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शनिवार, 11 जुलाई 2015

सिर्फ़... एक बार

तुम जो  जाते एक बार
 दिल होता इतना बेक़रार
 उठती निगाहें दरवाज़े पे बार-बार
जो तुम  जाते एक बार 

तुम जो सुन लेते मेरी पुकार 
कम से कम एक बार 
ज़िन्दगी में  सकती थी बहार
जो तुम  जाते एक बार

मुझे तड़पाया है तुमने कितनी बार
पर  'दोस्तइस बार पहली बार
तुम कर गए बहारों को भी बेकरार
काश जो तुम  जाते एक बार


गुरुवार, 9 जुलाई 2015

वज़न तारों का

सूरज का वज़न तो संभल जाता है
पर तारे हैं कि उठाये नहीं उठते
दिन एक बार निकले
तो निकल ही जाता है
पर रात सिरा नज़र ही नहीं आता
दिन में तो दिल बहला रहता है
कोई न कोई आता जाता है
घर न सही बाहर तो रेला रहता है
हज़ारों लोग यहाँ से वहां
आते जाते रहते हैं
वो मेरे कुछ नहीं लगते
पर उस मेले से दिल लगा रहता है
रात का ज़िक्र न हो तो ही भला
उस वक़्त कोई नहीं होता
कोई शोर कोई हलचल नहीं होती
सब सोये होते हैं
मैं फिर भी अकेला नहीं होता
तेरी यादों के हुजूम जो होते हैं
उन ख़याली ख्यालों के आगे
मेरा बस नहीं चलता
मैं उनमें उलझता जाता हूँ
मैं उन्हें उठा भी नहीं सकता
क्योँकि वो मेरे सीने पे बैठ जाते हैं
अब इसमें रात का भी कोई क़सूर नहीं
वो बेचारी चुपचाप देखती रहती है
तारे भी कुछ नहीं कहते




डर नूतन से

ठीक है, ठीक है, माना  । क्या  माना ? यही, कि जनाब ने मुझे बुलाया नहीं था  । तो फिर ये टटपुँजिया सा वाहन लेकर यहाँ क्यों तशरीफ़ लाये हैं? क्या...