता 
तेरी धडकनों के सिवा 
कोई डर नहीं लगता
लगता है ज़िन्दगी का सारा सुकून
है उसी वादी में
काश अब कोई बुलाये
मिलने आये 
मौत के सिवा

रविवार, 12 जुलाई 2015

दुश्मन अपना ही

आओ बैठो दुश्मनो
बाकी सब तो चले गए
रिश्तेदार, दोस्त, ख़ैरख़्वाह
अब ये जगह ख़ाली ही रहती है
आप जैसों के लिए
आइये बैठिये, गालियां दीजिये
भला बुरा कहिये
मुझे अच्छा लगेगा
कोई तो कुछ कहेगा
एक ज़माना हो गया
किसीकी कोई बात सुने
किसीकी आवाज़ सुने
कोई ऐसा जो मुझसे मुख़्तसर हो
मेरे लिए हो
वो दे दे मेरे हिस्से के दो लफ्ज़ मुझे
भले ही वो मेरी बदनामी के हों
या आपकी नेकनामी के
आप 
दुश्मन ही सही
हैं तो इंसान ही
तो निकाल डालिये सारे ग़ुबार
और कर दीजिये खाली अपना दिल
मुझे ख़बर है
मैं अच्छा इंसान कभी न था
ख़ासकर अपने दुश्मनो के लिए
पर अब मैं भी बदल सा गया हूँ
अपना ही दुश्मन बन गया हूँ

वो अजब एहसास

हम सोये जागे साथ साथ
पूरी रात, मेरा हाथ
तुम्हारे हाथ को,
कंधे को, पीठ को
कभी कोहनी को...
कहीं न कहीं छूता रहा
वो भी अजब चीज़ थी 'दोस्त'
अगर हाथ लगा तो
नींद आ गयी
और अलग हुआ
तो खुल गयी

शनिवार, 11 जुलाई 2015

पहली मुलाक़ात

याद है मुझको वो लम्हा
जब हमारी नज़रें
मुख्तलिफ़ ख़ूबसूरत नज़ारों से फिसल कर
आपस में टकरा गईं थीं
लगा था एक तेज़ झटका सा
और मेरे दिल पर पड़ा एक भारी सा पत्थर
खिसक कर गिरा और
तुम्हारे दिल के पत्थर से जा टकराया
हवा का एक हल्का सा झोंका आया
तुम्हारा सिलेटी दुपट्टा लहराया
और दुपट्टे की लहरों पे मचलते वो पत्थर
गहरी वादियों में यूं ग़ुम हो गए
जैसे हवाओं का एक झोंका
फूलों के बगीचे में से गुज़र जाए


सिर्फ़... एक बार

तुम जो  जाते एक बार
 दिल होता इतना बेक़रार
 उठती निगाहें दरवाज़े पे बार-बार
जो तुम  जाते एक बार 

तुम जो सुन लेते मेरी पुकार 
कम से कम एक बार 
ज़िन्दगी में  सकती थी बहार
जो तुम  जाते एक बार

मुझे तड़पाया है तुमने कितनी बार
पर  'दोस्तइस बार पहली बार
तुम कर गए बहारों को भी बेकरार
काश जो तुम  जाते एक बार


शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मेरी बात मानो

पता है मुझको 
तुम्हारी पर्त दर पर्त 
परेशानियों का
ग़मों के उस मोटे लम्बे लबादे का
जिसमें तुम ढकी हो
पूरी तरह
मुझे ख़बर है
कितनी गर्मी है वहां
उस लबादे के नीचे 
मेरी बात मानो 
मेरी परेशानियों की भी चादर मत ओढ़ो
मत बढ़ाओ बोझ अपने लबादे का 
मैं ख़ुद ही संभाल लूँगा 
इस झीनी सी चादर को
अपनी ज़िन्दगी की गर्मी को
मैं ठीक हूँ मेरे 'दोस्त'
जब तक है मेरे ऊपर
तुम्हारी दोस्ती की चादर

डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...